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Sunday, August 12, 2018

--- प्रेम तथा अहंकार, भक्ति या ज्ञान ---

भक्ति प्रेम का सबसे शाश्वत रूप है। यूं तो स्वयं को अपने शाश्वत रुप से एकाकार करने के अनेक मार्ग हैं। कोई उस रूप को ज्ञान के माध्यम से देखने  का प्रयास करता है तथा कोई ज्ञान की गहराइयों में ना जाकर निर्मल भक्ति भावना द्वारा स्वयं की चेतना को ईश्वरीय चेतना से एकाकार करता है। ज्ञान मार्ग को शास्त्रों ने अत्यंत कठिन बताया है किंतु यदि ज्ञान को ठीक से साध सके जिसमें अहंकार का लेशमात्र भी ना हो तब ज्ञान ही व्यक्ति के अंदर भक्ति की भावना को जागृत कर देता है।
भक्ति निर्मल होती है। भक्ति की भावना स्वयं को हीन मानते हुए परम तत्व की और निश्चल भाव से समर्पित होती है। अतः इसमें विकार होने की संभावना नहीं है। अतः भक्ति सरल है किंतु वर्तमान समाज में सरलता को प्राप्त करना अत्यंत कठिन हो गया है क्योंकि हर व्यक्ति अपने मूल स्वभाव से परे कठिनता प्राप्त करने का प्रयास कर रहा है जिसका उद्देश्य ना तो ज्ञान है ना भक्ति। जीवन के उद्देश्यों को जानने का प्रयास करने की बजाय मानव का प्रयास जीविकोपार्जन तक ही सीमित रह गया है। जीविकोपार्जन तत्पश्चात अर्थ की प्रगति से भी आगे बढ़ता हुआ भौतिक संसाधनों से परिपूर्ण एक विलासी जीवन। दुर्भाग्य से वर्तमान मनुष्य के जीवन का उद्देश्य यही तक सिमट कर रह गया है।
हम सभी जानते हैं कि सृष्टि के कण-कण में ईश्वर स्वयं विराजमान रहकर हमें आत्मोत्सर्ग के संकेत देते रहते हैं किंतु भौतिक चकाचौंध में दृष्टि पर भ्रम की अनेक परतों के चढ़े होने के कारण हम उन संकेतों को समझ नहीं पाते अतः एक अत्यंत सीमित एवं संकुचित जीवन बिता कर इस संसार को छोड़कर चले जाते हैं।
ज्ञान मानव जीवन को उन्नति के शिखर पर पहुंचाने की क्षमता रखने के बावजूद अनेक अवसरों पर जीवन में भ्रम उत्पन्न कर देता है वास्तव में यह ज्ञान की वजह से नहीं होता। ज्ञान के कारण मनुष्य के अंदर श्रेष्ठता की भावना उत्पन्न होती है। यह श्रेष्ठता की भावना उसके अंदर अहंकार को निर्मित करती है। अहंकार अपने मूल स्वभाव के कारण व्यक्ति की भौतिक दृष्टि जो दूसरों के दोषों को देख सकती है उसको सदा जागृत रखता है किंतु अंतर्दृष्टि जो स्वयं की चेतना का आकलन करने की क्षमता रखती है उस पर श्रेष्ठता के अहंकार का पर्दा चढ़ा जाती है। अतः व्यक्ति कण-कण में उपस्थित ईश्वर के अंश को जानने के बावजूद श्रेष्ठता से दूर रह जाता है। यदि ज्ञान के साथ भक्ति का समावेश हो जाए तो जीवन निर्विकार हो जाता है तथा ऐसा एक भी जीवन संपूर्ण समाज की प्रगति के लिए अति महत्वपूर्ण होता है क्योंकि ऐसे ही जीवन समाज के शाश्वत मूल्यों की रचना करने में सफल हो सकते हैं। दुर्भाग्य से वर्तमान समाज में अहंकार का आधार ज्ञान ना होकर आर्थिक स्थिति है जो किसी विषबेल से कम नहीं है।
शिक्षा जब तक मनुष्य को उसके मूल्यों का अनुभव नहीं कराती तब तक वह शिक्षा केवल आजीविका उपलब्ध कराने तक ही सीमित होकर रह जाती है। इस प्रकार निर्मित समाज ज्ञान एवं भक्ति से कोसों दूर मनुष्यों को पशुओं से भी नीचे स्तर का जीवन जीने पर विवश करता है। इस प्रकार के समाज में किसी भी प्रकार के संबंधों की गरिमा को बनाए रखने की क्षमता नहीं होती। वर्तमान में महिलाओं एवं छोटे बच्चों के विरुद्ध हो रहे अमानवीय कृत्यों के पीछे सबसे बड़ा कारण यही है।
 झूठी श्रेष्ठता साबित करने के इस दौर में भक्ति का मार्ग पाना अत्यंत दुष्कर है क्योंकि मन की मलिनता को दूर करना इतना सरल नहीं है। किंतु फिर भी यदि अपने शास्त्रों का अध्ययन ठीक से किया जाए तो कुछ हद तक हमारे जीवन में ज्ञान का समावेश तो हो ही सकता है। ज्ञान भले ही हमारे जीवन में श्रेष्ठता का अहंकार उत्पन्न करें किंतु फिर भी वह सामाजिक विकृतियों से लड़ने में सक्षम है। और ज्ञान भी तभी तक अहंकार उत्पन्न करता है जब तक ज्ञान संपूर्ण नहीं है।
 अतः आदर्श स्थिति तो भक्ति के साथ ज्ञान का संगम है किंतु निश्चल मन के साथ यदि भक्ति को हम ग्रहण न कर सके तो भी ज्ञान के माध्यम से वर्तमान समाज को सार्थक दिशा तो दे ही सकते हैं अतः अब भी समय है अपनी संस्कृति के मापदंडों को समझें, मर्यादाओं को अपने हृदय में धारण करें जिससे समाज की दिशा एवं दशा दोनों में उत्थान हो।

-  दीपक श्रीवास्तव

Tuesday, August 7, 2018

--- सुंदरता एवं प्रगतिशील समाज ---


 अक्सर हम  सृष्टि में बहुत सारी चीजों को देखते हैं महसूस करते हैं। कुछ वस्तुएं हमें सुंदर लगती हैं कुछ बहुत सुंदर और कुछ हृदय में गहरे उतर जाती हैं। यदि वस्तुओं से अलग मनुष्य की ओर देखें तो पायेंगे कि कुछ मनुष्य हमें बहुत सुंदर लगते हैं तथा कुछ असुंदर। बहुधा हमें यह भी देखने को मिलता है कि कि जो मनुष्य हमें सुंदर लगता है वह किसी और की दृष्टि में असुन्दर हो सकता है तथा इसका विपरीत भी संभव है। प्रश्न यह उठता है कि एक ही व्यक्ति अथवा वस्तु के लिए अलग-अलग व्यक्तियों की दृष्टि में भिन्नता क्यों?  हमारी दृष्टि में जो गलत है वह किसी और की दृष्टि में सही तथा किसी और की दृष्टि में जो गलत है वह हमारी दृष्टि में सही हो सकता है।
 तो प्रश्न उठता है कि वास्तव में सुंदरता कहां है- वस्तु में, व्यक्ति में अथवा दृष्टि में? एक मित्र को अचानक कुछ आवश्यकता आन पड़ी तो दूसरे मित्र के पास पहुंचे और बोला कि भाई मुझे कुछ आवश्यकता है मुझे तुम्हारी मदद चाहिए। दूसरे मित्र कहते हैं हां मित्र क्यों नहीं आखिर सुख दुख में हम एक दूसरे के साथ नहीं खड़े होंगे तो मित्रता कैसी? पहले व्यक्ति की जरूरत में दूसरे व्यक्ति ने साथ दिया था अतः पहला व्यक्ति यही कहेगा कि कि दूसरा व्यक्ति बहुत सुंदर है उसका मन बहुत सुंदर है उसका हृदय विशाल है। अब दूसरा दृश्य एक तीसरे मित्र को आवश्यकता पड़ती है तथा वह पहले मित्र के पास पहुंचता है और बोलता है कि भाई मुझे कुछ सहयोग चाहिए तो पहला मित्र उन्हें दूसरे मित्र के पास भेजता है परंतु उस समय दूसरे मित्र किन्हीं परेशानियों में उलझे हुए थे, मनोदशा भी ठीक नहीं थी अतः उन्होंने तीसरे मित्र का ठीक से अभिवादन नहीं किया तथा उनका सहयोग करने में भी अक्षम रहे। तीसरे मित्र का क्या विचार होगा दूसरे मित्र के बारे में? व्यक्ति वही किंतु दो व्यक्तियों की धारणाएं उस व्यक्ति के बारे में अलग-अलग, दोनों की अपनी-अपनी पृथक परिभाषाएं, अपने-अपने पृथक विचार।
 यह धरती बहुत बड़ी है तथा भिन्नताएं भी अपरिमित हैं अतः किसी एक व्यक्ति के होने ना होने अथवा उसके विचार से इस सृष्टि के चलन पर कोई फर्क नहीं पड़ता। किंतु उसमें पृथक विचारों के बीच में जब साम्यता स्थापित की जाती है तब एक समाज का निर्माण होता है। उसमें लोगों का चाल-चलन, आचार-व्यवहार इन सब की परिभाषाएं बनती हैं तब एक संस्कृति का निर्माण होता है। संस्कृति बनती है तो मर्यादाएं भी बनती हैं। किंतु मर्यादाओं का निर्माण देश, काल एवं परिस्थितियों पर निर्भर करता है।  सामाजिक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समय की मांग को देखते हुए परंपराएं निर्मित की जाती हैं, शास्त्र रचे जाते हैं। इस प्रकार एक प्रगतिशील समाज की रचना हो जाती है।
चूंकि मर्यादाओं पर आधारित परंपराएं समय की आवश्यकता के अनुसार निर्मित होती हैं यदि शास्त्रों को ठीक से न समझा जाए तो वहीं परंपराएं समय बदलने के साथ-साथ रूढ़ियां बन जाती हैं तथा समाज में अंधविश्वास का जन्म होता है। एक कालखंड में जो चीजें सुंदर थी वही अब असुन्दर होती चली जाती हैं। अल्प ज्ञान के आधार पर हर व्यक्ति उन्हें रूढ़ियों कि अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार व्याख्या करने लगता है। विभिन्न दृष्टिकोण उपजते हैं, कोई पक्ष में होता है कोई विपक्ष में होता है किसी को सुंदर लगती हैं किसी को बदसूरत जबकि परंपराएं वही है, मानक वही है, मान्यताएं वही है किंतु दृष्टिकोण ने अलग-अलग परिभाषाएं गढ़ दीं।
 यदि एक प्रगतिशील समाज की रचना करनी है तो सामाजिक संरचना के आधार स्तंभ शास्त्रों का गहन अध्ययन अनिवार्य है। तभी परंपराओं एवं मान्यताओं के मापदंडों को समझा जा सकता है और समय चक्र के बदलने के साथ ही परंपराओं में परिवर्तन की सामर्थ्य पैदा की जा सकती है इस प्रकार समाज को रूढ़ियों एवं अंधविश्वासों से बचाया जा सकता है। बदलता हुआ समय समाज की आंखों पर अनेक पर्दे चढ़ा जाता है तब शास्त्र पैदा करते हैं इन पदों के आर पार देखने की नजर ताकि सत्य बिल्कुल शीशे की तरह साफ हो। दृष्टि सुंदर हो। चारों ओर सूर्य सा चमकता हुआ प्रकाश हो और समाज भटकाव से परे निरंतर प्रगति की ओर कदम बढ़ा रहा हो।

- दीपक श्रीवास्तव

Life: From Ordinary towards Extraordinary


The earth is very vast, there is vast ocean of the waters and there is sky which is eternal. Can they ever limit their magnitude? Far from the city - If you sit at the edge of a sea at a quiet place, then a place can be seen far away, where all three, earth, ocean and sky, come at one place called the horizon - it is bound to the vastness of the vastness. There is neither, nor end, nor zero, nor infinite, but it is not an unusual phenomenon because nothing unusual happens in the world. Whatever the earth, sky, wind, mineral, mountain, river, etc. are all normal. It is normal - sometimes wandering in the forests, sometimes while living on the stale meat of other animals, when man goes beyond the search of fire and wheels, crossing different stages, human reached towards great inventions like computer and Internet. It proves that the human's capabilities can’t be bound. Can these capabilities be restricted? May be not. Since only one element in creature is infinite - the element of god, if a particle of it is present in a body, the body is in consciousness. With the influence of those particles, thinking and power progresses towards infinity.
The life of man is very common, but there is a very specific process which bring the human towards the range of vastness and incomparable. There is a moment comes in every person's life when he gets the opportunity that he can rise above his own life and become an exceptionally extravagant personality. If you recognize that moment, then you can make the correct use of your unlimited energy. When he try to progress through somebody's door or flattering, believe that he will be losing himself because these are all compromises. But it is necessary to make an agreement on certain occasions in life. What to do with the agreement - this question arises. When person can have capability to recognizes it correctly, then only he can take the actual steps towards becoming an extraordinary personality.
Life is a journey, so we are all travelling. Sometimes in the house, in outside, in crowd, in lonely, in dreams, in awake, in void, in infinite, in thought, in thoughtlessness. This journey is going on continuously. When the feeling of loneliness in the crowd starts to occur, then it is time understand that there is a need to change direction. Since man is a social creature, there is a sense of social security inside him. He wants to live as a part of society. He feels safe with his friends and his family, he feels safe by himself, and the thought of getting away from his community, he begins to feel loneliness in his mind. This is the feeling of loneliness in the crowd.
When a person rises above the crowd and hears the call of himself in his heart, then he start to takes in the form of an independent personality. This is a stepping stone from ordinary to Extraordinary. In such  situation, he seems to be able to accommodate many people in his personality. For example, any great person, whether it be Rama, Krishna, Swami Vivekananda, etc, were not the ordinary persons who lost in the crowd but they are personalities, who, despite being in the crowd, are different from the crowd. They are always be alive. As soon as I said that I want to become like this person, it means that the person has reconciled my personality within him. This is the identity of an extraordinary personality.
We have taken birth on the earth, We got the abilities to do something, So please do all those which can add our life with our consciousness. This is the purpose of life, that is the ultimate happiness, that is the unhanged sound, that is the greatness of life.

- Deepak Srivastava

Monday, August 6, 2018

--- लक्ष्य की प्राप्ति एवं जीवन-संघर्ष ---

जीवन में किया गया कोई भी कार्य किसी न किसी लक्ष्य की ओर उन्मुख होता है तथा उसकी प्राप्ति व्यक्ति की इच्छाशक्ति तथा परिश्रम की दिशा पर निर्भर है। लक्ष्य भक्त के लिए भक्ति, शिक्षार्थी के लिए रोजगार तथा राजनीतिज्ञ के लिए राजनीति का कोई पद हो सकता है। किंतु उसकी प्राप्ति के लिए बाधाओं का सामना करना ही पड़ता है, जिससे जूझकर आगे बढ़ना ही संघर्ष है। लक्ष्य मार्ग में तीन प्रकार की बाधाएं आती हैं जो क्रमशः स्वर्ग-लोक, पाताल-लोक तथा मृत्युलोक की बाधा कहलाती है। बाधाओं की प्रकृति भिन्न होने के कारण उनके हल भी अलग-अलग हैं।
गोस्वामी तुलसीदासकृत श्रीरामचरितमानस के हृदय में स्थित सुंदरकांड इस विषय में बहुत सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है। हनुमान जी समेत वानर एवं भालुओं के समूह मां सीता का पता लगाने के लिए समुद्र तट पर बैठे हुए विचारमग्न थे कि इस अथाह जलराशि को कैसे पार करें? ऐसे ही यह संसार भी एक विशाल समुद्र के समान है जिसमें हम अपने जीवन का लक्ष्य पाने के लिए विचारमग्न होकर बैठे हुए हैं। जिस प्रकार हनुमान जी अपनी उन शक्तियों को भूल चुके थे जो उन्हें एक ही छलांग में समुद्र पार करा सकती थीं, उसी प्रकार हम भी अपनी क्षमताओं को भूले बैठे हैं। तब वहाँ उपस्थित जामवंत जी ने उन्हें अपनी शक्तियों का भान कराया। जामवन्त जी वरिष्ठ एवं गुरुस्वरूप थे अतः उन्हें हनुमान जी की शक्तियों का पता था। हमारे जीवन में भी माता-पिता एवं अध्यापक हमारी शक्तियों को पहचानते हैं तथा लक्ष्य तक पहुँचने में पग-पग पर हमारा मार्गदर्शन करते हैं परिणामस्वरूप हमारी दृष्टि विकसित होती है जो हमें लक्ष्य से अवगत कराती है तथा हमें अपनी क्षमताओं का ज्ञान होने लगता है और हम सही दिशा में बढ़ने लगते हैं।
यहीं से हनुमान जी की समुद्र यात्रा का प्रारम्भ होता है जहाँ सर्वप्रथम मैनाक पर्वत से मिलना होता है जो उनसे कहता है, “हे तात! तुम थक गए होगे थोड़ा सा विश्राम कर लो”। समाज में अनेक लोग हैं जो जीवन में लक्ष्य तो बना लेते हैं किन्तु थोड़ा सा चलने पर ही आलस्य के कारण रुकने या भटकने लगते हैं। किन्तु लक्ष्य से पहले रुकने का क्या काम!
“क्या सवेरा, रात क्या है, नियति का प्रतिघात क्या है?
थक गए जो, रुक गए जो, लक्ष्य की फिर बात क्या है?
राह को ही वर लिया तो फिर नियति की मार कैसी?
कंटकों को ही बहा दे, अश्रु की हो धार ऐसी।
अतः हनुमान जी का उत्तर है, “राम-काज कीन्हे बिनु, मोहि कहां विश्राम”। वास्तव में यह हमारे संकल्पशक्ति की परीक्षा है जिसमें उत्तीर्ण होने के पश्चात ही लक्ष्य तक पहुंचने का मार्ग प्रारंभ होता है। हनुमान जी को मार्ग में तीन राक्षसियां मिलती हैं जो ऊपर वर्णित बाधाओं के प्रतीकात्मक भाव को प्रदर्शित करती हैं। यात्रा में तीन पड़ाव क्रम से आते हैं तथा प्रत्येक पड़ाव की बाधा विशिष्ट है अतः उसका हल उसी के अनुसार है। यदि प्रचलित मान्यता के अनुसार राक्षसी का सामान्य अर्थ लिया जाय तो तीनों का वध भी किया जा सकता था किन्तु हनुमान जी सुरसा का सम्मान, सिंहिका का वध तथा लंकिनी को घायल करते हैं।
सर्वप्रथम स्वर्गलोक की बाधा के रूप में सुरसा देवताओं के निवेदन पर हनुमान जी की परीक्षा लेने के लिए आई थी। उसका उद्देश्य पावन था, अतः इसे बाधा नहीं बल्कि हमें और मजबूत बनाने हेतु बड़ों द्वारा ली गई परीक्षा कहना अधिक उपयुक्त होगा। स्वर्ग को देवताओं का निवास स्थान माना गया है जो आध्यात्मिक शक्तियों के प्रतीक हैं अतः वे पग-पग पर विभिन्न माध्यमों से हमारे संकल्प को दृढ़ करते हैं तथा मार्गदर्शन भी करते हैं। वे हमारी संकल्पशक्ति की परीक्षा लेते हैं जो दृढ़ता को आधार प्रदान करती है। हमें जीवन में कई बार ऐसा लगता है कि हमारे माता-पिता हमारे विरुद्ध हैं तथा हमपर अपनी इच्छाएं थोप रहे हैं लेकिन सत्य इसके विपरीत होता है। उदाहरण के लिए माता-पिता बेटे को इंजीनियर बनने को कहते हैं लेकिन बेटा की इच्छा कुछ और है। इस वार्ता में कभी हम अपनी बात को मजबूती से रखते हैं तो हमारे बड़े और भी अधिक मजबूती से, फिर उससे ज्यादा मजबूती से हम रखते हैं फिर हमारे बड़े और मजबूती से अपना तर्क प्रस्तुत करते हैं। हनुमान जी द्वारा सुरसा के मुंह से दुगुना आकार लेना, सुरसा द्वारा अपने मुख का आकार हनुमान जी से दुगुना कर लेना तथा इस क्रम का बढ़ना इसी बात को दर्शाता है। किंतु एक समय ऐसा आता है जब सुरसा अपना अपना मुख सौ योजन विशाल कर लेती है। यही चिंतन का बिंदु है क्योंकि लक्ष्य अर्थात सीता माँ की दूरी भी सौ योजन ही है। यदि हनुमान जी अपना आकार दो सौ योजन कर लेते तो इसका सीधा अर्थ होता कि वे अपने अहंकार को प्रदर्शित कर रहे हैं। चूंकि यह परीक्षा हमारे लिए हितकारी है, अतः हमें इसका सम्मान करना चाहिए, यही उदाहरण हनुमानजी प्रस्तुत करते हैं तथा वे लघु रुप लेकर सुरसा की इच्छा पूरी कर देते हैं जिसके परिणामस्वरूप सुरसा उन्हें सफलता का आशीष देती है। सत्य है - बड़ों का आशीष लिए बिना जीवन में सफलता प्राप्त नहीं हो सकती।
यहां से आगे अब हम समाज में प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहे होते हैं। तभी हनुमान जी की यात्रा में सिंहिका नामक राक्षसी पाताललोक की बाधा के रूप में सामने आती है। समुद्र में रहने वाली सिंहिका अपने ऊपर उड़ने वाले पक्षियों की परछाई को पकड़कर उनका शिकार किया करती थी। अब प्रश्न उठता है कि समुद्र में भी तो बहुत सारे जीव थे, उनका शिकार छोड़कर वह उपर उड़ने वाले पक्षियों की परछाई को ही क्यों पकड़ती थी? उत्तर स्पष्ट है – व्यक्ति स्वयं से ऊपर जिसे देखता हैं, यदि वहां तक नहीं पहुंच सकता तो उसे गिराकर स्वयं को ऊपर दिखाने का प्रयास करने लगता हैं, यही ईर्ष्या, अहंकार अथवा लालच का रूप है। अतः हनुमान जी सिंहिका से बिना कोई वार्ता किये वध करके आगे बढ़ जाते हैं।
लक्ष्य के निकट मृत्युलोक की बाधा के रूप में लंकिनी मिलती है जो कहती है – “मोर अहार जहां लगि चोरा”। बाहरी नेत्र दूसरों की भूल आसानी से देख लेते है किन्तु अक्सर आंतरिक नेत्र बंद होने के कारण हमें अपनी भूल दिखाई नहीं देती। यदि अपनी गलती भूल समझ आ जाए तो उसे सुधारना बहुत आसान है, किंतु दूसरों की गलतियों को सुधारना बहुत मुश्किल है। लंकिनी का यह वाक्य कि मैं सिर्फ चोरों को खाती हूं इसी बात की पुष्टि करता है, क्योंकि चोर तो लंका के भीतर बैठा है जो सीता को हर लाया है। लंकिनी वास्तविक चोर को आहार नहीं बनाती बल्कि वह चोरी का पता लगाने वाले श्री हनुमान जी को ही आहार बनाने की बात कहती है। अतः उसका वध करने की बजाए उसके भ्रम आवरण हटाना आवश्यक है। उसे हनुमानजी का मुक्का लगाना उसकी दृष्टि से पर्दा हटाने का प्रयास है जिसके हटते ही उसे सत्य दिखाई देने लगता है और वह कहती है कि उसे बहुत आनंद आ रहा है उसके सामने सत्य शीशे की तरह साफ है।
तीनों बाधाएं पार होने के बाद भी लक्ष्य प्राप्ति के लिए सद्गुरु का मिलना जरूरी है। दिन के समय में पहुंचने के बावजूद हनुमान जी लंका की यात्रा रात में करते हैं। क्योंकि दिन में तो मनुष्य अपने ऊपर कई प्रकार के आवरण लगाकर रखता है परंतु रात्रि में वह अपने मूल स्वरुप में होता है। सद्गुरु की पहचान ऐसे ही हो सकती है जो उन्हें विभीषण के रूप में मिलते हैं और भक्तिरुपी लक्ष्य अर्थात सीता माँ का पता बताते हैं जिससे हनुमान जी अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं। यही तीन बाधाएं प्रत्येक मनुष्य के जीवन में आती हैं तथा हनुमान जी की समुद्रयात्रा का मर्म उसे प्रत्येक बाधा का हल प्रदान करते हुए लक्ष्य का मार्ग प्रशस्त करता है।

लक्ष्य प्राप्ति को निकल पड़े तो पथ में कहाँ विराम है ?
बाधाओं से जूझ – जूझ कर बढ़ना अपना काम है।।

बाधाएं भी क्रम से आयें, हमें लक्ष्य से ये भटकायें।
पर सबका हल एक नहीं है, सोचें समझें फिर सुलझाएं
हर बाधा है एक परीक्षा, यह पथ का संग्राम है।
बाधाओं से जूझ – जूझ कर बढ़ना अपना काम है।।

पहली बाधा स्वर्गलोक से, पर यह कभी विरुद्ध नहीं।
गुरुजन सा सम्मान इसे दो, इस बाधा से युद्ध नही।
इनका लो आशीष चलो फिर जहाँ तुम्हारा धाम है।
बाधाओं से जूझ – जूझ कर बढ़ना अपना काम है।।

दूजी है पाताल लोक से, नष्ट इसे कर दो अविलम्ब।
यही रूप है अहंकार का, ईर्ष्या, लिप्सा लालच दम्भ।
दो बाधाएं पार हो चुकीं, पर चलना अविराम है।
बाधाओं से जूझ – जूझ कर बढ़ना अपना काम है।।

अंतिम मृत्युलोक की बाधा, लक्ष्य निकट तब इसने साधा,
इसे करो न पूर्ण नष्ट तुम, केवल इसको मारो आधा।
सद्गुरु मिल जायेंगे तुमको, बस अब नहीं विराम है।
बाधाओं से जूझ – जूझ कर बढ़ना अपना काम है।।

-  दीपक श्रीवास्तव

Saturday, August 4, 2018

--- पेट की आग से परे ---

हम सब एक ही परम सत्ता के अंश हैं।  एक ही तरह से हमने जन्म लिया है, अलग-अलग परिवेश में पलने के बावजूद हम सबके बचपन में एक जैसी ही मासूमियत रही है, एक जैसी किलकारियां, एक जैसा हंसना, एक जैसा रोना, एक जैसे शारीरिक परिवर्तन रहे हैं।   बाल्यावस्था से किशोरावस्था, किशोरावस्था से युवावस्था, युवावस्था से अधेड़ावस्था, अधेड़ावस्था से वृद्धावस्था तत्पश्चात जाने की तैयारी लगभग सभी के साथ एक सा ही है। फिर मनुष्यों के बीच इतने विरोधाभास क्यों, इतनी भिन्नताएं, एक दूसरे के प्रति ईर्ष्या, अमानवीयता की हदों को पार करने वाली गलाकाट प्रतियोगिताएं केवल उस सुख को प्राप्त करने के लिए जो सुख कभी हमारा रहा ही नहीं और न कभी हो सकता है।
जन्म लेना और जीवन जीना एक सहज प्रक्रिया है किंतु अनेक अवसरों पर यह सहजता प्रभावित होती है।  कभी सामाजिक दिखावे के लिए, कभी भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति के लिए, कभी इंद्रियों के सुख के लिए, कभी भीड़ से अलग दिखने के लिए, कभी पारिवारिक मोह के वशीभूत होकर तो कभी दूसरों को नीचा साबित करने के लिए व्यक्ति सहज से  असहज होने का प्रयास करता है। इस असहजता का छोटा सा स्पर्श भी व्यक्ति के अंदर कुंठा, असंतोष, ईर्ष्या जैसे तमाम विकारों को जन्म दे देता है।
 किंतु मानवीय स्वभाव अत्यंत सहज है। यदि हम किसी से प्रेम करते हैं तथा उससे प्रेम मिलता है तो हमें आनंद की अनुभूति होती है। शिशुओं की मुस्कान देखते ही चित्त प्रसन्न हो जाता है। सुंदर गीत संगीत सुनने  पर हृदय को सुकून मिलता है। यदि यही सहजता जीवन भर बनी रहे तो व्यक्ति प्रत्येक प्रकार की व्याधियों से दूर रहकर एक खुशहाल जीवन बिता सकता है। इसके विपरीत यदि हम किसी पर क्रोध करें या इर्ष्या करें तो तमाम नकारात्मक विचारों भावनाओं एवं ऊर्जाओं के चलते हमें भी कष्ट होता है तथा उसे भी कष्ट होता है। इससे यह तो स्पष्ट है कि मनुष्य का मूल स्वभाव ईर्ष्या, जलन के परे प्रेम एवं आनंद की प्राप्ति का है।
 पेट की आग सब कुछ नहीं होती, निरंतर एक अग्नि व्यक्ति के जीवन में जलती रहती है - आनंद की चाह, प्रेम की चाह, प्रेम करने की इच्छा। मन कहता है कि शहर से दूर कहीं प्रकृति के किसी सुरम्य वातावरण में बैठकर अपने हृदय का पोर-पोर खोल दें। न तो भौतिक सुख चाहिए, न घर, न पैसे -  कोई इच्छा नहीं जब प्रकृति की गोद में बैठे हो तो स्वतः एक आनंद की अनुभूति होती है यह है मनुष्य का सहज स्वभाव।  नीतिशास्त्र का प्रकांड विद्वान  लंकानरेश रावण जिसके महल में किसी भी प्रकार के भौतिक सुख का अभाव नहीं था वह भी यदि कुछ कामना करता है तो यही करता है कि हे शिव कब मैं इस भौतिक चमक दमक से दूर प्रकृति के किसी सुरम्य में कोने में बैठ कर आपके नाम को जपने का सुख ले पाऊंगा। इसका जिक्र रावण रचित शिव-तांडव-स्तोत्रम में भी है-


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कदा निलिंपनिर्झरी निकुंजकोटरे वसन्‌ विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥
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 आनंद की इस भूख को जीवन भर न मिटने दें।  पेट की आग के साथ-साथ इस आग को भी बनाकर रखें क्योंकि यही अग्नि हमें अपने जीवन के उद्देश्य से परिचित कराने का सामर्थ्य रखती है। अपने अस्तित्व के प्रश्नों से जूझने की बजाय उस अस्तित्व को महसूस करें क्योंकि जीवन में सब कुछ खोना पाना तभी तक है जब तक यह जीवन है-यही जीवन सबसे बड़ा सत्य है। दूसरों को सुख देने में जो आनंद है वह आनंद अन्यत्र कहीं नहीं।
 सच्चे आनंद की तलाश करने के लिए हमें बाहर कहीं भी जाने की आवश्यकता नहीं है। बस इसे अपने भीतर महसूस करें और हर पल इसे बाहर आने दें कभी प्रकृति की सुरम्य वादियों के साथ, कभी परिवार के साथ, कभी मित्रों के साथ। हर क्षण अपने मूल स्वभाव के साथ जिए यही वास्तविक आनंद है यही परम सुख है।

-  दीपक श्रीवास्तव

Friday, August 3, 2018

जीवन - विराटता की ओर

--- जीवन - विराटता की ओर ---

यूं तो धरती बहुत विशाल है, विशाल है महासागर की अथाह जलराशि और आकाश अनंत है। क्या कभी इनकी विशालता को सीमाबद्ध किया जा सकता है?  शहर से दूर - शांत भाव से कभी किसी समुद्र के किनारे बैठें तो दूर - बहुत दूर एक ऐसा स्थान दिखाई देता है जहां तीनों एक स्थान पर आकर मिलते हैं जिसे क्षितिज कहते हैं - यह है विशालता का सीमाबद्ध होना। ना आदि है, न अंत है, न शून्य है, ना अनंत है, किंतु यह एक असामान्य घटना नहीं है क्योंकि असामान्य कुछ भी नहीं होता। धरती, आकाश,  पवन,  खनिज,  पर्वत,  नदी,  इत्यादि जो कुछ भी है सब सामान्य है।  सामान्य है - कभी जंगलों में भटकता हुआ, कभी कंदमूल तो कभी दूसरे जानवरों के बासी मांस पर गुजारा करता हुआ मनुष्य जब आग और पहिए की खोज से आगे बढ़कर, विभिन्न पड़ावों को पार करता हुआ जब कंप्यूटर इंटरनेट जैसे महान अविष्कारों की ओर कदम बढ़ाता है तो लगता है कि व्यक्ति की क्षमताएं अनंत है। क्या इन क्षमताओं को सीमाबद्ध किया जा सकता है? शायद हाँ, शायद नहीं । क्योंकि अनन्त तो सृष्टि में सिर्फ एक ही तत्व है, वह परम तत्व जिसके कण जिस शरीर में हैं उसमें चेतना है। उन्हीं कणों के प्रभाव से सोच एवं शक्तियां अनंतता की ओर बढ़ती जाती हैं।
 यूं तो मनुष्य का जीवन अत्यंत सामान्य है किंतु इसे विशालता और असामान्यता की श्रेणी तक पहुंचाना एक विशिष्ट प्रक्रिया है। हर व्यक्ति के जीवन में एक ऐसा क्षण अवश्य आता है जब उसे यह अवसर मिलता है कि वह अपने जीवन से ऊंचा उठ कर साधारण से एक असाधारण व्यक्तित्व बन सकता है। यदि उस क्षण को पहचान गए तभी अपनी असीमित ऊर्जा का सही उपयोग कर सकते हैं। जब हम किसी के द्वार जाकर या किसी की चापलूसी द्वारा आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं तो यकीन मानिए हम स्वयं को खो रहे होते हैं क्योंकि यह सब समझौते हैं।  किंतु जीवन में कुछ मौकों पर समझौते करना आवश्यक हो जाता है। समझौते करें तो किस से करें - यह प्रश्न उठता है। जो व्यक्ति इसकी पहचान कर लेता है वही असाधारण व्यक्तित्व बनने की दिशा में वास्तविक कदम उठा पाता है।
 जीवन एक यात्रा है अतः हम सभी चल रहे हैं।  घर में, बाहर में, भीड़ में, अकेले में, स्वप्न में, जाग्रत में, शून्य में, अनंत में, विचार में,  विचारशून्यता में।  यह यात्रा अनवरत चल रही है।  जब भीड़ में अकेलेपन का एहसास होने लगे तो समझ लें कि अब दिशा परिवर्तन की आवश्यकता है।  चूंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है अतः उसके अंदर सामाजिक सुरक्षा  पाने की भावना है। वह समाज का एक हिस्सा बनकर जीना चाहता है। उसके मित्र हैं, भाई हैं, परिवार है, इन सबके बीच होकर वह अपने आप को सुरक्षित महसूस करता है और इनसे दूर होने का विचारमात्र ही उसके मन में अकेलेपन का बोध कराने लगता है। बस यही है भीड़ में होते हुए भी अकेलेपन का एहसास।
जब भीड़ से ऊपर उठकर व्यक्ति अपने अंतर्मन में जाग्रत चेतना की पुकार सुनता है तब कहीं जाकर वह एक स्वतंत्र व्यक्तित्व का रूप धारण करता है। यह पुरुषत्व से महापुरुषत्व की ओर बढ़ता हुआ कदम है। ऐसी स्थिति में वह अनेक व्यक्तियों को अपने व्यक्तित्व में समेट लेने की क्षमता रखने लगता है।  उदाहरणस्वरूप कोई भी महापुरुष चाहे वह राम हों, कृष्ण हों, स्वामी विवेकानंद, शहीद अशफाक उल्ला खां या राम प्रसाद बिस्मिल हों यह भीड़ में खोए हुए व्यक्ति नहीं है बल्कि स्वतंत्र व्यक्तित्व है जो भीड़ में होकर भी भीड़ से अलग अपने स्वतन्त्र व्यक्तित्व के रूप में सदा जीवित हैं। जैसे ही मैंने कहा कि मैं फलां जैसा बनना चाहता हूं इसका सीधा अर्थ यह है कि उस व्यक्तित्व ने मेरे व्यक्तित्व को अपने भीतर समेट लिया।  यह है एक असाधारण व्यक्तित्व की पहचान।
 यदि मनुष्य जन्म मिला है, क्षमताएं मिली हैं तो वह सब करें जो हमारे जीवन को हमारी चेतना से एकाकार करती हैं।  यही जीवन का उद्देश्य है, यही परम सुख है, यही अनहद नाद है,  यही है जीवन की विराटता।

-  दीपक श्रीवास्तव

Thursday, August 2, 2018

जीवन का लक्ष्य - वृक्ष या पर्वत

जीवन में ऊंचाइयों को पाना किसे अच्छा नहीं लगता।  ऊंचाइयों का पैमाना सबके लिए अलग-अलग है सबकी अपनी-अपनी सोच है अपनी अपनी इच्छा शक्ति है।  वृक्ष बने या पर्वत यह हमारी अपनी सोच पर निर्भर करता है।  दोनों  का अपना अपना संघर्ष है अपनी-अपनी चुनौतियां है।
 वर्तमान में हर व्यक्ति वृक्ष बनने के लिए संघर्ष कर रहा है। कोई रोप दे, कोई  सींच दे,  बस वृक्ष का आकार ले लें  और अपनी इस उपलब्धि पर गौरवान्वित महसूस करें।  किंतु इससे व्यक्तिगत प्रगति तो मिल जाती है,  व्यक्तिगत  लक्ष्य मिल जाता है किंतु जीवन का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता।  वृक्ष कभी भी  तूफानों से सामना नहीं कर सकता क्योंकि वह अपने आधार पर टिका हुआ होता है।  बिल्कुल वैसे ही जैसे एक व्यक्ति अपने सारे संबंधों का उपयोग करता हुआ एक लक्ष्य प्राप्त कर लेता है और अपने आप को समाज से अलग मानते हुए जीवन जीता है।  अक्सर ऐसे व्यक्ति जीवन में नाम तो पा लेते हैं किंतु उनका जीवन एकाकी हो जाता है स्टार डम के कारण सामान्य जनता से जुड़ने में उन्हें कठिनाई होती है।  ऐसी ऊंचाइयों किस काम की जो व्यक्ति को समाज से ही अलग कर दे।
 इससे भी अधिक संघर्षों से जूझकर धरती की प्लेटे जब टकराती हैं अंदर से ज्वार उठता है तब कहीं जाकर एक पर्वत का निर्माण शुरू होता है जो अनेक वर्षों तक चलता है।  पर्वत किसी एक व्यक्ति की स्वतंत्र उपलब्धियों का प्रतीक नहीं है।  यह तो प्रतीक है समवेत स्वर में उठते नादों का,  समाज के हर व्यक्ति के अंदर हिलोरे लेती भावनाओं के ज्वार के आकार  लेने का।  और ऊंचाइयां इतनी कि ऊंचे से ऊंचे तमाम वृक्ष भी उसके अंदर चींटी से भी छोटे लगने लगें।  इतने संघर्ष के साथ, इतनी सबल भावनाओं के साथ जब पर्वत आकार लेता है तब उसमें इतनी शक्ति आती है कि वह तूफानों को भी रोक सकता है आवारा बादलों को थाम कर उनसे प्रेम की वर्षा करा सकता है,  अनेक प्राणियों का आश्रय बनकर उन्हें जीवन दे सकता है।  पर्वत बनने के लिए व्यक्ति को अहंकार से मुक्त होना पड़ता है समाज की शक्ति पहचानी पड़ती है।
 वृक्ष में अहंकार तत्व है इसीलिए शक्तिशाली तूफानों क सामने वृक्ष को झुकना पड़ता है। पर्वत अहंकार मुक्त है बड़े-बड़े तूफानों को भी उसके सामने अपनी दिशा बदलनी पड़ती है।

-  दीपक श्रीवास्तव

Tuesday, July 3, 2018

आत्मा से महात्मा से परमात्मा


आत्मा एक स्वतंत्र सत्ता है जिसका संघर्ष, प्रयास एवं गति स्वयं के हित के लिये होता है ।  यह एक बालक के समान है जिसका प्रयास जीवन में कुछ ऐसा करने का है जिससे उसका भविष्य सुन्दर हो।

महात्मा वह सत्ता है, जिसका संघर्ष स्वयं के साथ साथ दूसरे मनुष्यों के हित के लिये है ।  यह एक विवाहित पुरुष या स्त्री के समान है जिसे स्वयं के साथ साथ अपने साथी के बेहतर भविष्य हेतु प्रयास करना है ।

परमात्मा वह सत्ता है जिसका सतत संघर्ष स्वयं द्वारा निर्मित कृतियों को बेहतर बनाने हेतु होता है । उसे अपनी चिंता नहीं होती ।  यह माता-पिता के समान है जिनका हर प्रयास अपने बच्चों के जीवन को बेहतर बनाने के लिये है । 

बड़ी विडम्बना है कि वर्तमान समाज में हम स्वयं के हित से ऊपर उठकर नहीं सोच पा रहे हैं और यात्रा जो आत्मा से परमात्मा तक की होनी चाहिये वह आत्मा पर ही समाप्त हो जाती है।

आइये मिलकर एक बेहतर समाज की रचना करें और अपने अन्दर बसे परमात्मा तत्व को महसूस करें ।

- दीपक श्रीवास्तव 

Monday, April 23, 2018

मालवीयन पारिवारिक मिलन - प्रथम भाग

तप से जीवन, जीवन में कर्म, कर्म से पुरुषार्थ, पुरुषार्थ से सेवा तथा सेवा में आनन्द| यदि इसके सजीव स्वरुप को एक सम्पूर्ण समाज के रूप में देखना हो तो मालवीयन जगत के अतिरिक्त दूसरा विकल्प नहीं हो सकता | इसे दिनांक 22 अप्रैल 2018 को दिल्ली में आयोजित मालवीयन पारिवारिक मिलन के दौरान मैंने प्रत्यक्ष अनुभव किया| 1971 से लेकर 2018 तक के  पुरातन विद्यार्थियों का यह महामिलन कई मायनों में अद्भुत था| इनमे से कई ऐसी महान विभूतियाँ सम्मिलित रहीं जिन्होंने राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर पर देश का मान-सम्मान बढ़ाया है जिनकी परछाइयाँ मात्र ही अनगिनत परिवारों को विभिन्न माध्यमों से जीवन की लौ देने का कार्य कर रही हैं चाहे वह रोजगार के माध्यम से हो या सेवा के माध्यम से|
आज के दौर में जहाँ दिखावे में मनुष्य अपना मौलिक स्वरुप ही खोता जा रहा है, वहाँ शीर्ष पर बैठे व्यक्तियों की सहजता एवं सरलता आश्चर्यचकित करने वाली है| आदरणीय ए. पी. मिश्रा सर, वी. सी. सर, श्री गोपाल मिश्रा सर, श्री धर्मेन्द्र श्रीवास्तव सर, श्री नितेश गौतम जी, हिमांशु मिश्रा सर, प्रतीक राजवंशी सर, श्री राजेश श्रीवास्तव सर, श्री अखिलेश सर जैसी अनेक विभूतियाँ वहाँ उपस्थित थीं, जिनको देखकर लगता ही नहीं कि हम कलयुग में जी रहे हैं| परमात्मा भी प्रत्येक दौर में सन्तुलन बनाकर रखता है, ठीक उसी प्रकार जहाँ व्यक्ति ह्रदय में नफरत लिए एक आभासी दौर में प्रतिदिन जीवन के साथ संघर्ष कर रहा है वहीँ मालवीया एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है जिसकी आज के समाज को सर्वाधिक आवश्यकता है|  दिनकर जी की पंक्तियाँ याद आती हैं -
"पग पग पर हिंसा की ज्वाला, चारों ओर गरल है ।
मन को बांध शांति का पालन, करना नहीं सरल है ।
तब भी जो नरवीर असिव्रत दारुण पाल सकेंगे ।
वसुधा को विष के विवर्त से वही निकाल सकेंगे ॥"
आज हमारा देश अत्यन्त विषम परिस्थितियों के दौर से गुजर रहा है जिसमे विभिन्न दीवारें खड़ी हो गयी हैं जहाँ नहीं हैं वहाँ भी बांटने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा हैं | इन विषम परिस्थितियों में प्रेम के मौलिक स्वरुप पर अनेक आवरण एवं भ्रामक परिभाषाये गढ़ दी गई हैं किन्तु अत्यन्त गर्व से यह बात कहता हूँ कि मैं उस मालवीयन परिवार का हिस्सा हूँ जहाँ प्रत्येक सदस्य की आँखों में इन परिभाषाओं के आर-पार देखने की क्षमता है तथा वैश्विक पटल पर हम एक परिवार के रूप में सुन्दर एकीकृत समाज की रचना के अग्रणी हो सकते हैं|
कल इस पारिवारिक मिलन में मेरी प्रथम उपस्थिति थी, और वहाँ पहला कदम रखते ही मुझे यह भान हो गया था, कि लगभग तेरह वर्षों से मैं इन अमृत की बूंदों से कितना दूर था| इस कई अग्रजों, अनुजों से गले मिलने का सुख प्राप्त हुआ और असीम आनन्द की प्राप्ति हुई |
आपसे बहुत सी बातें और करनी हैं किन्तु यह लेख लम्बा हो गया है तथा समय का बढ़ता काँटा ऑफिस जाने का इशारा कर रहा है| कल मै वहाँ के कुछ अनुभव भी साझा करूँगा|

- दीपक श्रीवास्तव

Sunday, April 22, 2018

जैसे चुनरिया लहरे धानी - भारतीय किसान

आज आपके सामने एक बहुत पुराना आंचलिक गीत प्रस्तुत है जो भारतीय संस्कृति की महत्वपूर्ण कड़ी भारतीय किसान के जीवन का सजीव दृश्य प्रस्तुत करता है ।  गीत के रचनाकार का नाम तो नहीं पता किंतु लोकभाषा में रचित यह गीत जन जन के मन का संगीत है ।  इसे एक कार्यक्रम के दौरान मैंने लाइव प्रस्तुत किया है ।

https://youtu.be/3KWem0rwtx4

- दीपक श्रीवास्तव 

Monday, April 9, 2018

--- क्या भूलूँ क्या याद करूँ ---

 डा. हरिवंश राय बच्चन जी की यह कालजयी कृति प्रस्तुत है ।  इस गीत की संगीत रचना में मैंने चंचल प्रकृति के राग खमाज की हल्की सी छाया का प्रयोग किया है ।  इसे सुनें और अपने हृदय में महसूस करें ।

- दीपक श्रीवास्तव

https://youtu.be/HDexlSCZkg8

Thursday, April 5, 2018

--- बुद्धिजीवी या अधजल गगरी ---

आपकी दृष्टि में बुद्धिजीवी वर्ग में कौन आते हैं ।  मैंने अपने अनुभव से यही समझा है कि जो अपने अधकचरे ज्ञान के बलबूते पर स्वयं को सबसे बेहतर सिद्ध करने का प्रयास करे वही आज के दौर का तथाकथित बुद्धिजीवी है । 

यदि आज यदि हम सभ्यता एवं संस्कृति से निरन्तर दूर होते जा रहे हैं तो उसके पीछे इन तथाकथित बुद्धिजीवियो के योगदान को नकारा नहीं जा सकता ।  ये उसी वर्ग से हैं जो राम, कृष्ण, शिव जैसे संस्कृति के आधारस्तम्भों पर शायद पूरे दिन बहस कर सकते हैं किंतु हमारे पौराणिक ग्रंथ इनके बारे में क्या कहते हैं इन्हें तनिक भी भान नहीं होता क्योंकि हम पुस्तकों से दूर होते जा रहे हैं ।  घरों में श्रीरामचरितमानस अवश्य उपस्थित रहता हैं किंतु उसकी उपस्थिति केवल भौतिक रूप से ही होती है । 

ज्ञान का न होना लज्जा की बात नहीं है । लेकिन अधकचरा ज्ञान केवल स्वयं के लिये ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र के लिये आत्मघाती होता है । इसका सबसे निराशाजनक पहलू यह है कि यदि संस्कृति से सम्बंधित परिचर्चा हो रही हो तो वहां या तो ऐसे विद्वान उपस्थित होते हैं जिन्होंने संस्कृति को अंतरमन में आत्मसात किया है या ऐसी जनता है जिनमें साक्षरता अत्यंत कम है ।  बुद्धिजीवी वर्ग ऐसे स्थानों पर या तो नहीं जाते या केवल उपस्थिति दर्ज कराने हेतु कुछ समय के लिये दिखाई दे जाते हैं ।

सूरसागर के अनुसार गोपियां ज्ञानी नहीं थीं अतः बिना अपनी बुद्धि का प्रयोग किये श्रीकृष्ण की भक्ति को ही जीवन का आधार मानती थीं उन्हें उधव के ज्ञान में भले ही रुचि नहीं थी किंतु उनका सम्मान किया किंतु अपना आधार श्रीकृष्ण को ही माना । यह सार्थकता की ओर की गति थी ।  किंतु आज राजनीति की गलाकाट प्रतियोगिता ने इतने भ्रम पैदा किये हैं कि देश में अराजकता धीरे धीरे पांव पसार रही है ।  जो जनता भोली भाली है उसे बहला फुसला कर अपने स्वार्थ के लिये उपयोग करते हैं और जनता श्रीकृष्ण की तरह उनपर भरोसा कर लेती है जबकि उनमें कृष्ण का चरित्र लेशमात्र भी नहीं है ।  इस प्रकार राजनैतिक समीकरण बदल जाते हैं और बुद्धिजीवी वर्ग केवल सही-ग़लत की चर्चा में ही उलझकर रह जाता है ।

- दीपक श्रीवास्तव

Wednesday, April 4, 2018

--- राम राम भाई साहब ! ! ---



आज बाज़ार से लौटकर घर आ रहा था तभी पीछे से एक बहुत पुरानी जानी पहचानी सी आवाज़ सुनाई पड़ी - राम राम भाई साहब! !  मैं चौंक गया क्योंकि इस प्रकार की मिठास ली हुई राम राम अरसे बाद सुन रहा था ।  आवाज एक मुस्लिम नाई की थी जिसके सैलून में मैं अपने प्रारम्भिक संघर्ष दिनों में जाया करता था ।  दुआ सलाम के साथ साथ उसने यह भी बताया कि वह मेरे गाये हुए भजनों को भी सुनता है तथा अपने परिवार को भी उनसे जोड़कर रखता है । 

राम के नाम पर हिंसा, गाली गलौच, या अन्य कुकृत्य करने वालों से पूछना चाहता हूं कि क्या कभी राम को समझने की कोशिश भी की है या बस किसी ने भड़काया और सस्ती लोकप्रियता के चक्कर में दूसरों को कोसना शुरू कर दिया चाहे वह जाति के नाम पर हो या धर्म के नाम पर ।

गंदी और ओछी राजनीति का अंत अब बहुत जरूरी है क्योंकि अब हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं ।  कभी वायु प्रदूषण, कभी जल प्रदूषण तो कभी मानसिक प्रदूषण ।  क्या यही जीवन हमारे और हमारे बच्चों के भाग्य में है । बोतलों का पानी पियो, मास्क लगाकर बाहर निकलो और कुछ भी बोलने पर जान का खतरा ।  क्या स्वस्थ और सुसंस्कृत समाज की रचना हमारे द्वारा हो रही है ।  शायद हमें ऐसे ही जीने की आदत पड़ती जा रही है ।

- दीपक श्रीवास्तव

Sunday, April 1, 2018

--- ज्ञान भाषा एवं अभिव्यक्ति ---

भाषा सिर्फ माध्यम है । वहीं ज्ञान का स्थान बहुत उच्च है ।  ज्ञान का विलोम अज्ञान है ।  पाठ्य पुस्तकों में उपलब्ध जानकारियां अभ्यास द्वारा साधी जा सकती हैं किंतु वह विद्या है ज्ञान नहीं ।  भारतीय वेदांत में इसावास्योपनिषद के अनुसार विद्या के विपरीत अविद्या तत्व है ।  ज्ञान अनुभव की चीज है ।  उसकी अभिव्यक्ति हेतु विभिन्न माध्यम हो सकते है जिनमें भाषा भी है लिपि भी है, श्रव्य भी है, द्रश्य भी है, मौन भी है, विरोध भी है, सहयोग भी है, रंजना भी है, अभिव्यंजना भी है ।

जो हमारी प्रमुख भाषा है हमारा मस्तिष्क भी उसी को जानता समझता है अतः अभिव्यक्ति सहज हो जाती है किंतु किसी अन्य भाषा में की जाने वाली अभिव्यक्ति हेतु भले ही जबान सहज हो किंतु मस्तिष्क को उसे ग्रहण करने के लिये अपनी मूल भाषा में अनुवाद करना पड़ता है फिर उसका उत्तर देता है तत्पश्चात मस्तिष्क उसे सम्वादित भाषा में अनुवाद करता है तब जाकर हम अपने कंठ से उस भाषा में बात कर पाते हैं ।  यही कारण है कि अन्य किसी भी भाषा में हमारी सहजता प्रभावित होती है चाहे हमारे लिये अंग्रेजी या अमेरिकी अथवा अन्य किसी भी देश के नागरिकों के लिये हिन्दी ।

- दीपक श्रीवास्तव 

Tuesday, March 27, 2018

----शिवोहम----

आंखें आन्तरिक सुन्दरता देखने में सक्षम हैं क्योंकि व्यक्ति को तीन नेत्रों का वरदान प्राप्त है ।  शिव के त्रिनेत्र का भी यही स्वरूप है ।  तब तक पूर्णता नहीं है जब तक केवल बाह्य अथवा आंतरिक नेत्र खुले हैं ।  जब तक बाहर की दो आँखें बंद है तब तक भौतिकता का सुख नहीं और जब तक आंतरिक नेत्र बंद हैं तब तक शांति नहीं ।  इन दोनों का सन्तुलन ही आनंद है ।

सर्वजगत शिवरूप ही है ।  त्रिनेत्र, त्रिशूल, त्रिलोक उन्ही के हैं । 
शिवोहम का भाव मनुष्य को प्रत्येक विकार, सुख दुख , राग अनुराग इत्यादि से मुक्त करके उसकी आंतरिक सत्ता को स्वयं से जोड़ता है ।


-दीपक श्रीवास्तव

Saturday, March 24, 2018

तुम ही सब कुछ हो

बिना तुम्हारे कण न डोले ।
कंठ मेरे, पर तू ही बोले ॥
ज्ञान तुम्ही, तुम ही स्वर मेरे ।
हम तो केवल करते फेरे ॥

- दीपक श्रीवास्तव

Monday, March 12, 2018

-- अभिव्यक्ति की भाषा --

भले ही लिपियों में बद्ध भाषा अभिव्यक्ति की सशक्त माध्यम है किन्तु उसमे भी अधूरापन है ।  मौन की भाषा, एक हृदय से निकलकर दूसरे हृदय को तरंगायित कर सकने में सक्षम संगीत की भाषा, प्रकृति की भाषा, हमारे मन के अक्षरों को अपनी नन्ही आँखों से पढ़कर उसका उत्तर देती नन्हे शिशु की आत्मा की भाषा इन सबसे परे है । इन्ही का अनुभव करके  व्यक्ति जीवंत एवम् चेतन हो सकता है तथा स्वयं को पहचानने की प्रक्रिया प्रारंभ करता है ।

-दीपक श्रीवास्तव

Saturday, March 10, 2018

-- नारी: मर्यादा या स्वतंत्रता --


नारी किसी भी घर परिवार की ऐसी महत्वपूर्ण कड़ी है जिसमे नैसर्गिक रूप से मर्यादायें एवं संस्कृति तथा सभ्यता समाहित होती है । यदि घर की मान मर्यादा की बात भर भी हो तो मस्तिष्क में उभरने वाला प्रथम दृश्य ही घर की बहू-बेटियों का ही आता है जो सीधे सीधे इस ओर संकेत करता है कन्या घर की संस्कृति है, घर की परम्परा है, घर की पहचान है । वही पुरुष घर का आवरण है। जहाँ नारी मर्यादा है वही पुरुष स्वतंत्रता का प्रतीक है । मर्यादा तथा स्वतंत्रता के मध्य सन्तुलन ही एक सुन्दर एवम् प्रगतिशील समाज की रचना करने में सक्षम है ।
यदि हम विष्णु तथा शिव के स्वरूप को देखें तो वहाँ भी हमें यही संतुलन दिखाई देता है ।  विष्णु जहां मर्यादा के मापदंड स्थापित करते हैं वही शिव का शाश्वत स्वरूप उन्ही मापदंडों का उपहास करते दिखाई देते हैं । क्योंकि मर्यादायें परिस्थितियों की आवश्यकता के अनुसार निर्मित होती है ।  समय के साथ इनमें परिवर्तन आवश्यक होता है ।  समय की गति के साथ जब परम्परायें रूढ़ियां बनने लगें तब उनका विध्वंस आवश्यक हो जाता है । यही सन्तुलन की परकाष्ठा है ।
युगों युगों से समाज की रचना इसी सन्तुलन पर आधारित रही है । समय एवं परिस्थितियों के आधार पर नारी ने अपने कार्यक्षेत्र में परिवर्तन किया है तथा समाज की रक्षा की है चाहे वह शिक्षा के क्षेत्र में हो या युद्ध के क्षेत्र में, हर जगह उसने मर्यादा के नये मापदंड स्थापित किये हैं परन्तु दुर्भाग्य वश इनमें से कुछ परम्परायें रूढ़ियां बनी जिसके ध्वंस के लिये पुरुषों को आना पड़ा । 
नारी को ईश्वर ने ऐसा सुन्दर उपहार दिया है जिससे वह प्रत्येक स्थान पर सम्-विषम प्रकृति के लोगों को भी आसानी से स्वीकार कर पाती है तथा उनके मध्य भी सन्तुलन स्थापित करने में सक्षम है । यही कारण है कि नारी दो परिवारों को जोड़ने का कार्य अत्यन्त सफ़लता एवम् सहजता से कर लेती है ।  यही कारण है कि नारी हर युग में पूजित रही है, पूजित है तथा पूजित रहेगी ।  जो भी शक्ति इस सत्य को अस्वीकार करती है या उपहास करती है उसे नष्ट होने से विश्व की कोई भी शक्ति नही रोक सकती ।

-दीपक श्रीवास्तव 

Thursday, March 8, 2018

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष

---अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष ---

कुछ बातें बड़ी प्रचलित हैं जैसे समानता का अधिकार, पुरुषवादी विचारधारा, महिला दिवस इत्यादि इत्यादि ....

जब ईश्वर ने सृष्टि की रचना करते समय मनुष्य समेत अन्य जीवों के भी दो प्रमुख स्वरूपों में कोई भेद नही किया तो हमने आज के युग में इतना भेद कैसे उत्पन्न कर दिया ? 

यदि हम कहते हैं - समानता का अधिकार - इसी में परोक्ष रूप से हम मान लेते हैं कि कही कोई असमानता है जो वास्तव में है नही लेकिन यह हमारी छोटी एवम् कुंठित सोच को प्रदर्शित तो कर ही देता है ।  आज महिला दिवस मनाने की जरूरत क्यों पड़ रही है - क्योंकि हमने समाज, परिवार तथा देश की इस महत्वपूर्ण नींव को कमजोर मान लिया है तथा उसे सहारा देने, आगे बढ़ाने, सशक्तीकरण या समानता का अधिकार जैसे चमत्कारी शब्दों के माध्यम से अपनी मानसिक बीमारी को छिपाने प्रयास किया है।

नारी कमजोर नही है-कमजोर है हमारी सोच, बीमार है मानसिकता, भ्रष्ट है हमारा विवेक, भ्रमित है हमारा समाज ।  नारी के सम्मान की रक्षा से अधिक आज की जरूरत स्वयं के सम्मान की । जब व्यक्ति स्वयं का समुचित सम्मान करना सीख लेता है जिसमे शरीर, मन तथा आत्मा सबका सम्मान समाहित हो तो उसकी बुद्धि किसी भी परिस्थिति में विकृत नही हो सकती ।  ऐसी स्थिति में नारी, शिशु अथवा किसी भी अन्य सामजिक अंग के लिये अलग से किसी अधिकार अथवा देखरेख की आवश्यकता नही होगी तथा सामाजिक एवम् ढांचा भी सशक्त एवम् अखण्ड होगा । 

अतः अंत में यही कहूंगा कि पुरुष तथा स्त्री दोनों ही विशिष्ट हैं अतः दोनों को मिलकर ही सामाजिक एवम् पारिवारिक आधार को सबल बनाना है ।

- दीपक श्रीवास्तव 

Tuesday, August 1, 2017

------शिव-विष्णु: सामाजिक मर्यादा-स्वातंत्र्य का सन्तुलन------

हमें अक्सर समाज में अनेक विरोधाभास दिखाई देते हैं | समान परम्पराओं को मानने वालों में भी सोच की भिन्नताएं | एक वर्ग सामाजिक परम्पराओं को जीवन का आधार मान लेता है, वहीँ दूसरा वर्ग इसे रूढ़िवादिता का स्वरुप मानते हुए सर्वथा अस्वीकार करता है तथा स्वतन्त्रता हेतु संघर्ष करता दिखाई देता है | किन्तु दोनों एक ही समाज के अभिन्न अंग हैं |
यही विरोधाभास भगवान विष्णु तथा शिव के स्वरुप एवं उनके क्रियाकलापों में दिखाई देता है | दोनों का वर्ण विपरीत है – एक श्याम है तो दूसरा गौर | एक सुन्दर वस्त्रों एवं आभूषणों से सुसज्जित है तो दूसरा वस्त्रों का विग्रह स्वीकार करता है | एक सामाजिक मर्यादाओं के मापदंड स्थापित करता है तो दूसरा अपने प्रत्येक क्रियाकलाप में इन मर्यादाओं का उपहास करता है | एक सामाजिक संरचना एवं नियमों को स्थापित करता है तो दूसरा इसके विपरीत स्वतन्त्रता का पक्षधर है | परन्तु दोनों तत्व एक ही ईश्वर के दो रूपों को प्रतिविम्बित करते हैं | दोनों स्वरुप एक दूसरे के पूरक तथा सर्वथा अभिन्न हैं | इन दोनों के बीच का सन्तुलन ही एक सुस्पष्ट, संस्कारी तथा प्रगतिशील समाज की रचना करने में सक्षम है |
सामाजिक संरचना में नियंत्रण के साथ-साथ स्वतन्त्रता की अभिव्यक्ति भी आवश्यक है अन्यथा उनका पालन करते करते परम्पराएं रूढ़ियाँ बन जाती हैं और समाज इनमे दम तोड़ने लगता है | स्वतंत्रता एवं नियंत्रण परस्पर विरोधी भले ही लगती हों लेकिन दोनो ही एक दूसरे से सर्वथा अभिन्न हैं | स्वतन्त्रता का अधिकार व्यक्ति का सहज स्वभाव है, किन्तु प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में पूर्ण स्वतंत्र होते हुए भी सामाजिक संरचना का अभिन्न अंग है अतः समाज के संरक्षण हेतु व्यक्तियों की स्वतंत्रता पर नियंत्रण भी अति-आवश्यक है | नियंत्रण भी ऐसा हो कि मर्यादाओं के बन्धन में दम न टूटे | यहीं से सन्तुलन की प्रक्रिया आरम्भ होती है | जहाँ विष्णु मर्यादा के संरक्षक हैं वहीँ शिव स्वतन्त्रता के प्रतीक |
शिव समता के मूलक के रूप में दिखाई देते हैं | असुरों तथा देवताओं पर उनकी समान रूप से कृपादृष्टि दिखाई देती है वहीँ विष्णु देवताओं का पक्ष लेते दिखाई देते हैं | देवता आध्यात्मिक तो असुर भौतिक वृत्तियों के प्रतीक हैं | यही कारण है कि असुर भोग की ओर आकर्षित होते हैं | प्रत्येक भोगवादी व्यक्ति स्वेच्छाचार की छूट चाहता है और शिव के वाह्य स्वरुप को न समझ पाने के कारण शिव के स्वरुप को स्वतन्त्रता का पर्यायवाची मानने लगता है | यही कारण है कि शिव का स्वरुप समझे बिना अपने स्वयं के भ्रान्त धारणाओं के आधार पर उसके अन्दर शिव के प्रति सहज आकर्षण जागता है | बदलती जीवन शैली एवं सभ्यता के मशीनीकरण द्वारा संचालित होने के कारण अपने आप को इतना बंधा हुआ महसूस करता है कि भगवान् शिव का नग्न स्वरुप एवं उनके साथ जुड़े मादक पदार्थ उसे अपने जीवन के लिए स्वतन्त्रता का बोध कराने लगता है |
बाहरी रूप से मर्यादा के विरुद्ध दिखाई देना वाला शिव-स्वरुप उनके अनंत स्वरुप का परिचायक है | जब परम्पराएं एवं रूढ़ियाँ समाज की प्रगति की दिशा में अवरोध उत्पन्न करने लगें तो उनका विध्वंस आवश्यक हो जाता हैं | मर्यादाओं का निर्माण परिस्थितियों पर आधारित होता है अतः परिस्थितियों के परिवर्तन के आधार पर इनमे परिवर्तन भी आवश्यक है | मर्यादा के नाम पर जब समाज सत्य से भटकने लगता है, दिखावे को ही सत्य समझने लगता है तब शिव का शाश्वत स्वरुप उनका उपहास करता दिखाई देता है | उनकी नग्नता उनके अन्तर तथा वाह्य स्वरुप के बीच की समता को स्पष्ट करती है | जिन्हें इनमे मर्यादा का अभाव दिखता है वे वास्तविकता से दूर अपनी वासना को आवरण में ढके रखने का दुष्प्रचार कर रहे होते हैं | शिव स्वरुप में कोई भोग कामना नहीं है जिसे छिपाने हेतु आवरण की आवश्यकता हो | अतः प्रत्येक नग्न व्यक्ति शिव उपासक है यह आवश्यक नहीं | वहीँ सामाजिक लोक व्यवहार में आवरण एवं मर्यादाएं व्यक्ति को सुरक्षा तथा प्रगतिगामी दृष्टि देती हैं | यही विष्णु का स्वरुप है |
शिव और विष्णु वस्तुतः एक ही समाज के दो भिन्न पक्ष हैं जो एक दूसरे के पूरक हैं |


--दीपक श्रीवास्तव