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Monday, September 9, 2019
--- सीता की खोज: वर्तमान सन्दर्भ में ---
Thursday, August 15, 2019
झंडा उंचा रहे हमारा: गौरव या अहंकार
Friday, August 9, 2019
सूखते प्राण, घटता जीवन
Wednesday, July 24, 2019
ॐ नमः शिवाय
हे अविनाशी तुमको प्रणाम।।
हे सर्व व्याप्त निर्वाणरूप,
हे जड़-चेतन, हे छांव धूप।
हे गुण-अवगुण से चिर विमुक्त,
हे निर्विकल्प, हे चिर प्रयुक्त।
तुम शून्य तुम्ही हो कोटि गगन,
तुमसे तुममें यह सृष्टि मगन।
हे ज्योतिपुंज, हे सृष्टिधाम,
हे अविनाशी तुमको प्रणाम।।1।।
हे मृत्युंजय, हे निराकार,
हे ज्ञानरूप, हे ओमकार।
हे प्रेममूल, हे गुणागार,
हे दिग-दिगंत, हे चिर अपार।
हे गुण-विमुक्त, हे गुण-दयाल,
हे आदि-अन्त हे महाकाल,
हे पूर्णयोग, हे सत्यकाम,
हे अविनाशी तुमको प्रणाम।।2।।
हे जीवमात्र के प्राण-बिंदु,
हे गौर-वर्ण, हे शीलसिंधु।
हे धारण करते शशि अपूर्ण।
हे ध्यान मग्न हे सृष्टि पूर्ण,
हे धारण करते सर्प माल
है पावन गंगा केशभाल।
हे निर्विकार, हे ज्योति धाम,
हे अविनाशी तुमको प्रणाम।।3।।
हे चिर-प्रसन्न रहने वाले,
हे कालकूट पीने वाले।
सुन्दर भौंहें, नैना विशाल,
कानन कुंडल, गल मुण्डमाल।
हे पशुपति, हे गति, हे सकर्म,
हे धारण करते व्याघ्र चर्म।
हे सुख-राशी, हे योग-नाम,
हे अविनाशी तुमको प्रणाम।।4।।
हे कोटिसूर्य, हे शक्तिमूर्ति,
हे त्रिपुरवीर, हे भक्तिमूर्ति।
हे अगम-अगोचर, हे प्रचंड,
हे जन्ममुक्त, हे चिर-अखंड।
तव दिव्य हस्त में शुभ त्रिशूल,
हो जन्म-मृत्यु के तुम्ही मूल।
हे उमापती, हे कोटिनाम,
हे अविनाशी तुमको प्रणाम।।5।।
हे कालमुक्त कल्याणनाम,
हे जीव-जगत के मोक्षधाम।
हे भस्मअंग, हे भूतनाथ,
है सकल सृष्टि तुमसे सनाथ।
हे लोभ-मोह से चिर-विमुक्त,
हे प्रेम-ज्ञान से सदा युक्त।
हे सोमनाथ, हे कोटिकाम,
हे अविनाशी तुमको प्रणाम।।6।।
हे भव-भंजक, हे सुखराशी,
आनंदधाम, हे दुःखनाशी।
मै मूढमति ना सका जान,
घेरे मुझको दुःख-दर्द-काम।
न जप जानूं, न योग करूँ,
किस विधि मैं तेरा ध्यान धरुं।
बस एक सहारा एक नाम,
हे अविनाशी तुमको प्रणाम।।7।।
- दीपक श्रीवास्तव
Thursday, July 11, 2019
--- जल ही जीवन ---
इस अमृत से चेतन तन मन॥
जल बिन रक्त नसों में कैसे?
जल बिन वायु जियेगी कैसे?
जल बिन तन में जीवन कैसे?
जल बिन वृक्ष जिएंगे कैसे?
जल बिन कैसा भादो सावन?
जल ही जीवन, जल ही जीवन॥
चूर्ण मिले जल से जग खाए,
चूर्ण मिले जल से छत पाए।
जल तन की ऊष्मा पिघलाए।
जल ही मनके ताप मिटाए।
गौरव मान प्रतिष्ठा का धन,
जल ही जीवन, जल ही जीवन॥
तीर्थ जहां पर नदियां कल कल,
पावन करती तन मन पल पल।
सूखी नदियां ताल तलैया,
सूखी वृक्षों की मृदु छैया।
फिर से इनको दे दें जीवन,
जल ही जीवन, जल ही जीवन॥
- दीपक श्रीवास्तव
Wednesday, May 8, 2019
देव-दर्शन या-आत्म दर्शन
Thursday, May 2, 2019
स्वयं से मुलाकात: एक प्रयोग
लंबे समय से चल रही पारिवारिक एवं सामाजिक व्यस्तताओं के कारण अक्सर हमें स्वयं से मिलने का अवसर नहीं मिल पाता तथा हम अनेक उपलब्धियों की चाह में निरंतर प्रयास करते रहते हैं तथा उन्हीं उपलब्धियों के माध्यम से स्वयं को सुखी बनाने की दिशा में बढ़ते हैं जो कमोवेश आर्थिक सम्पन्नता की दिशा में प्रगति तक ही सीमित रह जाता है| आर्थिक उपलब्धियां मिल जाती हैं किन्तु क्या हमें वही सुख-शांति प्राप्त होती है जिसकी मन सदा से कल्पना करता आया है? हम जानते हैं कि आराम-तलब जिंदगी पाना आज कोई बड़ी बात नहीं है तो हमें वास्तव में क्या चहिये इसे समझने के लिए मैंने स्वयं पर एक प्रयोग किया|
एक अवकाश के दिन मेरा परिवार विद्यालय गया हुआ था तब मैंने घर के सभी दरवाजे बंद कर दिए तथा खिड़कियों पर पर्दे लगा दिए, इनवर्टर बंद कर दिए तथा बिजली की में लाइन काट दी| ऐसा इसलिए था कि घर में किसी प्रकार की ध्वनि न सुनाई दे चाहे वह फ्रिज, पंखा इत्यादि की ही क्यों न हो| वातावरण में अत्यंत गर्मी थी महत्तम तापमान लगभग 43 डिग्री सेल्सियस था ऐसी स्थिति में 9 बजे तक स्नानादि से निवृत्त होने के पश्चात मैंने हल्का नाश्ता लिया तथा प्रयोग प्रारम्भ किया|
वर्तमान में देश चुनावी परिस्थितियों के दौर से गुजर रहा है अतः देश को लेकर मेरे मन में भी अनेक प्रकार के विचार थे अतः जो विचार उभरे उन्हें उभरने दिया| यदि हमारे मन में कोई विचार होता है या कोई परिस्थिति होती है तथा उसके भिन्न पक्ष उपलब्ध हों तो व्यक्ति किसी न किसी पक्ष की ओर आंशिक अथवा पूर्ण रूप से झुकाव होता ही है| मैंने महसूस किया के हमारे देश की राजनीतिक परिस्थितियों में भी मेरा एक पक्ष है परंतु प्रयोग के दौरान निष्पक्ष होकर अपने विचारों को नियंत्रित करने का प्रयास किया तथा कुछ समय बाद मै राजनैतिक विचारों से मुक्त था|
व्यक्ति के जीवन में परिवार तथा भविष्य की बड़ी चिंता रहती है जो उसे जीवन रूपी महासागर के आनंद में स्वतंत्र होकर गोता लगाने नहीं देती| अक्सर हम जीवन में जब आगे बढ़ने की सोचते हैं तथा अपने लक्ष्य की एक कल्पना होती है जहाँ तक पहुँचने का मार्ग हमें तय करना होता है| मार्ग में आने वाली बाधाओं से संघर्ष करना पड़ता है किंतु आगे बढ़ने की यह ललक जब गला काट प्रतिस्पर्धा में बदल जाती है तथा हम अपनी स्थिति की तुलना दूसरों से करने लगते हैं या यों कहें कि जो दूसरों के पास है वह मेरे पास भी हो ऐसे विचार जब मन में आते हैं तो व्यक्ति के लक्ष्य तक पहुंचने का मार्ग नकारात्मक रूप ले लेता है, हमारे देश में, विशेष तौर पर युवा वर्ग इसी का शिकार है| मेरा जीवन तथा मेरी आयु दोनों ही अभी प्रगतिशील पथ पर हैं अतः अकेले होने पर यह विचार भी स्वाभाविक था तथा अनेक बातें मन में उभर रही थीं, मैंने उन विचारों को उभरने दिया तथा उनका हल निकालने की बजाए अथवा परिणाम सोचने की बजाय मैंने उस सोच को ही नियंत्रित करने का प्रयास किया जो बहुत कठिन था किंतु कुछ समय बाद इसमें सफलता मिली|
अब मेरे मन में एक विशेष प्रकार की शांति थी जिसमें कुछ समय तक तो मेरे परिवार के सदस्यों का नाम सम्मिलित रहा| माता-पिता, भाई-बहन, पत्नी-बेटी इन सबकी कल्पनाएं भी रहीं किंतु धीरे धीरे मैं वैचारिक रूप से उनसे भी मुक्त हो रहा था| अब मुझे केवल मेरे रुचियाँ जैसे साहित्य-संगीत ही ध्यान में आ रही थीं, किंतु कुछ भी नया पढ़ना प्रयोग के उद्देश्य के विपरीत हो जाता, अतः साहित्य की ओर मैं गया ही नहीं| जब भी मेरा मन प्रसन्न होता है या दुखी होता है तो मन कुछ न कुछ गुनगुनाता है अतः बहुत सारे गीत मेरे मन में आ रहे थे जिन्हें मैं गुनगुना रहा था तथा उसका आनंद भी मिला किन्तु जीवन में पहली बार ऐसा हुआ जिन गीतों को गुनगुनाते गुनगुनाते बहुत समय गुजारा है मैं उनसे भी मुक्त हो रहा था| कुछ समय बाद मेरा मन इस आनंद से भी मुक्त हो गया| अब मेरे मन में कुछ कुछ छोटे-मोटे विचार जरूर आ रहे थे परंतु उनसे मुक्त होने में अधिक समय नहीं लगा|
अब मैं पूरी तरह अपने साथ था मन में कोई विचार नहीं, कोई इच्छा नहीं बस एक अलग एवं अलौकिक अनुभूति की ऐसी अनुभूति थी जिसको शब्दों में लिखना मेरे लिए सम्भव नहीं है, बस केवल अपने अन्दर उर्जा के संचार एवं अत्यधिक आनन्द का अनुभव कर रहा था| आपको जानकर आश्चर्य होगा होगा कि लगभग 43 डिग्री तापमान में लगभग 7 घंटे तक बिना पंखे, कूलर अथवा अन्य सुविधाओं के बावजूद मुझे इनके न होने का एहसास भी नहीं हुआ तथा मुझे पानी की जरुरत भी महसूस नहीं हुई| जीवन में प्रथम बार मैंने इस आनंद का अनुभव किया| दो वर्ष पूर्व जब मैंने पारायण पत्रिका का संपादन किया था तब कुछ पंक्तियां लिखी थी जो मेरे मन में कैसे उठी वह तो नहीं पता किंतु उनका मतलब मैंने इस प्रयोग के दौरान महसूस किया| पंक्तियाँ थीं –
“जीवन शून्य से शून्य तक की यात्रा है| अक्सर जीवन की आपाधापी में हम शून्य को छोड़कर अनंत की ओर उड़ान भरने का प्रयास करते हैं तथा अनेक विकारों से भर जाते हैं किंतु जीवन में भी उस शून्य का अनुभव होता है तो व्यक्ति सुख एवं दुख की सीमा से परे आनंद के सागर में गोता लगाने लगता है|”
- दीपक श्रीवास्तव
Sunday, October 21, 2018
मैं किसान हूं
धरती की उर्वरता को
अपने हाथों से सींचा है।
खाली पेट बिताकर रातें
दिन भर अथक परिश्रम करके
सबका मैंने पेट भरा है
फिर भी क्यों गुमनाम हूँ
मैं किसान हूं॥1॥
चाहे मैं कम पढ़ा लिखा हूं
मेरी छोटी सी दुनिया है।
मगर देश की शान मुझी से
संस्कृति की पहचान मुझी से।
भले सभ्यता बढ़ती जाए
मैं ही उसका प्राण हूं
मैं किसान हूं॥2॥
कंक्रीटो के बड़े शहर में
सांसे घुटती जाती हैं।
कचरा प्लास्टिक और प्रदूषण
से जब इंसान मरता क्षण क्षण
याद मेरी तब आती है।
फिर भी मैं वीरान हूं
मैं किसान हूं॥3॥
सबने धरती से हित देखा
मैंने धरती का हित देखा।
औरों ने बस दौड़ लगाई
धरती मां की कोख सुखाई
मैंने इसको सींचा है।
जीवन की पहचान हूं
मैं किसान हूं॥4॥
- दीपक श्रीवास्तव
Sunday, September 23, 2018
जय जय माँ - एक मित्र के संगीत एल्बम हेतु रचित
भूखे को अन्न मिले और प्यासे को पानी !
जय जगदम्बा जय महारानी, जय वरदानी माँ
हम आये तेरे द्वारे मईया, शरण लगा लों माँ !!
जय मईया .....
सूरज सा है तेज तुम्हारा सिंह सवारी करती हो
दुनिया से तुम पाप मिटाकर धर्म संवारा करती हो|
कष्ट हमारे हर लों मैया सिंह भवानी माँ ||
सबके मन मंदिर में मईया तुम ही पल पल बसती हो
राजा रंक सभी के घर में मईया तुम ही रहती हो
जय जय अम्बे जय जगदम्बे शरण लगा लों माँ !!
जो भी तुमको भजता मन से मईया वो सुख पाता है
माँ बेटे का इस दुनिया में सबसे पावन नाता है |
हमको भी स्वीकार करो माँ मातु भवानी माँ !!
- दीपक श्रीवास्तव
Saturday, September 15, 2018
--- पूज्य अटल बिहारी बाजपेयी को श्रद्धांजलि ---
राजनीति का अटल सितारा,
है उजला इतिहास हमारा।
जो मर कर भी अमर हुआ है,
उसको वंदन नमन हमारा॥
जय जवान जय जय किसान में,
जिसने जय विज्ञान संवारा।
रचा पोखरण में था जिसने,
एक अमर इतिहास हमारा॥
मुख पर मृदु मुस्कान लिए जो,
बना करोड़ों मन का प्यारा।
दम्भ जिसे छू भी ना पाया,
ऐसा अमर चिराग हमारा॥
हिंदी तन मन जिसका जीवन,
फैलाया जग में उजियारा।
कवि मन की ओजस्वी वाणी,
जैसे सुरसरि बहती धारा॥
आओ श्रद्धा सुमन चढ़ाएं,
जो था अटल चिराग हमारा।
जो मर कर भी अमर हुआ है,
उसको वंदन नमन हमारा॥
- दीपक श्रीवास्तव
Friday, September 14, 2018
--- हिंदी दिवस पर विशेष ---
सृष्टि के संचालन में संचार की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है अतः संचार के माध्यम का सशक्त होना अति आवश्यक है। जब दो असमान तत्वों के बीच संचार होता है तो उसका माध्यम अनुभव या भाव-भंगिमा इत्यादि हो सकते हैं।
जब समान तत्वों के बीच संचार की बात होती है, विशेष तौर से मनुष्य में, तब भाषा बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यही कारण है कि शिशु से भी संवाद करते समय व्यक्ति अपनी मूल भाषा का प्रयोग करता है। शिशु को भले ही वर्णमाला का ज्ञान ना हो किंतु निरंतर हो रहे संवादों से उसे वस्तुओं को पृथक शब्दों के साथ साम्यता स्थापित करने का अभ्यास हो जाता है तथा इस प्रकार उसके अंदर भाषा का विकास होता है। यह एक चरणबद्ध प्रक्रिया है तथा आगे के चरणो में वह वर्णमाला का अभ्यास करता है तथा भाषा को लिपियों के माध्यम से श्रव्य के साथ-साथ दृश्य भाव में भी अंगीकार करता है। किंतु भाषा का क्षेत्र केवल संचार माध्यम तक ही सीमित नहीं होता, बल्कि भावाभिव्यक्ति का यह माध्यम व्यापार, चिकित्सा, विज्ञान इत्यादि क्षेत्रों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए संस्कृति एवं विकास का अंग बन जाता है।
आज भारतीय समाज ने वैश्विक स्तर पर बहुत प्रगति की है तथा लगभग हर देश के साथ अच्छे व्यापारिक एवं राजनैतिक संबंध स्थापित किए हैं। जाहिर सी बात है कि इस कार्य में अन्य देशों की भाषाओं को अपनाने की शैली विकसित की गई है। यह कार्य इसीलिए सफलतापूर्वक हो सका है क्योंकि हमारी संस्कृति प्रत्येक भारतीय के जीवन में वसुधैव कुटुंबकम की भावना को मजबूती से स्थापित करती है। यह कार्य केवल एक भाषा का चमत्कार नहीं है वरन् जब भाषा में संस्कृति घुली हुई हो, आदर्शों की भावना हो, जीवमात्र हेतु सम्मान का भाव हो, मर्यादाएं हो, स्वतंत्रता हो, विनम्रता हो तभी नागरिकों में इतनी शक्ति आती है कि वे विश्व बंधुत्व की भावना लिए अन्य संस्कृतियों एवं भाषाओं का सम्मान करते हुए उनके मध्य प्रगाढ़ संबंध बना सकते है। हमारी हिंदी में यह सुंदरता नैसर्गिक रूप से रची बसी है।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हमारी हिंदी केवल संचार का माध्यम न होकर अपने आप में पूरी संस्कृति है। यही कारण है कि एक आम हिंदीभाषी के अंदर अन्य भाषाओं एवं संस्कृतियों के प्रति सम्मान का भाव है। वैश्विक भाषा बन चुकी अंग्रेजी को भी हिंदी से प्रेम रखने वाले उसी भाव से स्वीकार कर पाते हैं। यह हिंदी की शाश्वत सुंदरता है। हिंदी भाषियों के हृदय में श्रेष्ठता का अहंकार नहीं होता बल्कि आदर एवं विनय उनके सहज स्वभाव में सम्मिलित होता है। हिंदी के जितने प्रमाणिक ग्रंथ हैं वे व्यक्ति की आंतरिक दृष्टि को उनकी चेतना से जोड़कर व्यक्ति के सहज स्वरूप का दर्शन कराने की क्षमता रखते हैं। जब व्यक्ति के अंदर श्रेष्ठता का अहंकार होता है तब वह बाहरी नेत्रों द्वारा दूसरों के दोष एवं आत्मप्रशंसा में अपना जीवन व्यर्थ कर देता है। ऐसा जीवन पूरी तरह दिखावटी होता है तथा झूठी श्रेष्ठता के दिखावे के कारण व्यक्ति के अंदर अनर्गल संचय की प्रवृत्ति विकसित होती है जिसके कारण मान-सम्मान एवं मर्यादाओं की परवाह किए बिना वह कोई भी अनैतिक कार्य करने में नहीं हिचकता।
भाषा केवल कुछ अक्षरों, मात्राओं, शब्दों एवं वाक्यों का समुच्चय नहीं है बल्कि यह मानवीय सभ्यता का प्रथम चरण है। अतः इसमें मानवीय संवेदनाओ की अभिव्यक्ति होनी चाहिए। जो मधुरता का भाव मां, अम्मा, माई, बाबूजी, पिताजी, भइया, दीदी जैसे शब्दों में आता है वही भाव मॉम, पा, ब्रो या सिस जैसे शब्दों में नहीं मिलता। भारतीयों के लिए वैश्विक भाषा को संचार माध्यम के रूप में अपनाना बहुत अच्छा है क्योंकि इसमें देश की प्रगति निहित है।
विकास आवश्यक है किंतु अपनी जड़ों की कीमत पर किया हुआ विकास स्वयं के ही अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर देता है। हम तभी तक सशक्त हैं तथा दूसरों के साथ सक्षम संवाद करने में समर्थ है जब तक हम अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं अन्यथा हमारा जीवन कटी हुई पतंग के समान है जो भले ही जमीन से बहुत ऊंचा दिखाई दे रहा हो किंतु उसके अस्तित्व का भविष्य अनिश्चित है - वह पेड़ों की झाड़ियों में फंसकर नष्ट हो सकता है, नदी नालों में बहकर अपनी लीला समाप्त कर सकता है अथवा बच्चों की छीनाझपटी के दौरान फट सकता है। उसके पुनः आकाश तक पहुंचने का केवल एक ही मार्ग है कि किसी सुरक्षित हाथ में पड़े जो उसे पुनः डोरी से जोड़ कर उसे ऊंचाई तक पहुंचाने हेतु प्रयास करे।
हिंदी संवेदनशील है। हिंदी में दूसरी भाषाओं का सम्मान है यही कारण है कि इतनी सशक्त भाषा होने के बावजूद हिंदी अन्य भाषाओं जैसे अंग्रेजी, उर्दू, सिंधी, पंजाबी, गुजराती, बांग्ला इत्यादि के शब्दों को भी सहजता से स्वीकार कर लेती है। हमारा दायित्व है कि हिंदी की इस विशालता एवं विराटता को नमन करें तथा इसका प्रयोग करने में गर्व का अनुभव करें। हिंदी हमारी संस्कृति है, हिंदी हमारा गर्व है, हिंदी हमारी धरती है, हिंदी हमारा आकाश है, हिंदी हमारा जीवन है, हिंदी हमारी चेतना है, हिंदी हमारी स्वांस है, हिंदी हमारा प्राण है, हिंदी हमारी जागृति है।
- दीपक श्रीवास्तव
Wednesday, September 12, 2018
--- आस्था की आड़ में खिलवाड़ ---
आज हम अपने देश में अनेक असामाजिक तत्वों को भोले भाले लोगों को मूर्ख बनाकर अपना हित साधते हुए देख रहे हैं। धर्मगुरु एक धंधे की तरह विकसित होता जा रहा है चाहे वह हिंदू मुस्लिम अथवा ईसाई ही क्यों ना हो। कहीं कम तो कहीं अधिक किंतु इनके द्वारा आस्था की आड़ में भोली भाली जनता का शोषण हो रहा है।
मैं अधिकतर अपने लेखों में किसी व्यक्ति का नाम नहीं लेता क्योंकि श्री रामचरितमानस के बालकांड में पूज्य गोस्वामी जी ने लिखा है कि जब कोई रचनाकार सृजन की प्रक्रिया में होता है तो स्वयं माता सरस्वती अवतरित होकर रचना करती हैं रचनाकार तो आम जनमानस तक रचना पहुंचाने हेतु माध्यम बनता है और यश प्राप्त करता है। इसीलिए गोस्वामी जी किसी नश्वर देहधारी की वंदना नहीं करते अपितु सनातन आदर्श निराकार निर्विकार सगुण राम की वंदना करते हैं जिनकी भक्ति के सरोवर में डूबकर माता सरस्वती भी स्वयं को धन्य महसूस करती हैं। अतः यहां भी किसी का नाम नहीं लूंगा किंतु रचनाओं एवं लेखों का उद्देश्य समाज हित में होता है अतः कुछ अनुभवजन्य बातें अवश्य प्रस्तुत करूंगा। बीते कुछ वर्षों में हमने विभिन्न धर्म गुरुओं को उनके कुकृत्य हेतु कठोर दंड पाते हुए देखा है। यदि उद्देश्य अपवित्र है तो एक ना एक दिन छद्मावरण हट ही जाता है तथा घिनौने कार्य का दंड भी मिलता है।
लगभग 5 वर्ष पुरानी बात है मेरे एक मित्र को ऐसे ही एक बाबा के कार्यक्रम में मंच संचालन करने का उत्तरदायित्व मिला था उनके साथ एक प्रसिद्ध रेडियो उद्घोषिका भी थीं। मैंने अपने मित्र से पूछा कि ऐसे कार्यक्रम में संचालन क्यों करना चाहते हो तब उसने उत्तर दिया कि केवल थोड़ी देर की स्क्रिप्ट पढ़नी है उसके बदले में मुझे एक अच्छी धनराशि मिलेगी। कार्यक्रम देखने मैं भी पहुंचा था। ऑडिटोरियम बहुत सुंदरता से सजाया गया था तथा कुछ धार्मिक चैनल अपने अपने कैमरों द्वारा पूरा कार्यक्रम रिकॉर्ड कर रहे थे। वहां अनेक ऐसी महिलाएं दिखाई देती थीं जो अच्छे परिवारों से थी तथा अपने कपड़े बदलने के बाद हॉल में आई तथा बाबा के साथ हुए सत्संग पर अपने निजी अनुभव सुनाए। कार्यक्रम की समाप्ति के बाद जब मेरा मित्र अपना चेक लेने पहुंचा तब मैंने उन महिलाओं को भी चेक लेने की कतार में पाया जिन्होंने अपने अपने अनुभव बताए थे। यह अनुभव उनके लिए कितने निजी थे यह तो नहीं पता किंतु जो भी उन्होंने बोला वह उन्हें पहले से कागज पर लिखकर दिया हुआ था। वास्तव में यह एक व्यापार का रूप लेता जा रहा है तथा चैनल भी पूर्ण रूप से पाक साफ नहीं है। इस प्रकार के कार्यक्रमों को प्रसारित करने से चैनलों की अच्छी खासी आमदनी हो जाती है। जिसकी पेमेंट पहुंच गई उस धर्मगुरु की वाह-वाह तथा जिसकी पेमेंट रुकी हुई है यही चैनल उस की धज्जियां उड़ा कर रख देते हैं। कुछ वर्ष पहले ऐसी ही घटना हुई थी जब एक धर्मगुरु की अनेक चैनल धज्जियां उड़ा रहे थे वहां एक चैनल उसके कार्यक्रमों को भली प्रकार प्रसारित कर रहा था। मेरी मुलाकात अनेक ऐसे मुस्लिम भाइयों से भी हुई हैं जो अपने ही धर्म गुरुओं से किसी न किसी प्रकार शोषण के शिकार हुए हैं।
प्रश्न यह उठता है कि प्रामाणिक धर्म ग्रंथ किसी भी प्रकार के कर्मकांड अथवा अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते फिर इस प्रकार के कुटिल धर्मगुरुओं की खेप कैसे पनप रही है। सभी के जीवन में संघर्ष है कुछ न कुछ समस्या है उस समस्या का हल ढूंढने के लिए भोली भाली माताएं अपने बच्चों को इन धर्मगुरुओं के हवाले करते समय विचार नहीं करतीं तथा अप्रिय घटना अनेक वर्षों तक घटने के बाद एकदम से उत्पीड़न हेतु शोर मचाने लगती है। क्या इस प्रकार की घटनाओं के लिए वह भी इन ढोंगी धर्मगुरुओं जितनी ही जिम्मेदार नहीं है? आग का स्वभाव ही है जलाना किंतु जब तक हम अपने हाथ उसमें नहीं देते तब तक वह नहीं जलाती। यही भोली-भाली जनता के साथ हो रहा है।
कोई भी प्रामाणिक धार्मिक ग्रंथ कभी भी व्यक्ति को ईश्वर से अलग नहीं मानता एवं उसी चेतना को प्राप्त करना ही मानव जीवन का लक्ष्य है। फिर हम उन चीजों की कामना में इतना क्यों उलझे हुए हैं जो चीजें एक सीमित समय के सुख का भ्रम ही दे सकती हैं। हम जब तक अपने प्रामाणिक शास्त्रों से दूर हैं तब तक अंधविश्वास है, कुरीतियां है तथा तब तक ही ढोंगी पाखंडी धर्मगुरुओं का व्यापार है। आज जाति एवं धर्म का धंधा सबसे आसान लगता है क्योंकि जब समाज बंटता है तो उसके एक एक हिस्से का लाभ किसी ना किसी स्वार्थी तत्व को आकर्षित करता है वह राजनेता भी हो सकता है और धर्मगुरु भी। राम के नाम पर ओछी राजनीति करने वालों से बात करें तो पता लगेगा कि उन्हें ना तो रामचरितमानस का कुछ अता पता है ना बाल्मीकि रामायण का किंतु चूंकि इस विषय से समाज को बांटने में सफल हो रहे हैं तथा राजनीति की दुकान चल रही है इसलिए मुद्दे को जीवित रखना जरूरी हो जाता है और हो भी क्यों ना क्योंकि एक सुनी-सुनाई पंक्ति के सहारे एक जातिवादी मुद्दा भी इन अवसरवादियों को आसानी से मिल जाता है और फिर इनके मन में मगरमच्छ के आंसू की तरह दलित प्रेम उमड़ता है। यह कथन याद नहीं रहता कि सेवा का भाव सर्वोत्तम होता है इससे ईश्वर की प्राप्ति आसान है यही भक्ति का मार्ग है। भगवान श्रीराम को निजी स्वार्थ के वशीभूत दलित विरोधी कहने वालों को श्री राम कथा के सच्चे वाचक काक भुशुंडी जी तथा सेवक के रूप में शबरी एवं जटायु नहीं दिखाई देते। उन्हें बाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड का धोबी अवश्य दिखाई देता है जिसका अस्तित्व ही प्रश्नचिन्ह के घेरे में है क्योंकि बाल्मीकि रामायण में युद्ध कांड के बाद फलश्रुती लिखी गई है तथा फलश्रुती के पश्चात कोई भी ग्रंथ समाप्त हो जाता है अतः उसके पश्चात किसी अध्याय की संभावना ही नहीं बनती। अतः बाल्मीकि रामायण में उत्तरकांड का अस्तित्व ही संदेहास्पद लगता है तथा कुछ विद्वानों का यह भी मानना है वाल्मीकि रामायण में उत्तरकांड श्री वाल्मीकि द्वारा रचित नहीं है गोस्वामी तुलसी कृत उत्तरकांड एवं वाल्मीकि द्वारा रचित उत्तरकांड में जमीन -आसमान की असमानता भी इस संदेश को पुष्ट करती है।
अतः यदि जीवन को वास्तव में उन्नत बनाना है तो प्रामाणिक ग्रंथों से सच्ची निष्ठा से जुड़ने के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय कारगर नहीं है। तथा जो प्रामाणिक ग्रंथ न खोज सकें, न पा सकें न पढ़ सकें, उनके लिए भी एक सुगम मार्ग है। अपने आस पास कुछ ऐसों को खोजिए जो आपसे कम भाग्यशाली है। वे ज़रूर मिलेंगे। उनमें ईश्वर को देखिये, उनके भोजन, वस्त्र, शिक्षा, मानसिक जागरण के लिए अपनी सीमाओं में रहते हुए कुछ योगदान स्वयम करिये। उनकी मुस्कुराहट में परमपिता का आशीर्वाद देखिये-आप को और कहीं नहीं भटकना होगा। यदि ऐसा नहीं होगा तो समाज में पाखंड एवं अंधविश्वास की जड़े गहराती जाएंगी एवं ढोंगी धर्म गुरुओं का व्यापार ऐसे ही चलता रहेगा और भोली-भाली जनता उन के शिकंजे में फंसती रहेगी और हमारा सुंदर समाज बंटता रहेगा।
- दीपक श्रीवास्तव
Sunday, September 9, 2018
--- जातिगत भेदभाव के भंवर में हम ---
बचपन में पढ़ी एक छोटी सी कहानी याद आती है कि एक बार शरीर के सभी अंगों में विवाद हो गया। पैरों का कहना था कि मेरे ही दम से पूरा शरीर एक स्थान से दूसरे स्थान पर गति करता है, हाथों का कहना था कि सारे प्रमुख काम में ही करता हूं, मुंह का कथन था कि मेरे माध्यम से भोजन शरीर में पहुंचता है इसी प्रकार अन्य अंगों की भी अपनी अपनी बातें थी। किंतु सबका एक कथन था कि सभी लोग मिलकर पेट के लिए प्रयास करते हैं तथा पेट को क्या काम करना होता है? यह तो निट्ठल्ला बैठा हुआ हमारी मेहनत को हजम करने में लगा रहता है। सभी अंगों ने निश्चय किया कि जब तक पेट कुछ काम नहीं करेगा तब तक हम इसके लिए कोई काम नहीं करेंगे। बस फिर क्या था सभी अंग हड़ताल पर चले गए। कुछ दिन बीते तो सभी अंगों ने अपने अंदर कमजोरी महसूस की। तब अनुभव से सभी को समझ में आया कि जो भी भोजन अंदर जाता है पेट उसे बचा कर सभी अंगों को आवश्यक पोषक तत्व पहुंचाता है जिसकी वजह से वह काम करते हैं अतः उन्होंने अपना अपना कार्य करना शुरू कर दिया तथा पुनः पहले जैसे सशक्त हो गए।
Saturday, September 8, 2018
--- कारपोरेट संस्कृति के चोले में बदलता भारतीय परिवेश ---
झूठ एवं दिखावे यह मुखौटा भारतीय सिनेमा के बदलते स्वरुप में भी दिखाई देने लगा था। एक पुरानी फिल्म याद आती है जिसमें नायिका एक मोटर मैकेनिक अपनी कार ठीक कराती है तथा हड़बड़ी में पैसे देना भूल जाती है तथा उसका पर्स भी मोटर मैकेनिक की गैराज में छूट जाता है। जब दुकान के मालिक जो मैकेनिक के बड़े भाई थे उन्हें इस बात का पता चला है तो उन्होंने मैकेनिक को आदेश दिया कि अपनी मजदूरी के पैसे इसमें से निकाल लो तथा महिला के दोबारा आने पर पर्स लौटा देना तब मैकेनिक के शब्द कि बिना महिला से पूछे पर्स में से पैसे निकालना नैतिकता के खिलाफ है ।उस समय के उच्च मानवीय आदर्शों को स्थापित करता दिखाई देता है। समाज में आए बदलाव ने यह भी दिखाया कि अनैतिक कार्यों को करने के बावजूद कानून की गिरफ्त से बचने हेतु क्या क्या तरीके हो सकते हैं। एक ऐसी फिल्म भी आई थी जिसमें कुछ मित्र मिलकर देश एवं विदेश में धोखाधड़ी का कारोबार करते हैं तथा मौज मस्ती के नए आयाम स्थापित करते हैं।
दुर्भाग्यवश फिसलते आदर्शों का क्रम भारतीय समाज की जीवन शैली मे अनवरत शामिल होता चला जा रहा है और समाज बदलाव की बयार को आधुनिकता की मुखौटे से छुपाने का प्रयास कर रहा है। इसका सबसे दुखद पहलू यह है कि जहां बड़े बुजुर्गों की छांव में संयुक्त परिवार के रूप में परिवार का प्रत्येक सदस्य आधुनिक जीवन शैली को अपनाने के बावजूद अपने मूल्यों से जुड़ा हुआ था आज वह एकाकी जीवन बिताने को मजबूर है क्योंकि इस जीवन शैली ने धैर्य एवं संयम जैसे मानवीय गुणों पर करारी चोट की है। हर व्यक्ति सफलता पाने हेतु कठिन परिश्रम की बजाय आसान रास्ता ढूंढने में लगा है तथा करोड़पति कैसे बने जैसी पुस्तकों की समाज में स्वीकार्यता बढ़ी है। मैनेजमेंट की अनेक पुस्तकें बाजार में उपलब्ध है तथा विभिन्न कोर्सों के माध्यम से इसके सूत्रों को आम विद्यार्थियों तक पहुंचाने का प्रयास भी किया जा रहा है। यदि इन सूत्रों को अपनी कार्यशैली में सही तरीके से अपनाया जाए तो निश्चित रूप से कार्य क्षमता एवं व्यक्तिगत जीवन शैली भी उन्नत होती है।
किंतु अधिकांश स्थानों पर प्रबंधन के इन महत्वपूर्ण सूत्रों का उपयोग सत्य को छिपाते हुए बनावटी मुखौटों से ढके हुए असत्य को बढ़ा चढ़ाकर प्रस्तुत करने में उपयोग किया जा रहा है। मैनेजमेंट अपने कर्मियों द्वारा किए गए कार्यों की समीक्षा लेकर ही अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेता है तथा टीम के प्रदर्शन से संतुष्ट हो जाता है। इस प्रकार हर व्यक्ति द्वारा अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन भली प्रकार होने के बावजूद कर्मियों में असंतोष की भावना उपजती है तथा जीवन में कोई विशेष बदलाव ना होने के कारण कर्मी नए अवसरों की तलाश में जुट जाते हैं। नए अवसर अपेक्षा के अनुरूप भी हो सकते हैं तथा विपरीत भी हो सकते हैं। आज के दौर में प्रबंधन पर एक बड़ी जिम्मेदारी है कि वह अपने कर्मियों की योग्यता अनुसार उनकी प्रगति का मार्ग भी सुनिश्चित करें। नई तकनीकों के अध्ययन की पहली जिम्मेदारी प्रबंधन पर है ताकि वहां से बेहतर अवसर निकाले जा सके तथा कुछ चुनिंदा कर्मियों को उपयुक्त दिशा में आगे बढ़ने के अवसर दिए जा सके। इस प्रकार प्रबंधन एवं कर्मियों के सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है। इस स्थान पर भी प्रबंधन के इन आधारभूत सिद्धांतों का अनुपालन नहीं होता वहां अपने आप को सही साबित करने की होड़ लगी होती है तथा हर व्यक्ति असंतोष को हृदय में लिए हुए स्वयं को बंधा हुआ महसूस करता है तथा उपयुक्त अवसर मिलते ही बंधन से मुक्त हो जाता है।
इसी असंतोष की भावना ने व्यक्तिगत जीवन शैली पर भी बहुत करारा प्रहार किया है था व्यक्ति के व्यवहार में अपने आप को वास्तविकता से अधिक दिखाने का प्रयास तथा येन केन प्रकारेण अधिक से अधिक संचय करने की प्रवृत्ति विकसित हुई है। जगदीश गुप्त जी ने लिखा है - "संसार सारा आदमी की चाल देख हुआ चकित। पर झांक कर देखो दृगों में है सभी प्यासे थकित॥"
कारपोरेट जगत के अधिकांश कर्मियों की सामान्य बातचीत में 80% सैलरी एवं आर्थिक असंतोष की भावना रहती है तथा बेहतर जीवन शैली का मानसिक दबाव क्षमता से अधिक खर्च करने को मजबूर करता है जिस कारण उपजी असंतोष की भावना उन्हें आर्थिक चर्चाओं के शिकंजे से बाहर नहीं निकलने देती तथा अनर्गल संचय की प्रवृत्ति विकसित होती है। मै मेरे बच्चे मेरा परिवार इसके अतिरिक्त यदि उन्हें कुछ दिखाई देता है तो वह सिगरेट अथवा शराब। सामाजिकता से दूर होने के कारण उन्हें अपने नागरिक अधिकारों पर बहस करना तो ठीक लगता है किंतु उन अधिकारों की प्राप्ति के प्रयास से दूर ही रहते हैं तथा राष्ट्र निर्माण के भागीदार नहीं बन पाते।
यह समाज के लिए आत्मघाती स्थिति है क्योंकि कॉरपोरेट जगत के अधिकांश कर्मी उच्च शिक्षा प्राप्त होते हैं तथा उनके अंदर अच्छी समझ होती है। राष्ट्र निर्माण हेतु वह एक अच्छी भूमिका निभा सकते हैं। इतने योग्य व्यक्तियों का अपने सांस्कृतिक मूल्यों से दूर होना तथा बनावटी जीवन का अभ्यास देश की प्रगति में न सिर्फ बाधक है बल्कि उसे प्रगति पथ पर कई मील पीछे धकेल देता है।
- दीपक श्रीवास्तव
Sunday, September 2, 2018
--- अयोग्यता से राष्ट्र निर्माण ---
जब तक व्यक्तिगत स्तर पर प्रत्येक क्षेत्र में गुणवत्ता नहीं है तब तक कोई भी राष्ट्र वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान नहीं बना सकता क्योंकि राष्ट्र की पहचान सर्वोच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों से नहीं बल्कि वहां के आम जनमानस से होता है।
दुर्भाग्य की बात है कि जो व्यक्ति परिश्रमी है, क्षमताशील है, तथा स्वयं के विकास हेतु निरंतर प्रयास एवं संघर्षों का सामना करते हैं, अक्सर वे अपने अधिकारों के प्रति सजग नहीं होते। उनकी आम धारणा ऐसी होती है कि यदि योग्यता है तो उपयुक्त स्थान पा ही लेंगे। इसके विपरीत जो व्यक्ति परिश्रम नहीं करना चाहते परंतु अपनी क्षमता से अधिक पाने की इच्छा रखते हैं वे अक्सर इच्छित स्थान प्राप्त करने हेतु अनेक अनैतिक संसाधनों का सहारा लेने का प्रयास करते हैं और अयोग्य होते हुए भी योग्य व्यक्तियों के समकक्ष खड़े होने का प्रयास करते हैं। इतिहास साक्षी है यदि समाज के किसी भी एक वर्ग में एकता है तो समाज का भले ही हित हो या अहित हो राजनीतिक कारणों से उसे सरकारी सहयोग प्राप्त होता है तथा वे समाज में मजबूत हो जाते हैं। उन्हें अपनी योग्यता पर भले ही संदेह हो किंतु राजनैतिक सहयोग का चश्मा चढ़े होने के कारण राष्ट्र का हित उन्हें दिखाई नहीं देता। इसमें भी सबसे बड़े आश्चर्य की बात यह है कि जब अपने परिवार के हित की बात आती है तो वह उसी व्यक्ति से सेवा लेना चाहते हैं जो योग्यता के आधार पर अपने यथोचित स्थान पर हो।
राष्ट्र के हित इसी में है कि उपेक्षित वर्ग को भी आगे आने के पर्याप्त अवसर दिए जाएं जिसके अनेक प्रयास हमें प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं परंतु दुर्भाग्य की बात यह है इन वर्गों में योग्यता को ऊपर उठाने हेतु एक भी प्रयास नहीं किया गया। जो कानून बनते हैं उनका उपयोग से अधिक दुरुपयोग होने लगता है।
पैरों के कमजोर होने पर बैसाखियों का सहारा लेना ठीक है किंतु जब कदमों में ताकत आ जाती है तब बैसाखियां पैरों की गति को कम करती हैं। कमोवेश आज भारतीय समाज की यही स्थिति है। आज अनेक उपेक्षित वर्ग सक्षम हो चुके हैं किंतु बैसाखियां छोड़ने को तैयार नहीं। ऐसा करके वह अपनी ही भावी पीढ़ी को योग्य बनने से रोक रहे हैं। सक्षम हो चुके वर्गों की आज नैतिक जिम्मेदारी भी है कि जिस राष्ट्र ने आगे बढ़ाने हेतु योग्यता के ऊपर उन्हें वरीयता दी है उसके निर्माण में अपना योगदान दें किंतु स्थिति आज इसके विपरीत है। उन्हें आगे बढ़ने का अवसर तो मिल गया किंतु उन्होंने इसका हृदय से सम्मान करना नहीं सीखा और स्वयं भी स्वार्थी होते हुए कुछ स्वार्थी एवं मौकापरस्त राजनीतिज्ञों के हाथों के मोहरे बन गए जिनकी बिसात पर आज देश में गंदा राजनीतिक खेल खेला जा रहा है।
निश्चित रूप से आज भले ही हम वैश्विक स्तर पर चंद कदम आगे बढ़े हो किंतु यदि योग्यता की उपेक्षा ऐसे ही होती रही तो राष्ट्र को पतन के गर्त में जाने से विश्व की कोई भी शक्ति रोक नहीं सकती।
- दीपक श्रीवास्तव
मोहन के धाम
मुरली की मीठी धुन बाजे, जहाँ प्रेम अविराम।।
छुपे जहाँ कण कण में मोहन, खोजत सब ग्वालन की टोली।
जहाँ कृष्ण की शीतल छाया, बाकी जग है घाम,
चलो चलो साथी हिल-मिल कर, मनमोहन के धाम।।१।।
जहाँ गोपियाँ प्रेम मगन हों, भव-बन्धन छूटे ना कैसे,
जहाँ रचाते हर पल कोई, लीला मोरे श्याम,
चलो चलो साथी हिल-मिल कर, मनमोहन के धाम।।२।।
Friday, August 31, 2018
पुस्तक "समग्रता की ओर" - भावांजलि
जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव देखे तथा संघर्षों से जूझते हुए अनेक ठोकरें खाई फिर संभला किंतु अब तक की इस यात्रा में अनेक बार ईश्वर की प्रत्यक्ष कृपा का अनुभव किया है। यह साक्षात ईश्वर की कृपा ही है जो लगभग पूर्ण भौतिकवादी युग एवं समाज में होने के बावजूद बचपन की शिक्षा आज तक हृदय में जीवंत है। यह मेरे माता पिता एवं गुरुजनों द्वारा दी गई शिक्षा एवं स्नेहा का परिणाम ही है जो राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में आकर अनेक महान विचारकों तथा विद्वानों का सानिध्य मिला तथा सीखने की प्रक्रिया जारी रही। सन 2010 में श्री अतुल नागपाल के माध्यम से नोएडा के वरिष्ठ समाजसेवी श्री अशोक श्रीवास्तव से मुलाकात मेरे जीवन की अविस्मरणीय पलों में से एक है क्योंकि इसी मुलाकात ने मुझे नोएडा शहर में प्रथम बार तीन मिनट हेतु मंच दिया था। यह मेरे सामाजिक जीवन की शुरुआत थी। इसके बाद जो सम्मान मिला वह किसी ईश्वरीय कृपा से कम नहीं है। वरिष्ठ लेखिका डॉ सरोजिनी कुलश्रेष्ठ जी से हिंदी कविता तथा पद्मश्री शीला झुनझुनवाला जी से हिंदी लेख का बीज पड़ा। परम विद्वान श्री कृष्ण कुमार दीक्षित जी से श्री रामचरितमानस प्रेम का बीज पड़ा। यह बातें मन में इतनी गहरी उतरी है के जीवन में जिस दिन इन पर बात ना हो उस दिन जीवन अधूरा सा लगता है।
हृदय में सदा विराजमान रहने वाले जिन भावों में हर क्षण प्रत्यक्ष ईश्वर की अनुभूति होती हो तथा पूज्य वरिष्ठ जनों के स्नेहाशीष द्वारा जिन भावों को रोपा और सींचा जाता हो उन्हें पूर्णतया लेखबद्ध करना असंभव है। जिस प्रकार ईश्वर के विराट स्वरूप की कल्पना भी मनुष्य द्वारा स्थूल शरीर के माध्यम से असंभव है किंतु फिर भी मनुष्य विभिन्न माध्यमों द्वारा उस ईश्वर को सांकेतिक रूप से देखने का प्रयास करता है चाहे वह पत्थर के रूप में हो या पुस्तक के रूप में। ठीक उसी प्रकार यह पुस्तक मेरे हृदय में स्थापित संस्कारों एवं सामाजिक परिकल्पना का प्रतीक भर ही है परंतु मेरी असमर्थ लेखनी इसे शब्दायित करने में समर्थ नहीं हो पाती यदि ईश्वर का प्रत्यक्ष आलंबन ना होता।
अतः इन रचनाओ को मेरी कलम ने सिर्फ कागज पर उतारने का कार्य किया है तथा स्वयं ईश्वर ने इन रचनाओं को रचकर मेरे माध्यम से समाज को देने का जो यश मुझे प्रदान किया है उसके आगे शब्दों के समूह अत्यंत सूक्ष्म है। भारतीय ज्ञानपीठ के पूर्व निदेशक स्वर्गीय दिनेश मिश्र जी मुझसे कहा करते थे कि रचनाओं के व्याकरण को समझने हेतु बहुत जीवन पड़ा है पहले रचनाओं को जीना शुरू करें, लिखना शुरू करें। ह्रदय की अभिव्यक्ति को शब्दों में डालना आवश्यक है क्योंकि रचनाएं केवल कुछ शब्दों का समुच्चय नहीं है बल्कि यह तो सामाजिक परिकल्पना एवं व्यक्ति की अंतश्चेतना का आधार है। ईश्वर साक्षी है इन लेखों को लिखते समय मेरा मन विचारशून्य रहा है तथा कलम स्वतंत्र रूप से लिखती रही है। मैं हिंदी अकादमी के पूर्व अध्यक्ष डॉ रामशरण गौड़ जी का हृदय तल से आभार व्यक्त करता हूं जिन्होंने इस पुस्तक को साकार रुप देने हेतु प्रत्येक क्षण पर मेरा मार्गदर्शन किया है तथा पुस्तक का नाम "समग्रता की ओर" भी उन्हीं द्वारा दिया हुआ है। अनेक गुरु स्वरूप भारतीय विद्वानों ने इस पुस्तक को साकार रुप देने में मेरा मार्गदर्शन किया है। इसके साथ ही मेरे अभियंत्रण महाविद्यालय के आदरणीय अग्रज श्री अवधेश कुमार सिंह तथा श्री बी एल गुप्ता का निरंतर मार्गदर्शन मिलता रहा है। मैं प्रिय अनुजस्वरूप कवि श्री अंकित चहल एवं ऑफिस के सहकर्मी श्री मनीष पटवाल जी का भी आभार व्यक्त करता हूं जिन्होंने प्रथम पाठक के रूप में पाठकीय दृष्टि से मेरा सहयोग किया है। विशेष रूप से मैं अपनी पत्नी के योगदान को भी प्रणाम करता हूँ जिसने इस पुस्तक को मूर्तरूप देने में एक सच्चे सहयोगी एवं समालोचक की भूमिका अत्यंत निष्ठा से निभाई है ।
अपनी कलम से लिखी हुई रचनाएं किसे प्रिय नहीं होती अतः इस पुस्तक का कण-कण मुझे प्यारा है। मेरी अंतश्चेतना में निरंतर बसने वाली ईश्वर की इस रचना को साकार रूप में अब मैं पाठकों के हाथों में सौंपता हूं। यदि इस में उपस्थित एक लेख भी सामाजिक एकता एवं अखंडता के स्वरूप को साकार करने में अपना योगदान दे सके तो मैं यह जीवन धन्य समझूंगा।
- दीपक श्रीवास्तव
Tuesday, August 28, 2018
--- पुस्तक समीक्षा - एक शीशी गुलाब जल ---
आज के भौतिकवादी युग में जहां धन लोलुपता की माया ने समाज के एक बड़े हिस्से को इतना प्रभावित किया है कि लोग इस आंधी में हित-अहित भी नहीं देख पाते वहां पुस्तक के प्रारंभ में ही माता सरस्वती से श्रद्धा परक ज्ञान एवं रूढ़ियों तथा आडंबरों से दूर रहने की कामना समाज को अपने मानवीय मूल्यों का एहसास दिलाती है दिखावे से दूर सत्य की परिकल्पना को साकार करती है। इतना ही नहीं यह झूठे आडंबरों से समाज को मुक्त करने एवं सत्य की प्रतिस्थापना हेतु बदलाव की भी पक्षधर है।
जीवन में सुख भला किसे प्रिय नहीं होता। सुख की कामना में अधिकतर व्यक्ति दुख के महत्व को कमतर आता है जबकि सच्चाई यह है कि दुख के बिना व्यक्ति सुख के महत्व को समझ ही नहीं सकता। मैंने कभी अपनी एक कविता में लिखा था- "तुम कहते हो भौतिकता है, जीवन अविरल दौड़ रहा है। धन लिप्सा की आंधी में मानव का मन भी डोल रहा है। पर पापों के बढ़ने से ही होता ईश्वर का अवतार। बिन पापों के कैसे पूजे ईश्वर को सारा संसार।" दुख से सुख तक की यात्रा को जीवन का संघर्ष कहते हैं। यही परिवर्तन प्रकृति में भी है और मनुष्य के जीवन में भी। पतझड़ की अनुभूति के बिना मधुमास के सौंदर्य का आनंद नहीं तथा खोने का दर्द जाने बिना मिलने के सुख की सच्ची अनुभूति नहीं हो सकती। यही मानव जीवन का शाश्वत दर्शन है। इतने गूढ़ रहस्य को कविता में सरलतम रूप में प्रस्तुत करने की क्षमता उसी कवि की रचनाओं में हो सकती है जिसने इस मर्म को अपने हृदय के आभ्यंतर से अनुभव किया हो।
वस्तुतः मनुष्य का सहज स्वभाव प्रेम एवं आनंद का है किंतु मनुष्य अपने अंतर्मन की बात पर बुद्धि को वरीयता देकर अपने वास्तविक चेहरे के ऊपर मुखोटे लगा लेता है तथा इन्हीं मुखौटों के कारण अपने निज स्वरूप से दूर वह अहम की प्रवृत्ति विकसित करता है और दूसरों को छोटा अथवा नीचा साबित करने की भेड़चाल में सम्मिलित हो जाता है। समाज को दिशाहीनता से बचाने के लिए तथा उसे प्रगति के मार्ग की ओर प्रवृत्त करने हेतु अनेक बार कठोरता बरतने की भी आवश्यकता पड़ती है। इसी तथ्य को "एक शीशी गुलाब जल" में प्रकशित व्यंग रचनाएं सुंदर सहज एवं प्रभावी तरीके से साकार करते हुए समाज में मौजूद दिखावटीपन पर करारा प्रहार करती हैं। इतना ही नहीं वह यह भी दर्शाती हैं कि आज समाज कितना गतिशील हो चुका है कि किसी को अपनों से मिलने का भी समय नहीं है। हर कोई जीवन में सफलता तो फटाफट पा लेना चाहता है किंतु संघर्ष के लिए तैयार नहीं है।
श्री विनोद पाण्डेय जी ने शिक्षा के बदलते स्वरूप पर भी चिंता व्यक्त करते हुए द्रोणाचार्य का उदाहरण लेकर एक काल्पनिक चित्र खींचा है जो शिक्षा के गिरते मूल्यों की ओर समाज का ध्यान आकृष्ट कराता है। वर्तमान परिवेश में आपराधिक प्रवृत्ति के व्यक्तियों का समाज के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन होना चिंता का विषय है क्योंकि इससे समाज सिर्फ पतन की ओर जाता है। इसका जिम्मेदार कौन है- हम स्वयं इसके जिम्मेदार हैं तथा जिम्मेदार हैं समाज के वरिष्ठजन जो सक्षम होते हुए भी इसका विरोध नहीं करते तथा समाज को पतनोन्मुख होते हुए देखते रहते हैं। कवि ने भीष्म पितामह का उदाहरण लेकर अत्यंत नैसर्गिक एवं सहज भाव से इस ओर ध्यान आकृष्ट कराया है।
यूं तो जीवन में अनेक पड़ाव आते हैं किंतु किशोरावस्था एवं युवावस्था के बीच का समय अति महत्वपूर्ण है जब व्यक्ति के अंदर उमंगों की उड़ान होती है, अल्हड़ता होती है, सम्वेदनाओं के ज्वार होते हैं। प्रेम दिवस अर्थात वैलेंटाइन डे का मस्ती भरा चित्रण एवं परीक्षा कक्ष से बाहर निकलने का उमंग इन्हीं भावनाओं की सजीव अभिव्यक्ति है।
कहते हैं जब तक जीवन है तब तक इच्छाओं का अंत नहीं। जब व्यक्ति अपनी इच्छाओं को वश में कर लेता है तब उसके अंदर देवत्व का उदय होना शुरू हो जाता है। इच्छाएं बहुत है कितनी है कुछ पता नहीं। "एक शीशी गुलाब जल" में जिन्न पर आधारित कविता व्यंग रूप में मानवीय इच्छाओं के पहाड़ का सशक्त चित्रण है जिनके आगे जिंदगी बेबस है। यही अंतहीन इच्छाएं व्यक्ति के अंदर रावण तत्व को जगा देती हैं जिसके बाद व्यक्ति अच्छे बुरे का ख्याल छोड़कर इच्छा पूर्ति हेतु किसी भी स्तर तक गिरने को तैयार है। त्रेता युग में रावण के विनाश के लिए भगवान श्री राम का अवतार हुआ था किंतु वर्तमान में मनुष्य अपने मन में इतने रावणों को लिए घूम रहा है उससे पार पाना बहुत कठिन होता जा रहा है। परंतु कवि के अंदर ईश्वर में अटूट विश्वास है तथा वह उनकी प्रतीक्षा में गुहार लगा रहा है।
विनोद जी को मैं अनेक वर्षों से जानता हूं। वह भी एक बेटी के पिता हैं तथा मेरी भी एक नन्हीं पुत्री है। दोनों की पुत्रियों में लगभग 6 माह का अंतर है। अतः पुत्रियों को लेकर हम दोनों की संवेदनाएं एवं परिस्थितियां लगभग एक सी हैं। अनेक कवियों ने माता एवं पिता का पुत्र अथवा पुत्री के प्रति प्रेम का सुंदर चित्रण किया है किंतु मेरे सामने पहली ऐसी रचना आई है जब दिन भर की थकान से मां चूर है तथा नन्हीं बेटी मां के साथ खेलना चाहती है तब एक पिता अपनी नन्हीं बेटी को अत्यंत मार्मिक भाव से मां की स्थिति का अनुभव कराता है।
समाज के विविध रूप रंग हैं। कहीं उमंगे हैं कहीं अल्हड़ता है तो कहीं गंभीरता एवं जिम्मेदारियों का बोध भी है। कहीं बाल-मन है तो मां की ममता भी है। कहीं पिता होने की अनुभूति है तो प्रेमी होने का सुख भी है। कहीं सामाजिक कुरीतियां हैं तो समाज निर्माण के प्रयास भी हैं। कहीं मन पर बुद्धि हावी है तो अंतश्चेतना का एहसास भी है। इतने विविध रंगों को एक पुस्तक में संजोकर, समेट कर लाने का जो महान कार्य श्री विनोद पाण्डेय जी ने किया है वह अद्भुत है। पुस्तक की लेखन शैली अत्यंत सरल एवं सहज है जो साधारण जनमानस के हृदय में सीधे उतरने वाली है। मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि "एक शीशी गुलाब जल" जन जन के हृदय में सदा के लिए अपना स्थान बनाएगी तथा सुंदर समाज की परिकल्पना को साकार करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देगी।
- दीपक श्रीवास्तव
Friday, August 24, 2018
--- सामाजिक नियमों की उत्पत्ति तथा संस्कृति निर्माण ---
Thursday, August 23, 2018
---शिवोहम---
कुछ अपवादों को छोड़कर लगभग सभी ग्रंथ यही बताते हैं कि जीव का स्वरूप भी ब्रह्म के समान ही अनंत है। ब्रह्म एक महासागर के समान है जबकि जीव उसी महासागर के जल की एक बूंद के समान है। यही बूंद जिस पदार्थ में उपस्थित है उसमें चेतना है। सृष्टि में दो प्रमुख तत्व माने गए हैं - जड़ एवं चेतन। जड़ पदार्थ में चेतना का संचार होते ही जीवन प्रारंभ हो जाता है। ब्रह्म को कोई साकार तथा कोई निराकार स्वरूप में मानता है। स्वरुप चाहे जो भी हो किन्तु इसमें कोई संदेह नहीं कि जीव उसी का अंश हैं अतः जो अमरता परमतत्व में है वही प्रत्येक जीव के चेतन अंश को प्राप्त है। फिर समाज में इतनी व्याधियां क्यों है, जीवन में इतना कष्ट क्यों है तथा जीवन की गति क्या है?
शास्त्रों ने उपरोक्त प्रश्न के उत्तर में बहुत कुछ लिखा है तथा सुंदर व्याख्याओं के माध्यम से अनेक सिद्धांत दिए हैं जिन्हें भक्तिपूर्वक ग्रहण करने से व्यक्ति सभी प्रश्नों के उत्तर पा जाता है। सामाजिक रूढ़ियों तथा अंधविश्वासों के चलते हम ईश्वर से प्रेम करने की बजाय भय करने लगते हैं तथा कर्मकांडों के माध्यम से उसे प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं। धन, चढ़ावा, सोने-चांदी, चादर, निरीह पशुओं की बलि इत्यादि अनेक भोगपरक वस्तुओं का दान उस परमचेतन स्वरूप को देने का प्रयास करते हैं जो सभी विषयों एवं वस्तुओं के मोह से पूर्णतया मुक्त है। इतना ही नहीं इसके भरोसे हम स्वयं की उत्तम गति, जो उसी महासागर से मिलने का नाम है, का भ्रम पालने लगते हैं तथा इस औपचारिकता के बाद उन कर्मों में संलग्न हो जाते हैं जो हमें उससे दूर करते हैं।
जीव और ब्रह्म की प्रत्येक व्याख्या सत्य है यदि उसके भाव को ठीक तरह समझा जाए। अनेक विद्वानों ने जीवन को रूपकों के माध्यम से दर्शाने का प्रयास किया है। डॉ सरोजिनी कुलश्रेष्ठ जी ने अपनी एक कविता में लिखा है- "मैं बनी हूं दीप बाती" - कितना सुंदर चिंतन है! यदि इस रूपक पर दृष्टि डालें तो महसूस होगा कि परमतत्व एक दिए के समान है तथा हम उसकी बत्ती की तरह है जिसमें एक गांठ पड़ गई है। गांठ के एक ओर हम हैं तथा दूसरी ओर जो हिस्सा घी में डूबा हुआ है वह परमात्मा का अंश है। गांठ घी में आधा डूबा है तथा आधा बाहर है। इस प्रकार बत्ती तो एक ही है किंतु गांठ उसे दो भागों में दर्शाने का प्रयास करती है। गांठ ईश्वर की माया के समान है जो अनेक जड़ तत्वों को भी समेटे हुए हैं। ईश्वर ही माया रूपी भ्रम को उत्पन्न करते हैं जिस कारण जीव स्वयं को ईश्वर से अलग समझते हुए लघुरूप को ही अपना संपूर्ण स्वरूप समझने की भूल करने लगता है। स्वयं में ईश्वर तत्व की अनुभूति के लिए इस गांठ को खोलना आवश्यक है। हमारा निज स्वरूप निरंतर ज्ञान के प्रकाश से प्रदीप्त रहता है जिसका रूपक बत्ती की ज्योति है। यही ज्योति बार-बार हमें अपनी लघुता का अनुभव कराती है तथा बत्ती के निरन्तर क्षय द्वारा यह संदेश देती रहती है कि जीवन एक न एक दिन समाप्त हो जायेगा। सच्ची प्रेममय भक्ति ही माया से संघर्ष करके इस गाँठ को खोल सकती है जिससे हमारे अनंत स्वरूप से साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त होना सम्भव है। बत्ती के छोर पर उपस्थित ज्ञानरूपी ज्योति बार-बार इस उद्देश्य की ओर ध्यान आकृष्ट कराने का प्रयास भी करती है किंतु अग्नि में ताप है अतः ज्ञान भी कई बार जीवन में अहंकार तत्व को उत्पन्न करता है जिसके वशीभूत होकर हम स्वयं के वास्तविक स्वरुप को नहीं समझ पाते और आत्मप्रशंसा में ही प्रसन्न रहने लगते हैं। एक समय ऐसा भी आता है जब जीवन पूरा करके बत्ती बुझ जाती है और गांठ वैसी की वैसी पड़ी रह जाती है। इससे भी बुरी स्थिति तब है - जब मन हवा के झोंकों की तरह आई इच्छाओं में ही लिप्त हो कर रह जाता है। धन, पुत्र, स्वर्ण, रजत, सुख-सुविधाओं एवं विलासिता की कामनाये हवा के झोंकों की तरह है जो जैसे ही जीवन में प्रवेश करती हैं वैसे ही ज्ञानरुपी बत्ती का प्रकाश हिलने लगता है तथा अस्थिर हो जाता है। जब कामना पूरी हो जाती है अर्थात झोंका गुजर जाता है तभी प्रकाश स्थिर हो पाता है। जब कामनाओं का झोंका बहुत तेज या आंधी की तरह हो तो बत्ती का प्रकाश उस का मुकाबला नहीं कर पाता और बुझ जाता है। गांठ वैसी की वैसी पड़ी रह जाती है, ज्ञानरूपी प्रकाश भी लुप्त हो जाता है तथा निज स्वरूप को जानने की सारी संभावनाएं समाप्त हो जाती हैं। विषयासक्त एवं कामनाओं से भरे जीवन की यही गति है।
हमारा प्रारब्ध हमें इस अनंत महासागर में लेकर आया है अतः अपने अंदर प्रदीप्त प्रकाश के सहयोग से भक्तिरूपी संसाधनों द्वारा इस गांठ को खोलने का प्रयास करें तभी जीवन में उत्तम गति का मार्ग प्रशस्त होगा।