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Thursday, April 2, 2020

श्रीदुर्गासप्तशती द्वितीय अध्याय (काव्य रूपान्तर)

श्री दुर्गासप्तशती काव्यरूप
(द्वितीय अध्याय)

विनियोग मन्त्र
ॐ मध्यम चरित्रस्य विष्णुर्ऋषिर्महालक्ष्मीर्देवता, उष्णिक् छन्दः शाकम्भरी शक्तिः, दुर्गा बीजं, वायुस्तत्त्वं, यजुर्वेदः स्वरूपं, श्री महालक्ष्मीप्रीत्यर्थं मध्यमचरित्रजपे विनियोगः॥

ध्यान
कमलासन पर तुम्ही विराजित,
महिषासुरमर्दिनी भवानी।
भक्ति महालक्ष्मी की मिलकर,
करें देवता, ऋषि,मुनि ज्ञानी।।
कर-कमलों में फरसा, घण्टा,
अक्षमाल, धनु, बज्र, कुण्डिका।
गदा, बाण, मधुपात्र दण्ड है,
खड्ग, ढाल व शूल, चक्र है।
पद्म, शंख अरु पाश धारती,
शक्ति स्वरूपा तेरी आरती।।

("ॐ ह्रीं" ऋषिरुवाच)

पूर्वकाल में देवासुर में, सौ वर्षों तक युद्ध हुआ।
असुरों का स्वामी महिषासुर, देवजनों से क्रुद्ध हुआ।।

समरांगण में देवजनों की, महायुद्ध में हार हुई।
महिषासुर अधिपति बन बैठा, इन्द्रदेव की हार हुई।।

ब्रह्मदेव के पास देवता, गए हार का दुःख लेकर।
जहाँ हरी-हर दोनों बैठे, पहुंचे वे विनती लेकर।।

महिषासुर का प्रबल पराक्रम, देवेश्वर को समझाया।
कैसे हुए पराजित सुरगण, दीनभाव से बतलाया।।

बोले महाविकट महिषासुर, अधिपति बनकर ऐंठा है।
सूर्य, इन्द्र व देवजनों का यज्ञभाग ले बैठा है।।

देवों का अधिकार गया, वे स्वर्गलोक से भागे हैं।
तथा मनुज की भांति विचरते, भू से आश्रय मांगे हैं।।

सारी घटना सत्य बताई, अब तेरे शरणागत हैं।
तुमसे ही बस आस बंधी है, हम तेरे ही साधक हैं।।

सुन देवों के करुण वचन, हरिहर को भीषण क्रोध हुआ।
भौंह तनी, मुख वक्र हुआ, दोनों को अनुपम रोष हुआ।।

चक्रपाणि श्रीहरि के मुख से, निकला तेज महाविकराल।
शिव समेत देवों के तन से, प्रबल तेज की निकली ज्वाल।।

तेजपुंज सब एक हुए, पर्वत सी ज्वाला बनी महान।
दिग-दिगन्त में व्याप्त हो गई, लौटाने देवों का मान।।

देवजनों से प्रगटी ज्वाला, कोटि सूर्य से भी विकराल,
फिर वह नारी रूप हुई, जैसे असुरों का भीषण काल।।

उनका अपना ही प्रकाश था, व्याप्त तीन लोकों में थी।
उन सी सुन्दर, धीर-वीरता, नहीं स्वप्नलोकों में थी।।

देवी का मुख प्रकट हुआ, शिवजी के अनुपम तेज से।
केश हुए उत्पन्न देवि के, मृत्युराज यमदेव से।।

जगदीश्वर के परम तेज से, माता के कर-कमल बने।
चन्द्रदेव से स्तन निर्मित, भू से देवि नितम्ब बने।।

इन्द्र तेज से कटिप्रदेश, ब्रह्मा से दोनों चरण हुए।
वरुणदेव से जंघा-पिण्डलि, ऊंगलीकारक सूर्य हुए।।

वसु से हाथों की उंगलियां, भौंहे सन्ध्यादेवी से।
दन्त प्रजापति की ज्वाला से, नयन बने थे अग्नी से।।

वायुतेज से कर्ण बने, देवी की नाक कुबेर से।
अतिकल्याणमयी माँ प्रकटीं, सब देवों के तेज से।।

देवी दर्शन पाकर सुरगण, मन में अति प्रसन्न हुए।
जो महिषासुर से पीड़ित थे, माँ को पाकर धन्य हुए।।

पिनाकधारी भोले शंकर, शूल दिए इक माता को।
जगदीश्वर ने चक्र दिया, देवी रूपा जग त्राता को।।

वरुण देव से शंख, अग्नि से मिली दिव्य इक शक्ति प्रबल,
वायुदेव ने धनुष तथा बाणों से उनको किया सबल।।

देवराज से बज्र मिला, ऐरावत से घण्टा पाया।
काल दण्ड से दण्ड, वरुण से पाश, देवि ने अपनाया।।

दिव्य स्फटिक हार एक, माता को मिला प्रजापति से,
ब्रह्मदेव से मिला कमण्डल, सबने दिया स्वयं मति से।।

देवी के निज रोमकूप में, सूर्य देव ने तेज भरा।
कालदेव ने ढाल और तलवार देवि के हाथ धरा।।

क्षीर सिन्धु ने देवी को दो दिव्य वस्त्र उपहार दिए।
चूड़ामणि, दो कुण्डल, उज्जवल अर्धचन्द्र व हार दिए।।

तथा दिए केयूर, कड़े, हंसली नूपूर सुशोभित थी।
उँगलियों के लिए अंगूठी, जो रत्नों से शोभित थी।।

निर्मल फरसा, कवच, अस्त्र, विश्वकर्मा ने उपहार दिए।
कभी न कुम्हलाने वाले, कुछ कमल पुष्प के हार दिए।।

देवी को गिरिराज हिमालय, भांति-भांति के रत्न दिए।
दिव्य सवारी हेतु सिंह, माता को एक प्रचण्ड दिए।।
 
कोषाध्यक्ष कुबेर देव ने, शहद भरा इक पात्र दिया।
पृथ्वीधारक शेषनाग ने, नागमणी का हार दिया।।

देवों ने अपने-अपने कुछ अंश देवि को दान किये।
आभूषण व् अस्त्र-शस्त्र से माता का सम्मान किये।।

तब देवी ने नाद किया, गर्जन था अट्टाहास प्रबल।
तीनों लोकों में कम्पन, भू-लोक, अतल सब हुए विकल।।

बड़े जोर की प्रतिध्वनि गूंजी, हलचल उठी महाविकराल।
धरती डोली, पर्वत कांपे, सागर का भी आया काल।।

देवजनों ने प्रसन्नता से माता का जयघोष किया।
ऋषियों ने भी भक्ति-भाव से देवी का उदघोष किया।।

देख त्रिलोकी क्षोभग्रस्त, दैत्यों ने सेनाह्वान किया।
हाथों में हथियार कवच ले, युद्ध हेतु प्रस्थान किया।।

चकित हुआ महिषासुर, यह सब देख उसे भी क्रोध हुआ।
बोला क्या हो रहा यहाँ, क्यों ना अब तक यह बोध हुआ।।

सारे असुरों को लेकर वह सिंहनाद की ओर चला।
जहाँ मातु की अनुपम ज्वाला, उसी ओर वह दौड़ चला।।

देवी की दैदीप्य प्रभा से, तीनों लोक प्रकाशित थे।
धरती तथा गगनमण्डल सब उनसे ही आच्छादित थे।।

धरती दबती चली जा रही थी, चरणों के भार से।
नभमण्डल में रेखा खिंचती, मुकुट शिखर की धार से।।

सातों पातालों को छुब्ध किया धनु की टंकार ने।
सहस्त्र भुजाओं वाली माता, प्रगटीं जग को तारने।।

असुरों से अब युद्ध छिड़ा, अस्त्रों-शस्त्रों के वार प्रबल।
सभी दिशाएँ उद्भासित थीं, नभ-जल-थल सब हुए विकल।।

महिषासुर का सेनानायक, चिक्षुर अति विकराल था।
देवी के हाथों में डोल रहा उसका भी काल था।।

सेना चतुरंगिणी लिए, चामर भी वहां चला आया।
देवी को ललकार रहा, जैसे दिनकर पर लघु छाया।।

साठ हजार रथी आये, जिनका नायक उदग्र बलवान।
एक कोटि रथियों के संग महाहनु दैत्य दिखाता शान।।

महादैत्य असिलोमा जिसके रोयें तलवारों से थे।
पंचकोटि सैनिक थे जिसके, सारे पहुंचे रथ से थे।।

साठ लाख रथियों को लेकर बाष्कल भी पहुंचा रण में।
जहाँ देवि की भीषण ज्वाला, सृष्टि समाती थी कण में।।

परिवारित की सेना में, सैनिक, घोड़े व हाथी थे।
एक कोटि रथ महाभयानक युद्धभूमि के साथी थे।।

पांच अरब रथियों की सेना के संग डटा बिडाल था।
शक्ति स्वरूपा माता के हाथों में उसका काल था।।

महिषासुर भी सेना लेकर, युद्धभूमि में हुआ खड़ा।
रथ, हाथी व घोड़ों से वह समरांगण में हुआ अड़ा।।

तोमर, भिन्दिपाल, मूसल व परशु, खड्ग के वार हुए।
दैत्यों द्वारा माता पर पट्टिश व शक्ति प्रहार हुए।।

 कुछ असुरों ने पाश चलाया, कुछ ने शक्ति प्रहार किया।
शक्ति स्वरूपा जननी पर तलवारों से भी वार किया।।

क्रोध किया तब देवी ने, माया का अद्भुत खेल रचा।
उनके अस्त्रों-शस्त्रों से सब शस्त्र कटे कुछ नहीं बचा।।

देवी के मुख पर थकान का रंचमात्र भी चिन्ह न था।
देव, ऋषि सब स्तुति करते, भाव किसी का भिन्न न था।।

महाभगवती असुरों पर आयुध की वर्षा करती थीं।
सिंहवाहिनी माता रण में काल समान विचरती थीं।।

सिंह विचरता था रण में गर्दन के बाल हिलाता था।
लगता था जैसे वन में वह दावानल फैलाता था।।

मातु अम्बिका देवी के गण, रण में भीषण विकट हुए ।
जो निःश्वास मातु ने छोड़े, उनसे ही वे प्रकट हुए।।

हाथों में वे परशु खड्ग, व भिंदीपाल पकड़ते थे।
अस्त्र-शस्त्र व् पट्टिश से असुरों को खूब रगड़ते थे।।

उनमें माँ की शक्ति समाई, शत्रु नाश कर जाते थे।
विजय शंख व नाद-नगाड़े, रण में खूब बजाते थे।।

युद्धभूमि में युद्ध नहीं, संग्राम महोत्सव फलता था।
शंखनाद के संग मृदंग, असुरों के दल को खलता था।।

देवी ने त्रिशूल, गदा व खड्ग, शक्ति व फरसा से।
कई महादैत्यों को मारा अस्त्र-शस्त्र की वर्षा से।।

फिर घंटे का नाद किया, जो भीषण महाभयंकर था।
मूर्च्छित होकर मरे दैत्य, यह प्रलय नहीं प्रलयंकर था।।

बहुतेरों को बाँध पाश से, धरती पर ही दिया घसीट।
दो-दो टुकड़ों में विभक्त कुछ लेकिन सत्य न देखें ढीठ।।

बहुतों को थी गदा लगी, वे रण में सोये जाते थे।
मूसल से आहत होकर कुछ रक्त वमन कर जाते थे।

कुछ की छाती फटी शूल से, पृथ्वी पर वे ढेर हुए।
बाणवृष्टि से कमर कटी व पृथक देह से पैर हुए।।

दैत्य देवपीड़क गण जो बाजों की तरह झपटते थे।
बाँह छिन्न, तन जीर्ण हुए, मस्तक भी क्षण में कटते थे।।

महादैत्य कुछ जाँघे कट जाने से भू पर गिरे मिले।
कितनों के आधे शरीर तो ढूंढे पर भी नहीं मिले।।

देवी ने कुछ असुरों का तन आधा करके चीर दिया।
एक बांह, इक नेत्र बचा व एक पैर का पीर दिया।।

कितनों के सर कटे हुए लेकिन तन से उठ जाते थे।
हथियारों को हाथ लिए वे युद्ध हेतु मंडराते थे।।

कुछ कबन्ध समरांगण में बाजों की लय पर नाच रहे।
माता के हाथों से अपना काल स्वयं ही बांच रहे।।

ऋष्टि, खड्ग व शक्ति लिए सिरहीन धड़ों का रेला था।
युद्ध नहीं देवी ने उनके साथ प्रलय को खेला था।।

ठहरो कहके महादैत्य देवी को थे ललकार रहे।
माता के सब अस्त्र-शस्त्र मिल असुरों को संहार रहे।।

चलना-फिरना हुआ असम्भव, बस लाशें ही लाशें थीं।
हाथी, घोड़े व असुरों के शव की फैली बासें थीं।।

रक्तपात ऐसा था रण में, नदी खून की बहती थी।
क्षण में नष्ट आसुरी सेना, भार भूमि ही सहती थी।।

जैसे घास-काठ की ढेरी, अग्नि भस्म कर जाती है।
वैसे माँ की विजय पताका, दिग-दिगन्त लहराती है।।

सिंह हिलाकर निज अयाल, भीषणतम गर्जन करता था।
मानो असुरों के तन से चुनकर प्राणों को हरता था।।

देवी ने निज गण समेत असुरों से ऐसा युद्ध किया।
तुष्ट हुए सब देव-ऋषि गण, धरती को भी मुक्त किया।।

श्री मार्कण्डेय पुराण अन्तर्गत सावर्णिक मन्वन्तर में वर्णित देवी माहात्म्य का द्वितीय अध्याय काव्य रूपान्तर समाप्त।

- दीपक श्रीवास्तव 

Thursday, March 26, 2020

श्रीदुर्गासप्तशती प्रथम अध्याय (काव्य रूपान्तर)

श्री दुर्गासप्तशती काव्यरूप
(प्रथम अध्याय)

विनियोग मन्त्र
ॐ प्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, महाकाली देवता, गायत्री छन्दः, नंदा शक्तिः, रक्तदन्तिका बीजम྄ अग्निस्तत्त्वम྄, ऋग्वेदः स्वरूपम྄, श्रीमहाकालीप्रीत्यर्थे प्रथम चरित्र जपे विनियोगः।

ध्यान
श्री हरि थे जब शयनसेज पर,
मधु-कैटभ से त्रासित धरणी।
ब्रह्मदेव ने ध्यान किया था,
तेरा ही माँ, हे शुभ-करणी।।
तूने दस हाथों में माता,
खड्ग,चक्र, मस्तक हैं धारे,
गदा,बाण, अरु शूल, भुशुण्डी,
परिघ, धनुष हैं शंख तिहारे।।
तीन नेत्र वाली ज्योतिर्मय,
अंगों में अनुपम सुकान्ति है,
दिव्य तेरे आभूषण माता,
नीलमणी सी परम-शान्ति है।।
हे दशमुख दस चरणों वाली,
मम वन्दन स्वीकार करो।।
ध्यान धरूँ तेरा ही माता,
सारे जग के त्रास हरो।।

ॐ नमश्चण्डिकायै:

सूर्य पुत्र सावर्णि जगत में, जो अष्टम मनु कहलाये।
भक्ति-भाव से सुनें सभी जन, वे जग में कैसे आये।।

कृपा महामाया की पाकर, मन्वन्तर के नाथ हुए।
जिसे प्राप्त पद-धूलि देवि की, वे भवसागर पार हुए।।

स्वारोचिष मन्वन्तर में, इक राजा परम प्रतापी थे।
चैत्र वंश में प्रकट हुए, था नाम सुरथ, अति न्यायी थे।।

जीवन में था धर्म, प्रजा की सेवा पुत्रों के समान।
कोलाविध्वंसी क्षत्रिय लेकिन, उनके शत्रु हुए बलवान।।

दोनों युद्धभूमि में आये, हुआ महाभीषण संग्राम।
राजा सुरथ परास्त हुए, यद्यपि सेना थी अति-बलवान ।।

कीर्ति गई, अधिकार गया, तब राजा अपने नगर चले।
किन्तु शत्रु पीछा न छोड़े, इधर चले या उधर चले।।

राजा का बल क्षीण हुआ, तब मन्त्री दुष्ट प्रभावी थे।
सेना और खजाने को, हथिया लेने को हावी थे।।

भारी मन से सुरथ एक दिन, जनता से मुंह मोड़ चले।
अपने घोड़े पर सवार हो, वे जंगल की ओर चले।।

वहां विप्रवर मेधा मुनि का आश्रम एक पवित्र मिला।
जहाँ शान्ति अनुपम थी,हर इक हिंसक हिंसामुक्त मिला।।

मुनि के शिष्य जहाँ बहुतेरे, वन को शोभामान करें।
पशु-पक्षी,मृग-सिंह,सभी मिलकर भू का सम्मान करें।।

मुनि ने पावन आश्रम में, नृप का अनुपम सत्कार किया।
राजा ने कुछ कालखण्ड तक, वन में वहीँ विहार किया।।

किन्तु जीव जब तक जग में है, तब तक चिन्तामुक्त नहीं।
मोहपाश में बंधी चेतना, जो भीतर थी सुप्त कहीं।।

ममता जाग उठी थी मन में, प्रबल वेदना जागी थी।
उस यश-वैभव की चिन्ता थी, जो जीवन से भागी थी।।

कैसी होगी प्रजा हमारी, क्या सुख भी वैसा होगा?
पुरखों ने जिनकी सेवा की, वह जीवन कैसा होगा??

दुष्ट भृत्यगण अब भी क्या, उनकी रक्षा करते होंगे?
कैसा होगा राजधर्म, क्या उचित न्याय होते होंगे??

शूरवीर गजराज हमारे, जाने अब कैसे होंगे।
जाने कैसे कष्ट निरन्तर, पल-पल भोग रहे होंगे।।

जो जन मेरे कृपापात्र थे, पीछे-पीछे चलते थे।
धन-भोजन के लिए सदा जो, मुझको देखा करते थे।।

प्रजालाभ के लिए कष्ट से संचित धन का क्या होगा?
राजकोष के खाली होने से जनता का क्या होगा??

राजा सुरथ विचारमग्न थे, मस्तक पर चिन्ता रेखा।
तभी विप्रवर के आश्रम में, व्यक्ति एक आता देखा।।

व्यक्ति शोक से ग्रस्त और अनमना दिखाई देता था।
उसके मौन प्रभामण्डल में, कष्ट सुनाई देता था।।

प्रेम उमड़ आया राजा में, परिचय की इच्छा जागी।
उसकी पीड़ा, दर्द जानने की कुछ अभिलाषा जागी।।

राजा ने अति प्रेम-भाव से कहा, सखे! तुम कौन हो?
किस कुल से हो, कैसे आये, क्यों इतने तुम मौन हो??

राजा को अति श्रद्धा से पहले उसने सम्मान दिया।
शीश झुकाकर, हाथ जोड़कर, उसने उन्हें प्रणाम किया।।

फिर बोला, हे राजश्रेष्ठ, मैं धनिक वर्ग से आता हूँ।
वैश्य जाति में जन्म लिया, तन से समाधि कहलाता हूँ।।

किसी समय मेरे जीवन में, सुख की कलियाँ खिलती थीं।
स्त्री-पुत्र सभी थे घर में, सारी खुशियां पलती थीं।।

पुत्रों के उज्जवल भविष्य के लिए किया था धन-संचित।
पर कुटुम्ब से निर्वासित हूँ, होकर अब सबसे वंचित।।

जो मेरा विश्वासपात्र था, उसने ही खंजर भोंका।
मेरे  स्वजनों ने ही मुझको, पीड़ा और दिया धोखा।।

भारी मन, दुःख लिए ह्रदय में, मैं इस ओर चला आया।
पर कुटुम्ब का मोह अभी तक, मन से छोड़ नहीं पाया।।

हूँ अनभिज्ञ, दशा स्वजनों की, मेरे बिन कैसी होगी?
होंगे सब आनन्दमग्न या विपदा आन पड़ी होगी।।

क्या उनको जीवन में अब तक सदाचार भाते होंगे।
अथवा लोभी बन जीवन में दुराचार लाते होंगे।।

राजा ने पूछा समाधि से, स्नेह भरा क्यों बन्धन है?
क्यों उनकी चिन्ता है, जिनके कारण ही यह क्रन्दन है।।

क्षण-भर को वह मौन रहा, फिर बोला, राजन! ठीक कहा।
माना मैं निर्वासित हूँ, कुछ भी अब मेरा नहीं रहा।।

किन्तु करूँ क्या, पागल मन निष्ठुरता धारण नहीं करे।
जिसने पति का प्रेम भुलाया, उससे होता नहीं परे।।

धन लालच में जो सुत अपने पिता प्रेम को भूल चुके।
स्नेह भरा मन ऐसे निष्ठुर पुत्रों को न भूल सके।।

चित्त मोह से भरा हुआ, मन भारी होता जाता है।
जिनमे प्रेम नहीं उनके ही लिए सदा अकुलाता है।।

ये कैसी दुविधा जीवन की, इसका ज्ञान नहीं आता।
पीड़ा में हूँ विवश, किन्तु मैं उत्तर जान नहीं पाता।।

वैश्य और नृप दोनों की ही पीड़ा एक सरीखी थी।
दोनों प्रश्न लिए थे, मुनि से हल की आशा दीखी थी।।

दोनों मिलकर साथ चले जिस ओर महामुनि बैठे थे।
मुख पर अनुपम तेज व्याप्त था, ध्यान लगाए बैठे थे।।

दोनों बैठे रहे वहीँ, फिर मुनिवर ने आँखें खोलीं।
राजा ने अति विनय-भाव से प्रश्नों की खोली झोली।।

राजा बोले, हे मुनिवर! मेरे मन में कुछ संशय है।
चित्त मेरे आधीन नहीं है, अनजाना सा कुछ भय है।।

इसीलिए यह बात मेरे मन को अति पीड़ा देती है।
भले विमुख हूँ किन्तु प्रजा की पीर सुनाई देती है।।

हुआ पराजित, राज्य मेरा, मेरे हाथों से चला गया।
किन्तु विप्रवर अपनी ममता से ही हूँ मैं छला गया।।

यद्यपि मेरा राज्य नहीं अब, मुझको इसका भान है।
किन्तु किसी अज्ञानी जैसा दुःख में डूबा प्राण हैं।।

वैश्य मेरे जो साथ विराजित, वह भी तो अपमानित है।
स्त्री, पुत्रों और सेवकों द्वारा ही निष्कासित है।।

स्वजनों ने है त्याग दिया, लेकिन मन में है स्नेह प्रचुर।
दोनों दुःख में डूबे हैं, लेकिन मन में ममता भरपूर।।

यद्यपि जिनमें दोष हमें प्रत्यक्ष दिखाई देता है।
क्यों आकर्षण इतना उनकी ओर दिखाई देता है।।

हम दोनों ही समझदार हैं, फिर यह मोह भला क्यों है?
क्यों विवेक से हीन बुद्धि है, मन यह मूढ़ भला क्यों है??

ऋषि बोले, हे महाभाग! सारे जीवों को ज्ञान है ।
सभी पृथक हैं किन्तु सभी जीवों को अपना भान है।।

कुछ प्राणी देखते दिवस में, कई यामिनी द्रष्टा हैं।
कुछ ऐसे भी प्राणी जग में, जो दोनों में द्रष्टा हैं।।

यद्यपि मानव समझदार है, पशु-पक्षी भी ऐसे हैं।
जैसी रचना है खग-मृग की, ठीक मनुज भी वैसे हैं।।

जैसी बुद्धि मनुष्यों में है, जीवों की भी वैसी है।
भूख-प्यास व अन्य क्रियाएं सबमें एक सरीखी हैं।।

जैसे पक्षी स्वयं भूख से पीड़ित चाहे कितने हों।
सर्वप्रथम वे दाने देते, बच्चे चाहे जितने हों।।

जितनी भी हो समझ मनुज में, किन्तु लोभ की आशा है।
उपकारों के बदले में ही, पुत्रों की अभिलाषा है।।

यद्यपि सभी समझते इसको, फिर भी मोह प्रभावी है।
महाभगवती के प्रभाव से, सब पर माया हावी है।।

जन्म-मृत्यु की अविरल चक्की, जिनके बल से चलती है।
उन्ही महामाया की माया, सारे जग को छलती है।।

सब पर मोह प्रभावी, कोई भी इससे है पृथक नहीं।
यही योगनिद्रारूपा हैं, जगदीश्वर की अंश यही।।

सारा जग है मोहित इनसे, कोई भी है बचा नहीं।
विधि ने ऐसा मोहमुक्त, ज्ञानी भी अब तक रचा नहीं।।

वही महामाया देवी जो, क्षण में सृष्टि रचती हैं।
वही मुक्त जीवों को बन्धन से क्षण-भर में करती हैं।।

वे ही बन्धन, परा वही हैं, वे ही विद्या रूप हैं।
वे ईश्वर की अधीश्वरी हैं, चिर-सनातनी रूप हैं।।

राजा ने पूछा मुनिवर से, ये शुभ-देवी कौन हैं?
जिन्हें महामाया कहते हैं, मातृस्वरूपा कौन हैं??

कैसे आविर्भाव हुआ, जग में उनका क्या रूप है?
जीव-जगत में क्या प्रभाव है, कैसा पुण्य स्वरुप है??

तुम स्वाहा, माँ तुम्ही स्वधा हो,
वषट्कार हो तुम्हीं क्षुधा हो।
तुम्ही तृप्ति हो, तुम ही स्वर हो,
जीवनदात्री तुम्हीं सुधा हो।।

प्रणवाक्षर में तुम अकार हो,
तुम्ही मात्रा, तुम उकार हो।
बिन्दु तुम्ही, अव्यक्त रूप हो,
तीन रूप में तुम मकार हो।।

तुम संध्या, सावित्री, जननी,
तुम्ही सृष्टि की धारण करनी।
तुम जग-जननी, पालन करनी,
कल्प-अन्त में जीवन हरनी।।

सृष्टि जन्म की बारी आई,
तब तुम सृष्टिरूप कहलाई।
जग के पालन-भरण हेतु माँ,
स्थितिरूपा शक्ति कहाई।
कल्पकाल में अन्त समय में,
तुम संहाररूप बन आई।।

महासुरी हो, महास्मृति हो,
महामोहरूपा हो, गति हो।
तुमसे ही गुण होते जग में,
तुम ही सबकी सहज प्रकृति हो।।

तुम्ही भयंकर कालरात्रि हो,
महादेवि तुम महारात्रि हो।
महान-मेधा, महान-विद्या,
महान-माया, मोहरात्रि हो।।

तुम श्री ह्रीं हो, तुम्ही ईश्वरी,
तुम्हीं बुद्धि, हे जगद-ईश्वरी।
खड्ग-शूल को धारण करती,
अचिन्त्यरूपे, परम-ईश्वरी।।

लज्जा,पुष्टि, तुष्टि तुम्हीं हो,
तुम्हीं शान्ति हो, क्षमा तुम्ही हो।
गदा-चक्र को धरने वाली,
घोर-रूप हो, सौम्य तुम्हीं हो।।

धनुष-शंख को धारण करती,
जनती, भरती, जीवन हरती।
बाण, भुशुण्डी,परिध लिए माँ,
तुम जड़ में चेतनता भरती।।

जग में जो सुन्दर कहलाते,
तुमसे ही सुन्दरता पाते।
तुम सबमे हो, किन्तु परे हो,
तुममें ही माँ सभी समाते।।

शक्ति तुम्हीं हो, भक्ति तुम्हीं हो,
भाव तुम्ही, सद्भाव तुम्ही हो।
तेरा वन्दन-पूजन क्या हो?
जन्म तुम्हीं हो मुक्ति तुम्ही हो।।

जो इस जग की सृष्टी करते।
पालन करते, जीवन हरते।
तेरी ही माया से श्रीहरि,
निद्रा की तन्द्रा में रहते।।

यहाँ कौन समरथ है माता,
जो तेरी स्तुति कर पाता।
तुम ही हरि-हर और जगत के,
देह और मन की हो दाता।।

जग में तुम सी शक्ति नहीं है,
तुमसे बढ़कर भक्ति नहीं है।
तुम प्रभाव हो तुम्ही प्रशंसा,
तुमसे बढ़कर मुक्ति नहीं है।।

वन्दन को स्वीकार करो माँ,
मधु-कैटभ से त्रास हरो माँ।
इन्हे मोह के भ्रम में कर दो,
जगती के संत्रास हरो माँ।।

सृष्टि पर उपकार करो माँ,
जगदीश्वर की नींद हरो माँ।
वे मधु-कैटभ का वध कर दें,
उनको ऐसी बुद्धि दो माँ।।

इस प्रकार योगनिद्रा की, ब्रह्माजी ने स्तुति की।
अधिष्ठात्रि तमगुण देवी ने, जगदीश्वर की जाग्रति की।।

ब्रह्माजी के सम्मुख निकलीं, प्रभु के मुख, वक्षस्थल से।
जगदीश्वर की बांह, नासिका, नेत्र, और हृदयस्थल से।।

जग से स्वामी नाथ जनार्दन, शय्या से फिर जाग उठे।
मुक्त हुए निद्रा से भगवन, ज्यों सागर से आग उठे।।

फिर दोनों असुरों को देखा, जो बलवान महाभट थे।
ब्रह्मादेव का भक्षण करने, को आतुर मधु-कैटभ थे।।

श्रीहरि ने दोनों असुरों से, केवल बाहूयुद्ध किया।
पांच हजार बरस तक दोनों को यूँ ही उन्मत्त किया।।

मधु-कैटभ हरि से बोले, हे महावीर हम सन्न हैं।
कोई भी वरदान मांग लो, तुमसे आज प्रसन्न हैं।।

हरि बोले, हे महादैत्य! मुझको केवल यह वर दे दो।
मेरे हाथों मृत्यु तुम्हारी, हो बस यही वचन दे दो।।

और नहीं कोई इच्छा है, जन्म जीव जब पाता है।
होती उसकी मृत्यु सुनिश्चित, यही सत्य रह जाता है।।

माया के धोखे में आकर, असुरों ने जल ही देखा।
फिर बोले जलमुक्त जगह जो, वहीं हमारा हो लेखा।।

दोनों ने स्वीकार किया, अब भाग्य रेख कुछ वक्र चले।
दोनों मस्तक हरि जंघा पर, हरि का अब तो चक्र चले।।

जगदीश्वर ने दोनों असुरों का ऐसे संहार किया।
मायादेवी के प्रभाव से, भू का हल्का भार किया।।

श्री मार्कण्डेय पुराण अन्तर्गत सावर्णिक मन्वन्तर में वर्णित देवी माहात्म्य का प्रथम अध्याय काव्य रूपान्तर समाप्त।

- दीपक श्रीवास्तव 

Wednesday, March 25, 2020

अर्पित हूँ , परिणाम न जानूं

तुम स्वाहा, माँ तुम्ही स्वधा हो,
वषट्कार हो तुम्हीं क्षुधा हो।
तुम्ही तृप्ति हो, तुम ही स्वर हो,
जीवनदात्री तुम्हीं सुधा हो।।

प्रणवाक्षर में तुम अकार हो,
तुम्ही मात्रा, तुम उकार हो।
बिन्दु तुम्ही, अव्यक्त रूप हो,
तीन रूप में तुम मकार हो।।

तुम संध्या, सावित्री, जननी,
तुम्ही सृष्टि की धारण करनी।
तुम जग-जननी, पालन करनी,
कल्प-अन्त में जीवन हरनी।।

सृष्टि जन्म की बारी आई,
तब तुम सृष्टिरूप कहलाई।
जग के पालन-भरण हेतु माँ,
स्थितिरूपा शक्ति कहाई।
कल्पकाल में अन्त समय में,
तुम संहाररूप बन आई।।

महासुरी हो, महास्मृति हो,
महामोहरूपा हो, गति हो।
तुमसे ही गुण होते जग में,
तुम ही सबकी सहज प्रकृति हो।।

तुम्ही भयंकर कालरात्रि हो,
महादेवि तुम महारात्रि हो।
महान-मेधा, महान-विद्या,
महान-माया, मोहरात्रि हो।।

तुम श्री ह्रीं हो, तुम्ही ईश्वरी,
तुम्हीं बुद्धि, हे जगद-ईश्वरी।
खड्ग-शूल को धारण करती,
अचिन्त्यरूपे, परम-ईश्वरी।।

लज्जा,पुष्टि, तुष्टि तुम्हीं हो,
तुम्हीं शान्ति हो, क्षमा तुम्ही हो।
गदा-चक्र को धरने वाली,
घोर-रूप हो, सौम्य तुम्हीं हो।।

धनुष-शंख को धारण करती,
जनती, भरती, जीवन हरती।
बाण, भुशुण्डी,परिध लिए माँ,
तुम जड़ में चेतनता भरती।।

जग में जो सुन्दर कहलाते,
तुमसे ही सुन्दरता पाते।
तुम सबमे हो, किन्तु परे हो,
तुममें ही माँ सभी समाते।।

शक्ति तुम्हीं हो, भक्ति तुम्हीं हो,
भाव तुम्ही, सद्भाव तुम्ही हो।
तेरा वन्दन-पूजन क्या हो?
जन्म तुम्हीं हो मुक्ति तुम्ही हो।।

मैं मूरख हूँ, ध्यान न जानूं,
अपनी ही पहचान न जानूं।
जो भी हूँ, पर बालक तेरा,
अर्पित हूँ , परिणाम न जानूं।।

- दीपक श्रीवास्तव 

Tuesday, February 25, 2020

सीता की खोज- लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग एवं परिणाम

सीता की है खोज भला या खुद में खुद को पाना है।
जीवन का यह पूर्ण लक्ष्य या राहों में खो जाना है।।

सारे जीव प्रयत्नशील हैं सीता की सुधि लाने में।
कपिगण, वानर साथ लगे हैं, उसी लक्ष्य को पाने में।।

यक्ष प्रश्न है खड़ा सामने, लक्ष्य एक राहें विभिन्न हैं।
मार्ग अलग हो जाने से क्या, असर लक्ष्य का भिन्न-भिन्न है?।

यह जीवन का अनुपम चिन्तन, केवल इसको कथा न जानें।
पथ में चलते-चलते इसको, निज के अनुभव से पहचानें।।

इस समाज में विविध रंग हैं, रंगों में सन्तुलन अपार।
कोई छल से स्वार्थ मिटाए, करे कोई तप-बल स्वीकार।।

सीता मात्र चरित्र नहीं है, भक्ति मानकर करें प्रणाम।
तीन प्रकारों से पहचानें, इनको पाने के परिणाम।।

एक ओर सीता हर लाया, रावण छल की है पहचान।
दूजी ओर रीक्ष-कपि-वानर, तप-बल के प्रतीक हनुमान।।

छल से सीता हरण किया, पर प्राप्त भक्ति का पोर नही।
व्यग्र दशानन, पतनोन्मुख है, कहीं शान्ति का छोर नही।।

अनचाहा भय साथ न छोड़े, लगे हुए हैं पहरे कितने।
युद्ध करे स्वीकार दशानन, भले वीर मिट जाएं जितने।।

एक ओर है वानर सेना, जहां राम का प्रेम छलकता।
सबको है आदेश राम का, जिसमें जीवन लक्ष्य झलकता।।

ईश्वर कण-कण में हैं बसते, जानें सब, पर रहें अधूरे।
जिस दिन भक्ति जगे जीवन मे, लक्ष्य सभी हो जाएं पूरे।।

यही लिए संकल्प हृदय में, वानर सेना चली राह में।
पर्वत जंगल सभी लांघते, कदम नहीं रुकते प्रवाह में।

जीवन के नित संघर्षों से, प्राणी करे लक्ष्य संधान।
अग्नि में तप कर ही सोना, दुनिया में पाता सम्मान।।

जीवन में अगणित बाधाएं, हल भी सबके भिन्न-भिन्न हैं।
अब आगे लहराता सागर, पथिक विवश है, शक्ति निम्न है।।

जीवन में जब ऐसी बाधा, काम न आये कोई शिक्षा।
अब केवल दो ही विकल्प हैं, लौट चलें या करें प्रतीक्षा।।

पथिक लौट जाए जो मग में, खत्म आस, बस मिले निराशा।
धैर्य धरे जो करे प्रतीक्षा, उसे लक्ष्य मिलने की आशा।।

हनुमान जी जैसा तप-बल, जो भी मानव पाता है।
वही पार कर सकता सागर, लक्ष्य प्राप्त कर जाता है।।

लेकिन सागर तट पर बैठे, जीव लक्ष्य कैसे पाएं।
आखिर कब तक करें प्रतीक्षा, भक्ति निकट कैसे आये?।

यही द्वन्द है भवसागर का, भ्रम ऐसा छल वृत्ति प्रबल।
सच्चा साधक करे प्रतीक्षा, दुष्ट आचरण दिखे सबल।।

किन्तु सत्य तो चिर-विजयी है, भले देर कुछ हो जाये।
रावण सैन्य समेत पराजित, राम विजय-ध्वज लहराए।।

जैसे जैसे खल-प्रवृत्तियां, इस जीवन से जाती हैं।
वैसे-वैसे भक्ति हृदय में, झूम-झूम लहराती है।।

इसीलिए जब रावण का वध, धरती से हो जाता है।
भक्ति रूप सीता का दर्शन, हर इक वानर पाता है।।

यदि पंखों में ताकत हो तो, लक्ष्य शीघ्र मिल जाता है।
धैर्य धरा साधक भी इक दिन, अपनी मंजिल पाता है।।

सीता की है खोज भला या खुद में खुद को पाना है।
जीवन का यह पूर्ण लक्ष्य या राहों में खो जाना है।।

- दीपक श्रीवास्तव

Tuesday, February 18, 2020

हम तो केवल करते फेरे

बिना तुम्हारे कण ना डोले,
कण्ठ मेरे, पर तू ही बोले।
तुम्ही भाव, तुम ही स्वर मेरे,
हम तो केवल करते फेरे।।1।।

जहाँ दूर तक जाती दृष्टि,
सदा अधूरी रहती सृष्टि।
जहाँ पूर्ण जीवन में भक्ति,
तत्क्षण भव-बन्धन से मुक्ति।।2।।

यूँ तो जीव बहुत निर्बल है,
प्रश्न एक,पर बहुत प्रबल है।
जग में बड़े स्वार्थ-परमार्थ,
जीव कहाँ ढूंढे भावार्थ।।3।।

जो भी मन मानस हो जाये,
राम-नाम में ही खो जाए।
हरिहर मन,हरिहर हो बुद्धि,
होती परम-अर्थ की सिद्धि।।4।।

किन्तु देह जब तक जीवित है,
जीव, जगत में बड़ा भ्रमित है।
कहाँ स्वार्थ-परमार्थ संवारे,
किसको ढूंढे, किसे पुकारे।।5।।

नारद काम-क्रोध के जेता,
हरी नाम के अमर प्रणेता।
यदि परमार्थ हरी को अर्पित,
कहाँ स्वार्थ को करें समर्पित।।6।।

जीवन में हो हरि की आशा,
फिर मन में क्यों रहे दुराशा।
जब तक भ्रम का भार रहेगा,
थोड़ा-थोड़ा स्वार्थ रहेगा।।7।।

जब प्राणी दुविधा में भटके,
स्वार्थ अगर जीवन में अटके।
रक्खें हरि पर दृढ़ विश्वास,
दुनिया भर से कैसी आस?।8।।

लिए प्रणय की मधुर कामना,
हरि से नारद करें याचना।
कामदेव का रूप मनोहर,
गए नहीं नारद उनके घर।।9।।

छोड़ जगत नश्वर से आशा,
हरि में केवल हो विश्वासा।
हरि से बढ़कर नहीं हितैषी,
हरि हैं तो अकुलाहट कैसी।।10।।

नारद का व्रत भंग न होवै,
हरि का ऐसा कौतुक होवै।
भक्त कुपित हो कहाँ पधारें,
हरि का भगत हरी के द्वारे।।11।।

काम हरी का क्रोध हरी का,
जीवन मे अभिमान हरी का।
शब्द हरी, सम्मान हरी का,
जीवन का हर भाव हरी का।।12।।

भक्ति तभी फलती जीवन में,
हरी नाम जब तक तन-मन में।
आदि-अन्त तक यात्रा कितनी,
हरि की चरण धूल भर जितनी।।13।।

बिना तुम्हारे कण ना डोले,
कण्ठ मेरे पर तू ही बोले।
तुम्ही भाव, तुम ही स्वर मेरे,
हम तो केवल करते फेरे।।14।।

- दीपक श्रीवास्तव

Thursday, February 13, 2020

केवल राम-नाम ही जपना पर्याप्त नहीं है

राम-नाम ही जपना जीवन मे केवल पर्याप्त नहीं है।
जीवन है निष्फल जब तक तन-मन में मानस व्याप्त नहीं है।।

रामचरित के हर प्रसंग में जीवन दर्शन रमा हुआ है।
मन की धूल हटाकर देखो, जो बरसों से जमा हुआ है।।

खर-दूषण से युद्ध राम का, एक अलौकिक सत्व लिए है।
भ्रम पर ज्ञान सदा विजयी है, इसी सत्य का तत्व लिए है।

खर-दूषण चौदह हज़ार की सेना लेकर चले समर में।
अति बलवान, प्रबल मायावी, धूल उड़ाते दिवा प्रहर में।।

राम-लखन संग सीता माता पर्णकुटी में विहर रहे थे।
वन विहार की मीठी-तीखी स्मृतियों में विचर रहे थे।।

तभी कुटी पर देख शत्रु को, राम सरासन बाण धरें।
लक्ष्मण सीता संग खड़े थे, राम शत्रु के प्राण हरें।।

किन्तु प्रश्न है उठता फिर भी, शत्रु प्रबल, सेना तमाम है।
दो योद्धा हैं साथ किन्तु इस युद्धभूमि में सिर्फ राम हैं।।

यदि लक्ष्मण भी युध्द करें तो शीघ्र विजय मिल सकती है।
जीवन में पुरुषार्थ अगर हो, विजय दूर कब रहती है?।

यही भेद है राम और रावण में, इसको जानें हम।
दोनों में है ज्ञान किन्तु अंतर को भी पहचानें हम।।

राम ज्ञान, वैराग्य लखन हैं, भक्ति पुनीता सीता हैं।
जिसमें है वैराग्य उसी ने अहंकार को जीता है।।

मन मे यदि संशय हो जाये, बुद्धि भ्रमित हो जाती है।
तभी चित्त में मोह उपजता, यही द्वन्द शुरुआती है।।

मायावी सेना विशाल खर-दूषण भ्रम का रूप है।
परम धाम श्रीराम युद्ध में चेतन ज्ञान स्वरूप हैं।।

ज्ञान सदा ही भ्रमभंजक है, किन्तु दम्भ उपजा देता।
भक्ति नष्ट कर मानव जीवन, को यह बड़ी सजा देता।।

जब तक है वैराग्य मनुज में, तब तक भक्ति सुरक्षित है।
राम युद्ध में इसीलिए, सीता लक्ष्मण से रक्षित हैं।।

मायावी छल-बल की सेना, अट्टहास कर युद्ध करे।
ज्ञानरूप श्रीराम अकेले, कैसे इनको शुद्ध करें?।

तभी राम ने मायारूपी प्रबल बाण संधान किया।
युद्ध कर रहे हर सैनिक को अपना रूप प्रदान किया।।

यही राम का चिर स्वभाव, रामत्व सभी को देते हैं।
ज्ञानवान हो जाते प्राणी, सभी भ्रान्ति हर लेते हैं।।

मायावी दूषण की सेना, निज स्वरूप का ज्ञान नहीं।
दूजा सैनिक राम दिखे, लेकिन अपना अनुमान नहीं।।

यह समाज की है विडम्बना, बस औरों के दोष दिखें।
अपना मन कोई ना झांके, जिसमें अपने दोष दिखें।।

देख अगर लेते सैनिक, भूले भी अपना रूप कहीं।
सारे भ्रम मिट जाते मन के, मिलता अपना रूप वहीं।।

किन्तु यहां विपरीत दृश्य है, राम रूप पर वार चले।
शत्रु समझ अपने ही साथी अपनों को ही मार चले।।

इस प्रकार श्रीराम युध्द में, कर माया संहार चले।
भक्ति सुरक्षित है विराग से, जब भ्रम पर तलवार चले।।

किन्तु ज्ञान धारे रावण में, रंच मात्र वैराग्य नहीं।
इसीलिए आसक्ति प्रबल है, जीवन में सौभाग्य नहीं।।

राम-नाम ही जपना जीवन मे केवल पर्याप्त नहीं है।
जीवन है निष्फल जब तक तन-मन में मानस व्याप्त नहीं है।।

- दीपक श्रीवास्तव

Tuesday, February 11, 2020

चीख रहा कश्मीर

चीख रहा कश्मीर, बिलखता दर्द भरे जज्बातों में ।
सुलग रहा है देश, कहाँ भाईचारा है बातों में।।

था धरती का स्वर्ग, जहां इन्सान दिखाई देते थे।
रोम-रोम में प्रेम भरे, नित गीत सुनाई देते थे।।

बरसों से थीं जहां पीढियां, प्रेम भरे मृदु बन्धन में।
हाय, समय कैसा आया, सब भूले बिछड़े क्रन्दन में।।

एक ओर बचपन की यारी एक ओर थी कौम खड़ी।
इंसा से हैवाँ की दूरी, नहीं रही कुछ खास बड़ी।।

आसमान में बिजली कौंधी, मस्जिद गूंजे नारों से।
महिलाओं को छोड़ भगो या शीश कटाओ वारों से।।

बचपन के संगी-साथी, जो प्राणों से भी प्यारे थे।
साथ पढ़े, संग-संग ही खेले, दुनिया से वे न्यारे थे।।

एक मित्र की आंखों में अब जाने कौन खुमारी थी।
खून भरे जज्बातों से हारी बचपन की यारी थी।।

नहीं रही वेदना हृदय में, रही मित्रता धारों पे।
कितने ही सिर गिरे भूमि पर, रक्त लगा तलवारों पे।।

अंगारे थे भरे नयन में, मानवता भी हारी थी।
मां बहनों की लाज लूटने की आई अब बारी थी।।

जिसने जीवन भर पिशाच के साथ निभाई यारी थी।
उसकी माता और बहन ने कीमत खूब चुकाई थी।।

जिसने भाई मान कलाई पर राखी भी बांधी थी।
आज उसी की देह नोचने प्रबल वासना जागी थी।।

अस्मत के हो रहे चीथड़े, तन-मन था चीत्कार रहा।
नाजुक अंगों से अंतड़ियों तक चाकू का वार रहा।।

बच्ची या कोई नवयुवती, सुनी किसी ने आह नही।
गर्भवती या वृद्धा थी, लेकिन कोई परवाह नहीं।।

हैवानों के मन-मस्तक में खून भरा था, शोला था।
अस्मत की नीलामी करके तलवारों पे तोला था।।

शिक्षक को करके छलनी शिष्यों की ही तलवारों ने।
गुरुमाता के साथ घिनौना कृत्य किया गद्दारों ने।

जिनके दम पर रोजी-रोटी गद्दारों की चलती थी।
उसी मालकिन पर कुदृष्टि थी, हवस-वासना पलती थी।।

शोषित-पीड़ित कहाँ दर्द बतलायें यह था प्रश्न बड़ा।
शासन और प्रशासन उनके लिए नहीं था रहा खड़ा।।

जनता का नेतृत्व विमुख हो करता कुछ मनमानी था।
न्यायालय की आस लगा पाना भी तो बेमानी था।।

बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की उम्मीदें भी छोड़ चले।
बसा-बसाया घर अपना, अपनी दुनिया को छोड़ चले।।

जिनके अपने बड़े मकाँ थे, पड़े टेन्ट में रातों में।
खाने पीने की सुधि खोई, ऐसे दुःख हालातों में।।

दिल्ली में थी शरण मिली, उम्मीद जगाए बैठे हैं।
दिवस-महीने बरसों बीते, आस लगाए बैठे हैं।।

स्वर्ग भरा सुन्दर जग अपना, क्या वापस मिल पायेगा?
क्या लौटेंगे घर को अपने, दर्द कभी सिल पायेगा??

चीख रहा कश्मीर, बिलखता दर्द भरे जज्बातों में ।
सुलग रहा है देश, कहाँ भाईचारा है बातों में।।

- दीपक श्रीवास्तव

Monday, February 10, 2020

सन्तुलन ही जीवन एवं समाज का आधार है

श्री अरविन्द सोसाइटी द्वारा आयोजित तन-मन-मानस कार्यक्रम का अन्तिम सत्र सामाजिक जीवन की दृष्टि से अत्यन्त उपयोगी रहा। कार्यक्रम में प्रमुख वक्ता दीपक श्रीवास्तव ने बताया कि सृष्टि में सन्तुलन ही जीवन एवं समाज का आधार है। श्रीरामचरितमानस की रचना के समय भारतीय समाज वैष्णव एवं शैव में बंटा हुआ था। ऐसे समय में श्रीरामचरितमानस द्वारा श्री शिव को गुरु मानते हुए श्री विष्णु के  चरित्र का चिंतन सामाजिक सन्तुलन का सबसे बड़ा उदाहरण है।

कार्यक्रम में सीता की खोज का उदाहरण लेकर जीवन लक्ष्य की प्राप्ति के तरीकों एवं उसके परिणाम की अद्भुत व्याख्या ने लोगों को अपने जीवन में झांकने को विवश कर दिया। एक ओर जहां सारे वानर सीता की खोज में निरन्तर लगे हुए हैं वहीं समुद्र उस बाधा का प्रतीक है जहां मनुष्य की अक्षमता उसे विवश कर देती है। अतः जीवन मे तप श्री हनुमान जी जैसा हो जो समुद्र रूपी बाधा को पार करने की क्षमता प्रदान करे अन्यथा श्रद्धा के साथ प्रतीक्षा करें। जब अज्ञान एवं भ्रम रूपी असुर मिट जाते हैं तब लक्ष्य रूपी सीता के दर्शन प्रत्येक प्रतीक्षारत व्यक्ति को प्राप्त होते हैं।

कार्यक्रम में दीपक श्रीवास्तव ने बताया कि विद्यार्थियों के जीवन मे श्री हनुमानजी के समुद्र यात्रा के माध्यम से तीन प्रकार के संघर्षों हैं जो मार्ग में मिलने वाली राक्षसियों का रूप हैं। तीनों का वध न करते हुए सुरसा का सम्मान, सिंहिका का वध एवं लंकिनी को मुठिका मारने के पीछे इन्ही संघर्षों से जूझने का आदर्श उदाहरण स्थापित है।

कार्यक्रम में लंका दहन की अर्धनारीश्वर शिवलीला के रूप में अलौकिक व्याख्या हुई तथा रावण के चरित्र द्वारा यह भी बताया गया कि मनुष्य में ज्ञान होने में बावजूद उसमें अहंकार का प्रारम्भ कैसे होता है जो उसे पतन की ओर ले जाता है। जीवन में अहंकार पर विजय प्राप्त करने के लिए रावण के चरित्र का चिन्तन आवश्यक है।

कार्यक्रम में श्रीमती मीना गुप्ता ने अपने मधुर कंठ से श्री राम स्तुति का गायन करके कार्यक्रम को अलौकिक ऊंचाई प्रदान की। 

दिल्ली से पधारी श्रीमती नीता सक्सेना ने सीता चरित्र के उदाहरण द्वारा वर्तमान समाज में नारियों के योगदान एवं उत्तरदायित्व पर महत्वपूर्ण बातें रखीं।

गाजियाबाद से पधारे भारतीय स्टेट बैंक के शाखा प्रबन्धक श्री दुष्यन्त सिंह ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में इस प्रकार के कार्यक्रमों की समाज को अति आवश्यकता है तथा इसमें लोगों की भागीदारी बढ़नी चाहिए। 

कार्यक्रम के अन्त में श्री के सी श्रीवास्तव जी ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में शैली शर्मा समेत अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

प्रमुख वक्ता दीपक श्रीवास्तव द्वारा शिव-विष्णु संतुलन की अद्भुत व्याख्या
https://youtu.be/WqpfC4tftmw

श्रीमती मीना गुप्ता द्वारा श्रीराम भक्ति में सराबोर अलौकिक गायन
https://youtu.be/0ds4xnGr6mA

श्रीमती नीता सक्सेना द्वारा स्त्रियों के सामाजिक दायित्व पर उद्बोधन
https://youtu.be/ZGjHZWsB3Ak

भारतीय स्टेट बैंक के शाखा प्रबंधक श्री दुष्यंत सिंह द्वारा तन-मन-मानस की सामाजिक उपयोगिता पर उद्बोधन
https://youtu.be/cMVbArD5Ax4

श्री के सी श्रीवास्तव द्वारा अतिथियों का सम्मान एवं आभार

  1. https://youtu.be/1GM88eZB4bg

Sunday, February 9, 2020

भारत का अपमान न भूलें

प्रबल भले हो जाएं अंधेरे,
दूर दूर ना दिखें सवेरे,
भारत का अपमान न भूलें,
निज का अनुसंधान न भूलें।

बढ़ती जाए भले वेदना,
उतनी होती सघन चेतना।
जब संकट मंडराता है,
राष्ट्रवाद गहराता है।
माना शत्रु प्रबल है लेकिन,
अपने बल का मान न भूलें।
भारत का अपमान न भूलें,
निज का अनुसंधान न भूलें।।1।।

भ्रमित सत्य बतलाने वालों,
कान खोल उदघोष सुनो।
जाग्रत राष्ट्रप्रेम में डूबी,
जनता का जयघोष सुनो।
प्रेम सुधा छलकाते-गाते,
धूर्तों की पहचान न भूलें।
भारत का अपमान न भूलें,
निज का अनुसंधान न भूलें।।2।।

एक पक्ष का भाईचारा,
भला कहाँ चल पाएगा।
राष्ट्र विभाजन करने वालों,
से क्या प्रेम निभाएगा?
अब पीड़ा भी बिलख रही है,
भारत माँ की आन न भूलें।
भारत का अपमान न भूलें,
निज का अनुसंधान न भूलें।।3।।

तलवारों के आगे जो जन,
अपना गर्व भुला बैठे।
भ्रम में आज उन्हीं के बच्चे,
अपना राष्ट्र जला बैठे।
शत्रु के गुण गाते-गाते,
पुरखों का अपमान न भूलें।
भारत का अपमान न भूलें,
निज का अनुसंधान न भूलें।।4।।

- दीपक श्रीवास्तव

Wednesday, February 5, 2020

जिसे नहीं हो आन राष्ट्र की

गंगा जमुनी रटने वालों ,
खून तुम्हारा पानी है।
जिसे नहीं हो आन राष्ट्र की,
वह जीवन बेमानी है।

जब लाखों निर्दोष कटे थे,
कहाँ तुम्हारा ज्ञान छिपा था?
भारत माँ पर जुल्म हुए जब,
कहाँ महान विचार छिपा था?
माँ-बहनों ने आन बचाने,
जौहर में निज प्राण दिए।
पर तुम जैसे गद्दारों ने,
हमें भ्रमित इतिहास दिए।
तेरी नस-नस में है बहती,
जहर भरी बेईमानी है।
जिसे नहीं हो आन राष्ट्र की,
वह जीवन बेमानी है।।1।।

जब मुगलों की तलवारों से,
हिन्दू थर-थर कांपे थे।
प्राणों की रक्षा करने में,
सिक्ख हमारे आगे थे।
शीश कटाया, उफ़ न बोला,
टुकड़े-टुकड़े हुआ शरीर।
दिल के टुकड़ों की बलि दे दी,
लेकिन झुक न सका जमीर।
तुमने उनकी हंसी उड़ाई,
हा! धिक्कार जवानी है।
जिसे नहीं हो आन राष्ट्र की,
वह जीवन बेमानी है।।2।।

बच्चों में भ्रम फैलाने को,
एक पक्ष का पाठ दिया।
गंगा-जमुनी रटते-रटते,
राष्ट्र हमारा बांट दिया।
खिलजी-बाबर-अकबर के नित,
गुण गाने वालों बोलो।
स्वतंत्रता की बलिबेदी पर,
इनके योगदान तोलो।
अगर नहीं संभले अब तक भी,
फिर तो मुंह की खानी है।
जिसे नहीं हो आन राष्ट्र की,
वह जीवन बेमानी है।।3।।

मेरे अमर सपूतों ने जो,
हमको राह दिखाई है।
इस जीवन को दिव्य बनाने,
की बारी अब आई है।
भारत माँ ने बहुत सहा है,
और नहीं सहने देंगे।
देह भले त्यागेंगे लेकिन,
शीश नहीं झुकने देंगे।
पहले देश तभी हम सब हैं,
अपने मन में ठानी है।
जिसे नहीं हो आन राष्ट्र की,
वह जीवन बेमानी है।।4।।

- दीपक श्रीवास्तव

Saturday, January 11, 2020

Tanhaji: The Unsung Warrior: गढ़ आला पण सिंह गेला

मेरी बचपन की शिक्षा सरस्वती शिशु मन्दिर में हुई है जहाँ इतिहास के रूप में हमने कक्षा द्वितीय में "रामायण", तृतीय में "महाभारत", चतुर्थ में "गौरव गाथा" तथा पंचम में "इतिहास गा रहा है" का अध्ययन किया है। अतः महान योद्धा तानाजी मालसुरे का नाम मेरे लिए अपरिचित नहीं है। कक्षा चतुर्थ में पढ़ा हुआ छत्रपति शिवाजी के वाक्य "गढ़ आला पण सिंह गेला" आज भी जेहन में ताजा है। आज तानाजी मालसुरे द्वारा सिंहगढ़ विजय पर आधारित फिल्म देखकर महसूस हुआ कि अपने आत्मसम्मान तथा अपनी संस्कृति के गौरव को व्यक्त करती फिल्मों का निर्माण वर्तमान समाज के लिए अति आवश्यक है। मैं फिल्म के निर्माता-निर्देशक एवं कलाकारों का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ जिनके माध्यम से हमारे गौरवशाली अतीत का वह पृष्ठ हमारे समक्ष सामने आया है जिन पर समय की धूल चढ़ रही थी। 

किलेदार तानाजीराव मालसुरे, छत्रपति शिवाजी के अभिन्न मित्र थे तथा जीवनपर्यन्त उनके साथ लगभग प्रत्येक युद्ध में सम्मिलित रहे थे। एक बार शिवाजी के साथ वे औरंगजेब से मिलने आगरा गये थे तब औरंगजेब ने शिवाजी और तानाजी को छल से बंदी बना लिया था। ऐसी विकट परिस्थिति में शिवाजी और तानाजी ने मिठाई के पिटारे में छिपकर वहां से भाग गए थे। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार जब माता जीजाबाई लालमहल से कोंडाना किले की ओर देख रहीं थीं, तब शिवाजी ने उनके मन की बात पूछी तो माता जीजाबाई ने कहा था कि इस किले पर लगा हरा झण्डा मेरे मन को व्यथित कर रहा है। कोंडाणा का किला रणनीतिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण था। अगले ही दिन शिवाजी ने अपने प्रमुख योद्धाओं को बुलाकर पूछा था कि कोंडाना किला जीतने के लिए कौन जायेगा? तानाजी के अतिरिक्त किसी भी अन्य योद्धा में इस कार्य को करने का साहस नहीं हुआ तथा तानाजी ने चुनौती स्वीकार की और केवल 342 सैनिकों की टुकड़ी के साथ 5000 मुग़ल सैनिकों से युद्ध करते हुए मराठा गौरव का परचम किले पर फहरा दिया था किन्तु तानाजी गंभीर रूप से घायल होकर वीरगति को प्राप्त हुए। जब छत्रपति शिवाजी को यह सूचना मिली तो वे बहुत आहत हुये.और उन्होंने कहा था कि "गढ़ आला, पण सिंह गेला".अर्थात -"गढ़(किला) तो जीत लिया, किन्तु अपना सिंह खो दिया"

यद्यपि फिल्म में थोड़ी-बहुत रचनात्मक स्वतंत्रता ली गई है किन्तु कथानक एवं विचारों का प्रवाह हिन्दू समाज की गौरव-गाथा का एहसास कराने में सफल रहा है। फिल्म में स्वराज एवं भगवा शब्द का अनेक बार प्रयोग किया गया है जो भले ही वर्तमान राजनैतिक परिस्थितियों में एक विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता दिखाई देता हो किन्तु उसके पीछे अपने सांस्कृतिक गौरव का सम्मान एवं उसकी रक्षा हेतु किसी भी हद तक गुजरने का जो सन्देश मिलता है, वह अद्वितीय है। मुगलों के अधीन हिन्दू समाज के कुछ लोगों का जब कहते  है कि "जी तो रहे ही हैं" पर तानाजी का कहना है - "यह कौन सा जीना है जब आपको अपनी माता, बहन और बेटियों को घरों में कैद करके रखना पड़ता है, आप अपने मंदिरों में ठीक से पूजा नहीं कर सकते, यहाँ तक कि अपने लोगों की मृत्यु पर खुलकर श्रीराम का नाम नहीं ले सकते, और खुलकर हर-हर-महादेव का नारा नहीं लगा सकते।" यह केवल संवाद नहीं है बल्कि समाज को अपनी संस्कृति एवं आत्मसम्मान की रक्षा हेतु प्रेरणा देता है। जिस समय तानाजी कोंडाणा के किले पर आक्रमण हेतु गए थे, उस समय उनके पुत्र रायबा के विवाह की तैयारियां चल रही थीं, किन्तु उन्होंने पुत्र के विवाह से अधिक छत्रपति शिवाजी के पूर्ण स्वराज्य को अधिक महत्त्व दिया यहाँ तक कि अपना जीवन भी समर्पित कर दिया।

फिल्म में युद्ध के दृश्य ठीक वैसे ही फिल्माए गए हैं जैसा इतिहास में वर्णित है। तानाजी को अपने सैनिकों के साथ किले पश्चिमी भाग से एक घनी अंधेरी रात को घोरपड़ की मदद से खड़ी चट्टान को पार करने में सफलता मिली थी। घोरपड़ को किसी भी ऊर्ध्व सतह पर खड़ा किया जा सकता है तथा इसके साथ बंधी रस्सी अपने साथ कई पुरुषों का भार उठा सकती है। इसी योजना से तानाजी अपने सैनिकों के साथ चुपचाप किले पर चढ़ गए तथा कोंडाणा का कल्याण द्वार खोलने के बाद मुग़लों पर हमला करने में सफल रहे। तानाजी मालुसरे जी ने बड़े वीरता से युद्ध करते हुए किले को मुगलों से स्वतंत्र कराया।  युद्ध के दौरान  जब ताना जी की ढाल टूट गई तो उन्होंने अपने सिर के फेटे (पगड़ी) को अपने एक हाथ पर बांधकर तलवारों के वार अपने उसी हाथ पर झेला तथा दूसरे हाथ से वे तलवार चलाते रहे और अंततः उदयभान राठौड़ का वध करते हुए किला जीतने में सफल हुए। वर्तमान में यह किला सिंहगढ़ के नाम से जाना जाता है।

विगत कुछ वर्षों से फिल्म निर्माताओं पर केवल एक विशेष विचारधारा से जुड़ी फ़िल्में ही परोसने के आरोप लगते रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में तानाजी जैसे महान योद्धा पर फिल्म का बनना भारतीय समाज को अपने महान गौरव की से पुनः जोड़ने की दिशा में अत्यन्त सराहनीय एवं अनुकरणीय प्रयास है। मैं फील निर्माताओं से निवेदन करना चाहूंगा कि वे गार्गी, मान्धाता, आरुणि, भामाशाह, पण्डित रामसिंह कूका जैसे चरित्रों को भी अपनी रचनात्मक क्षमता के अनुसार पुनर्जीवित करें। 

- दीपक श्रीवास्तव


Wednesday, January 1, 2020

--- पड़ोसन (1968) - एक मुस्लिम निर्माता द्वारा हिन्दू समाज के उच्च आदर्शों को स्थापित करती पूर्ण मनोरंजक फिल्म ---

एक समय था जब बॉलीवुड में बनने वाली फ़िल्में समाज में उच्च एवं यथार्थवादी आदर्शों को स्थापित करती थीं। किसी भी फिल्म में धर्म-सम्प्रदाय अथवा पूजा-पद्धति के आधार पर जनता को गुमराह करने का प्रयास नहीं किया जाता था। इतना ही नहीं, ऐतिहासिक तथ्यों को प्रस्तुत करने में भी फिल्म निर्माता संवेदनशील होते थे तथा वे समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी समझते थे। आज ऐसी ही एक फिल्म के बारे में बाते करेंगे जिसे एक मुस्लिम निर्माता ने बनाया था किन्तु इसने हिन्दू धर्म की पवित्रता एवं आदर्शों को समेटे हुए मनोरंजन के क्षेत्र में एक ऐसा इतिहास रच दिया कि हास्य मनोरंजन के क्षेत्र में इसके आसपास कोई फिल्म दिखाई नहीं देती। 

सन 1968 में बनी फिल्म "पड़ोसन" के निर्माता महमूद थे जो उस समय बॉलीवुड में एक बेहतरीन हास्य अभिनेता के रूप प्रतिष्ठित हो चुके थे। वे एक उच्चस्तरीय निर्माता भी थे जो भारतीय समाज को पोलियो जैसी कठिन बीमारी के प्रति जागरूक करने के लिए "कुंवारा बाप" जैसी संजीदा फिल्म बना चुके थे। "पड़ोसन" फिल्म के माध्यम से उन्होंने भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक ऐसी अमिट लकीर खींच दी जो बॉलीवुड के अस्तित्व के बने रहने तक जगमगाती रहेगी। 

पड़ोसन फिल्म में मामा जी के रूप में ओम प्रकाश जी ठाकुरों के सामाजिक किरदार को बखूबी से स्थापित करते हैं। उनके घर में एक सोफा है जिसके एक ओर सिंह का मुख बना हुआ है। वे स्वयं सिंह के मुख की और बैठना पसंद करते हैं तथा किसी भी आगंतुक को दूसरी ओर बैठना पड़ता है। विद्यापति का किरदार निभा रहे किशोर कुमार से यह कहना "इधर शेर का मुंह है, यहाँ केवल ठाकुर बैठते हैं" समाज में ठाकुरों के उत्तरदायित्व को भली प्रकार प्रस्तुत करता है। इस कथन को और भी बल मिलता है जब भोला द्वारा आत्महत्या का नाटक किये जाने पर मामा जी का कथन है, "ठाकुरों की कौम तो शान से वतन के लिए जान देती है, मोहब्बत में कमजोर होकर जान देना ठाकुरों का काम नहीं।"

भटकाव मानव जीवन का स्वभाव है तथा कई बार व्यक्ति अपनी बुद्धि द्वारा प्रेरित अहंकार के वशीभूत गलत दिशा की ओर प्रेरित हो जाता है ऐसे में अपने से छोटे व्यक्ति से भी यदि जीवन की सच्ची सीख मिल जाय तो उसे हृदय से स्वीकार करना ही सच्चे मनुष्य का लक्षण है। मामाजी भी इसी के वशीभूत अपनी पत्नी के होने के बावजूद दूसरे विवाह का संकल्प लेते हैं। उनके भांजे भोला का किरदार निभा रहे सुनील दत्त, जो वर्णाश्रम की चार अवस्थाओं का अध्ययन करते दिखाई देते हैं, अपने मामा को छोड़कर मामी के पास चले जाते हैं जो यह सन्देश देता है कि अहंकार के वशीभूत ग़लत मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति यदि सक्षम भी है तो भी उसका साथ देना उचित नहीं है। हालांकि इससे भी मामाजी का भटकाव ज्यों का त्यों बना रहता है। जब भोला के मित्र उनसे यह बताते हैं कि जिस लड़की से वे अपने रिश्ते हेतु प्रयास कर रहे हैं उससे उनके भांजे के रिश्ते की बात चल रही थी, इसे सुनकर मामाजी का शर्म से पानी-पानी हो जाना साबित करता है कि भटकाव के बावजूद समाज में आदर्शों के प्रतिमान कितने ऊँचे हैं। 

"पड़ोसन" फिल्म भगवान् राम द्वारा स्थापित आदर्शों को न सिर्फ मजबूती से जनता के समक्ष रखती है, बल्कि उनकी प्रभुता एवं अस्तित्व को पूरे मन से अंगीकार करती है। जब भोला अपने मित्रों के कहने पर फिल्म की नायिका बिंदु को थप्पड़ लगाने के उद्देश्य से जाता है तब बिंदु का अपने संगीत गुरु से यह कहना कि जब रावण ने सीता का हरण किया तब भगवान् श्रीराम ने क्या किया?" अधर्म होते देखने पर समाज को उसके विरुद्ध सचेत होकर उचित कदम उठाने की ओर प्रेरित करता है। इतना ही नहीं, जब भोला फिल्म के आखिरी दृश्यों में आत्महत्या करने का नाटक करता है, तब गुरु का कथन "भोले, ले राम का नाम" श्रीराम की प्रभुता की स्वीकारोक्ति है। यहाँ भोला का कथन "गुरु, मैं तो अपनी बिन्दु का नाम लूँगा।" स्पष्ट सन्देश देता है कि प्रेम में व्यक्ति अपने प्रियतम में ही ईश्वर का साक्षात् स्वरुप देखने लगता है। यहाँ गुरु का एक अन्य महत्वपूर्ण कथन है, "बिंदु रे, मैंने सुना है कि सच्चे प्रेम से मृतकों के भी प्राण लौटाए जा सकते हैं" तथा अंत में "बिंदु, तू सावित्री है जिसने यमराज से भी भोले के प्राण वापस लौटा लिए।" न केवल समाज में प्रेम के महत्त्व को मजबूती से समाज के समक्ष रखती है, बल्कि सावित्री के सतीत्व के तेज को भी स्मरण कराती है। 

फिल्म में किसी भी स्थान पर किसी प्रकार के आभासी दृश्य अथवा चमत्कार का प्रयोग नहीं किया गया है। फिल्म का स्पष्ट सन्देश है कि बिना परिश्रम योग्यता की कल्पना भी सम्भव नहीं है। भोला को गुरु द्वारा संगीत विद्या की शिक्षा "उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ते" कहावत का ही सजीव रूपान्तर है जिसमे परिश्रम एवं संकल्प की कमी एवं व्यग्रता की अधिकता होने के कारण भोला असफल हो जाता है। हालांकि फिल्म ने पुरुषों एवं स्त्रियों के मित्रता को भी स्वाभाविक रूप से व्यक्त किया है जिसमें मित्रता के लिए पुरुष किस हद तक जा सकते हैं तथा एक महिला किस प्रकार अपना शक अपनी सहेली के समक्ष रखती है। इतना ही नहीं, फिल्म में कृष्ण और अर्जुन के नाटक के दृश्य में व्यक्ति को अपने सदा अपने आत्मसम्मान की रक्षा करने का महत्वपूर्ण सन्देश भी मिलता है जब भोला अपनी प्रियतमा बिंदु से थप्पड़ खाकर अपने मित्रों के पास पहुँचता है और गुरु द्वारा उसे अपने आत्मसम्मान की रक्षा हेतु बिंदु को उससे भी जोरदार थप्पड़ लगाने का आदेश मिलता है। 

फिल्म का संगीत अत्यन्त उच्च स्तर का है। यूँ तो भारतीय संगीत 7 शुद्ध तथा 5 विकृत स्वरों द्वारा निर्मित है किन्तु "एक चतुर नार" गीत से बड़ा उदाहरण नहीं हो सकता जो यह साबित करता है कि संगीत वास्तव में मन की भाषा है तथा इसकी सशक्त अभिव्यक्ति केवल संगीत पाठ्यक्रमों में वर्णित सरगम, तराना और आलाप पर ही निर्भर नहीं हैं। किशोर कुमार द्वारा हिन्दी वर्णमाला के स्वरों का सरगम के रूप में ऐतिहासिक प्रयोग इसका सहज उदाहरण है। शिष्या एवं गुरु का सम्बन्ध पुत्री एवं पिता के समान है। यदि किसी भी पक्ष द्वारा इस सम्बन्ध को कोई अन्य रूप दिया जाने का प्रयास किया जाय तो यह सामाजिक दृष्टि से अनुचित है।  नायिका के गुरु द्वारा अपनी शिष्या के प्रति आसक्ति इसी और इशारा करती है कि व्यक्ति चाहे जितना भी योग्य हो किन्तु यदि वह अपनी गरिमा बनाकर नहीं रखा है तो समाज में उसे सम्मान नहीं मिलता। 

इससे स्पष्ट है कि फ़िल्में समाज के लिए कितना महत्वपूर्ण आदर्श रहने में सक्षम हैं। न जाने कैसे फिल्म के निर्माता व्यवसायीकरण की आड़ में विशेष भावना से प्रेरित फिल्मों का निर्माण करने लगे और गलत आदर्शों को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर परोसने लगे। इतना ही नहीं, उन्होंने ऐतिहासिक तथ्यों को भी तोड़-मरोड़ कर जनता को भ्रमित करने का प्रयास किया। भारतीय संस्कृति के आदर्श-स्तम्भ कब कार्टून एवं सुपरहीरो चरित्र बन गए यह पता ही नहीं चला। वर्तमान में भी ऐसी फिल्मे बनाये जाने की आवश्यकता है जो मुनाफा की दृष्टि से ऊपर उठ सकें तथा वर्तमान पीढ़ी को समाज निर्माण हेतु आवश्यक प्रेरणा प्रदान कर सकें। 

- दीपक श्रीवास्तव 


Wednesday, December 25, 2019

--- क्रिसमस पर विशेष ---

हमारा राष्ट्र पर्व -प्रधान है। वसुधैव कुटुम्बकम की महान भावना को हृदय में धारण किये हमने प्रत्येक मत, पंथ, सम्प्रदाय की भावनाओं को उचित सम्मान दिया है। हम कभी तलवारों के दम पर या आर्थिक प्रलोभन के आधार पर पंथ परिवर्तन के पक्षधर नहीं रहे। धर्म जीवन की गति है तथा यही  समाज मे मर्यादा एवं स्वतंत्रता में सामंजस्य बनाकर रखता है। अतः धर्मनिरपेक्ष होने का अर्थ स्वयं में पाशविक प्रवृत्तियों को अंगीकार करना है।

क्रिसमस समेत अनेक पर्वों पर परिवार एवं मित्रों के साथ खुशियां मनाना आज के एकाकी जीवन के लिए वरदान हो सकता है तथा इसे समाज को स्वीकार करना चाहिए। किन्तु बच्चों का मन अत्यन्त कोमल होता है तथा बचपन में पड़े संस्कार स्थायी होते हैं। अतः बच्चों के लिए सेंटा द्वारा उपहारों की कामना उनमें बचपन से ही लालची प्रवृत्तियों के विकसित होने की शुरुआत कर सकता है। यह बात छोटी भले ही प्रतीत होती हो, किंतु मुफ्त में कुछ भी पाने की प्रवृत्ति ही आगे चलकर समाज को बाजारवाद में उलझा देती है। इन्ही प्रलोभनों की आड़ में अनेक अयोग्य राजनेता मुफ्त सुविधाओं के प्रलोभन की आड़ में राजनीति के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन हो जाते हैं जिसका दुष्परिणाम पूरे देश को भुगतना पड़ता है।

क्रिसमस ट्री की सजावट बहुत अच्छी लगती है किंतु इन कृत्रिम वृक्षों पर जगमगाती नकली लाइटों की सजावट से ऊर्जा की बर्बादी के साथ-साथ अनावश्यक प्लास्टिक कचरा इत्यादि इकट्ठा हो जाता है जो पर्यावरण की दृष्टि से अच्छा नहीं है। बड़े स्तर पर नित सजाए जाने वाले मॉल इत्यादि इसी का वृहद रूप हो सकते हैं जो चाहे कितने भी भव्य दिखें किन्तु वे  जीवन शैली में भौतिक दिखावे को ही बढ़ावा देते हैं और जब इनसे व्यक्ति बोर हो जाता है तब वह उन्हीं प्राकृतिक स्थानों की ओर मुड़कर देखता है जिन्हें वह विकास की अंधी दौड़ में पीछे छोड़ आया है। आइए जीवनदायी वृक्षों को क्रिसमस ट्री मानकर उनके जलाभिषेक द्वारा अपना एवं समाज का बेहतर भविष्य सुनिश्चित करें।

मेरा निवेदन है कि इस शुभ अवसर पर बच्चों को उनके नैतिक आदर्शों वाली यथार्थपरक कहानियों से जोड़ा जाए जिससे उनके अन्दर अच्छे-बुरे की समझ के साथ संघर्ष, परिश्रम का आदर्श विकसित हो सके जिससे वे बेहतर समाज के महत्वपूर्ण घटक बन सकें।

- दीपक श्रीवास्तव



Sunday, December 22, 2019

--- राष्ट्र से ऊपर होती विद्वेष की राजनीति ---

यह निर्विवाद सत्य है कि प्रधानमन्त्री मोदी के सक्षम नेतृत्व में भारतवर्ष का कद वैश्विक पटल पर बढ़ा है। वर्तमान सरकार भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों एवं वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को विश्व स्तर तक पहुंचाने में सफल रही है। एक ओर जहाँ केदारनाथ की गुफ़ा के माध्यम से स्वयं में स्थित होकर आध्यात्मिक रहस्यों को जानने की भारत की अभिन्न परम्परा "तपश्चर्या" से समूचा विश्व अवगत हुआ, वहीँ दूसरी ओर वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को हृदय में धारण करते हुए विश्व-शान्ति का संदेश देने वाले इस राष्ट्र ने मानवता के शत्रु "आतंकवाद" को कमजोर करने में अग्रणी भूमिका निभाई है। स्वच्छता को एक जन-आन्दोलन का रूप देते हुए तथा आर्थिक रूप से शोषित एवं दुर्बल वर्ग के जीवन स्तर को उन्नत बनाते हुए समाज में उनके सम्मानपूर्वक जीवन हेतु वर्तमान सरकार ने अत्यन्त सराहनीय कार्य किया है। इसने किसी को भी झूठा प्रलोभन या मुफ़्तख़ोरी का जीवन देने का प्रयास नहीं किया बल्कि उन्हें आत्मनिर्भरता की ओर उन्मुख करने का प्रयास किया है। शायद इसी कारण सरकार अधिकांश जनता का विश्वास जीतने में सफल रही है। 

पड़ोसी देशों में धार्मिक भेदभाव से उत्पीड़ित अनेक परिवारों को सम्मानजनक जीवन एवं सामाजिक आधार देने के संकल्प से भारत सरकार "नागरिकता संशोधन बिल" लेकर आई है। दुर्भाग्य से इस विषय पर स्वस्थ परिचर्चा के स्थान पर हिंसक घटनाएं हो रही है जो वैश्विक स्तर पर भारतवर्ष की पहचान के प्रतिकूल हैं जबकि यह बिल पूरी तरह से भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप है। शरणागति की रक्षा के बारे में गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है - 

"सरनागत कहुँ जे तजहिं, निज अनहित अनुमानि।
ते नर पामर पापमय, तिन्हहि बिलोकत हानि।। 
अर्थात "जो मनुष्य अपने अहित का अनुमान करके शरण में आए हुए का त्याग कर देते हैं, वे पामर (क्षुद्र) हैं, पापमय हैं, उन्हें देखने में भी हानि है।" यह वानरों द्वारा विभीषण के प्रति सन्देह व्यक्त करने पर भगवान् श्रीराम के मुख से निकले वचनामृत हैं। 

अनेक लोगों का यह तर्क हो सकता है कि बड़ी संख्या में लोगों के यहाँ आने से राष्ट्र की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है क्योंकि इससे राष्ट्र पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ सकता है। किन्तु विधेयक में स्पष्ट रूप से वर्णित है कि इससे केवल उन्हें भारतीय नागरिकता प्रदान की जायेगी जो 31 दिसम्बर 2014 से पहले ही अपने देश में धार्मिक उत्पीड़न का शिकार होकर भारत में शरण ले चुके हैं तथा वर्तमान में अपने जीवन-यापन हेतु अवैध रूप से भारतीय संसाधनों पर निर्भर हैं। इसका सीधा अर्थ है कि इससे भारत को आर्थिक स्तर पर कोई हानि नहीं है। विभाजन की विभीषिका से पीड़ित अनेक परिवारों ने अपने जीवन में धार्मिक कट्टरता के कारण अपमान और मृत्यु का वह ताण्डव देखा है जिसके बारे में सुनकर ही एक सामान्य व्यक्ति अन्दर तक सिहर उठता है। ईश्वर द्वारा बनाई इस सृष्टि में मनुष्य एवं जानवरों के जीवन यापन हेतु जब स्वयं ईश्वर ने कोई भेदभाव नहीं किया तो ऐसी परिस्थिति में भूमि पर मात्र एक सीमा रेखा खींच देने से यदि एक व्यक्ति के लिए भी सम्मान से जीवन जीने का अधिकार छिनता है तो प्रकृति से प्रतिकूलता का इससे बड़ा उदाहरण नहीं हो सकता। 

धर्म जीवन का आधार है। दुर्भाग्य से वर्तमान में पूजा-पद्धति को ही धर्म का पर्याय मान लिया गया है। अब तक धर्मनिरपेक्षता शब्द का दुरुपयोग कुछ वर्गों का तुष्टीकरण करते हुए समाज के आधारभूत ढाँचे को बांटकर ध्वस्त करने में होता रहा है। जब तक समाज बंटा हुआ है तब तक शांति स्थापित नहीं हो सकती। रावण के शब्दों में "जब राम और रावण दोनों का अस्तित्व है, तब तक शांति नहीं हो सकती। शान्ति के लिए दोनों में से किसी एक को मरना होगा।" उसी प्रकार जब तक मत-भेद हैं, मनों में भिन्नता है तब तक भारतीय समाज में संघर्ष होता रहेगा। शान्ति के लिए इस भिन्नता को मिटाना ही होगा। 

शिक्षित समाज बुद्धि प्रधान होने के कारण आत्ममुग्धता में लीन है और विषयों की अनभिज्ञता के बावजूद सत्य से परे विभिन्न तर्क-कुतर्क प्रस्तुत करता है तथा मैं और मेरा परिवार तक सीमित रह गया है। उसमे अपने राष्ट्र के प्रति भावना विकसित नहीं हो पाती। अशिक्षित समाज पर रोजी-रोटी का संघर्ष इतना हावी है कि वह अपनी संख्या का अधिकाधिक विस्तार तो कर लेता है किन्तु उसकी संतानें समाज में एक स्तरीय जीवन कैसे जियें इसकी चिंता नहीं कर पाता। फलस्वरूप समाज में अराजकता, लूटपाट, हिंसा, महिला-उत्पीड़न जैसी घटनाओं में व्यापक विस्तार होता है। इसी का लाभ समाज के स्वार्थी तत्व उठाते हैं क्योंकि जब पेट की भूख संस्कारों पर हावी हो जाती हैं तब व्यक्ति अच्छे-बुरे में भेद करने में असमर्थ हो जाता है तथा थोड़े आर्थिक लाभ में ही उससे ऐसे कृत्य कराये जा सकते हैं जो राष्ट्रहित में संवेदनशील हो सकते हैं। आतंकवाद की दिशा में अग्रसर अधिकांश युवक भी कहीं न कहीं इन्ही परिस्थितियों के शिकार हैं। इसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह हुआ है कि न सिर्फ आर्थिक बल्कि बौद्धिक आधार पर भी समाज में बहुत बड़ी खाई बन गई है। हम समाज में एक बौद्धिक वर्ग को अक्सर कहते हुए सुन सकते हैं कि अमुक वर्ग हमसे बात करने लायक नहीं है। यह बौद्धिक भिन्नता जब तक समाज में बनी हुई है तब तक राष्ट्र के विभिन्न रंगों के एक सूत्र में पिरोना संभव नहीं है। 

आज वर्तमान सरकार पर न सिर्फ धर्म, जाति, अर्थ बल्कि विभिन्न बौद्धिक स्तरों को भी एक साथ लेकर चलने की बड़ी चुनौती है जिस पर पूर्ववर्ती सरकारों ने कोई ध्यान नहीं दिया। किन्तु वर्तमान सरकार ने जिस प्रकार इसका संकल्प लिया है उससे यह सुनिश्चित है कि ये प्रगति की ओर मजबूती से बढ़े कदम हैं तथा लक्ष्य दूर नहीं है। 

- दीपक श्रीवास्तव 

तन-मन-मानस" द्वितीय श्रृंखला का आयोजन सम्पन्न

श्री अरविन्द आश्रम की पावन तपस्थली में आयोजित तन-मन-मानस की द्वितीय श्रृंखला के अन्तर्गत प्रमुख वक्ता दीपक श्रीवास्तव ने पुरुषार्थ एवं प्रारब्ध के मध्य सन्तुलन की तत्वपरक सामाजिक व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि मनुष्य के जीवन में पुरुषार्थ एवं प्रारब्ध सदैव एक दूसरे पर हावी होने का प्रयास करते रहते हैं। अक्सर मनुष्यों में किसी एक की प्रधानता पाई जाती है किन्तु श्रीरामचरितमानस दोनों में सन्तुलन स्थापित करने का महत्वपूर्ण सामाजिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। 

श्री दीपक श्रीवास्तव ने बताया कि बालि महायोद्धा था। वह घोर पुरुषार्थवादी तो था ही, साथ ही उसमे शक्ति का अहंकार भी था जिसके वशीभूत उसके कुछ कृत्य मानवता के विपरीत हो गए थे। चूंकि कर्मों के अनुसार व्यक्ति का प्रारब्ध सुनिश्चित होता है अतः श्रीराम ने एक वृक्ष की आड़ में खड़े होकर उसका वध किया था। कुछ लोगों के प्रश्न "श्रीराम ने बालि से युद्ध क्यों नहीं किया?" के उत्तर में उन्होंने बताया कि श्रीराम ईश्वर के सगुण रूप में उपस्थित हैं तथा ईश्वर स्वयं कभी युद्ध नहीं करता, वह तो व्यक्ति के कर्म की आड़ में न्याय करता है। यहाँ वृक्ष कर्म का प्रतिविम्ब है। अतः पुरुषार्थवादी बालि सबल होने के बावजूद अपने ही कर्मों द्वारा बने प्रारब्ध से बच नहीं पाता तथा इसी की आड़ में ईश्वर द्वारा न्याय कर दिया जाता है। अब बालि का प्रश्न होता है कि क्या उस पतितपावन परमेश्वर के साक्षात सगुण स्वरुप के दर्शन से भी मैं पापमुक्त नहीं हुआ?, उसी क्षण उसका मस्तक श्रीराम की गोद में होता है। 

उन्होंने मैना-पार्वती संवाद की व्याख्या करते हुए आगे बताया कि जब किसी सिद्धांत पर लोगों में मतभिन्नता होती है तब अक्सर तर्कपूर्ण बहस आधारहीन हो जाते हैं क्योंकि तर्क में पराजित व्यक्ति में मन में सिद्धांत से अधिक उनकी पराजय हावी रहती है तथा विजयी व्यक्ति के मन में विजय का अहंकार हावी होता है। यही कारण है कि घोर पुरुषार्थ की प्रतीक माता पार्वती, जिन्होंने अपने महान तप के आधार पर भगवान् शिव को पति रूप में प्राप्त किया था, ने मैना द्वारा शिवस्वरूप पर सन्देह के विरोध में कोई तर्क प्रस्तुत करने की बजाय प्रारब्ध का सहारा ही लिया जिससे मैना को पराजय का दंश नहीं झेलना पड़ा और न ही माता पार्वती में किसी प्रकार का अहंकार उत्पन्न हुआ। 

कार्यक्रम में अंकित चहल ने अपनी कविता से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। कुलश्रेष्ठ कैन्सर केयर चैरिटेबल ट्रस्ट के अध्यक्ष डॉ यतीन्द्र कुलश्रेष्ठ ने कहा कि समाज की वर्तमान स्थिति को देखते हुए श्री अरविन्द आश्रम की ओर से इस प्रकार के आध्यात्मिक कार्यक्रमों का आयोजन अति सुखद एवं समाज के हित में हैं। नव-सृजन समिति के अध्यक्ष श्री के सी श्रीवास्तव ने कहा कि दीपक श्रीवास्तव द्वारा श्रीरामचरितमानस की इस प्रकार की व्याख्या सामाजिक दृष्टि से अत्यंत आवश्यक है तथा इसमें लोगों की भागीदारी बढ़नी चाहिए। 

कार्यक्रम के अंत में अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री अरुण नायक ने कहा कि श्री अरविन्द सोसाइटी समाज की आध्यात्मिक प्रगति में निरन्तर कई वर्षों कार्य कर रही है तथा भविष्य में भी ऐसे कार्यक्रमों हेतु कृतसंकल्प है। कार्यक्रम में शैली शर्मा, कवि अंकित चहल, कवि पंकज, डॉ यतीन्द्र कुलश्रेष्ठ, श्री के सी श्रीवास्तव, अंजलि समेत अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

Thursday, November 28, 2019

राष्ट्रपिता

दुर्भाग्य से आज पुनः राजनीति गांधी जी पर केंद्रित हो गई है। राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के वशीभूत भले ही आज महात्मा गांधी राष्ट्रपिता के रूप में स्वीकार्य हुए हैं किंतु तथ्य यही है कि प्रत्येक व्यक्ति केवल एक सीमित कालखण्ड का हिस्सा भर ही है तथा राष्ट्र किसी भी व्यक्ति की जीवन की सीमाओं से बहुत ऊपर है।राष्ट्र केवल जमीन का टुकड़ा नहीं है बल्कि अनंत में विचरते अनेक भावनाओं का केन्द्र है जिसकी विशालता को केवल एक व्यक्ति के जीवन की सीमाओं से परिभाषित नहीं किया जा सकता। यहां सत्य की परिभाषा यदि हरिश्चन्द्र है तो मर्यादा के स्तंभ श्रीराम है, भक्ति एवं प्रेम की पराकाष्ठा यदि गोकुल की गोपियाँ हैं तो सेवा के चरमबिन्दु श्री हनुमानजी हैं। कहीं ज्ञान के अहंकार को ध्वस्त करती विदुषी गार्गी हैं तो सतीत्व के बल पर यमराज से पति के प्राण वापस लाने वाली सावित्री भी हैं, यदि दुधमुंहे बालक को पीठ से बांधकर राष्ट्र के लिए जीवन बलिदान करने वाली वीरांगना लक्ष्मीबाई हैं तो वहीं राष्ट्र की बलिबेदी पर पुत्रों को भी बलिदान करने का हौसला रखने वाले गुरु गोविंद सिंह हैं। ये सभी राष्ट्र की पहचान होते हुए भी कालखण्ड की सीमाओं से बंधे हुए हैं। राष्ट्र ऐसे ही अनेक गाथाओं का एकमात्र प्रत्यक्ष गवाह है। अतः केवल क्षणभंगुर जीवन धारण किये एक व्यक्ति को इसका पिता कहना आश्चर्यजनक है एवं राजनीतिक स्वार्थों के वशीभूत लगता है। व्यक्ति है तो उसके आदर्श भी हैं, उसका जीवन अनुकरणीय भी है एवं राष्ट्र के प्रति उसकी सेवा भी वंदनीय है किंतु चराचर अविनाशी संस्कृति एवं राष्ट्र का पिता कोई नश्वर देहधारी कैसे हो सकता है? यदि व्यक्ति है तो उसका मन एवं मस्तिष्क भी शरीर की सीमाओं से बंधा हुआ है अतः समाज में उसके समर्थक एवं विरोधी भी स्वाभाविक हैं और यदि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर एक दूसरे की मान्यताओं पर कीचड़ उछाला जा सकता है तो एक नश्वर देहधारी के बारे में विरोधी भाव अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अपमान नहीं है? जिस प्रकार सुख के साथ दुःख, जीवन के साथ मृत्यु, राजा के साथ रंक द्वारा समाज एवं जीवन मे संतुलन है उसी प्रकार समर्थन के साथ विरोध का संतुलन भी आवश्यक है अन्यथा समाज का एक पक्ष कुंठित हो जाएगा। जातिवादी व्यवस्था भी इसी असंतुलन एवं कुंठा का परिणाम है।

- दीपक श्रीवास्तव

Tuesday, November 12, 2019

पुस्तक समीक्षा: इंसान बिकता है

प्रश्नों में उलझा हुआ समाज जब कभी भी पीछे मुड़कर अपनी वर्तमान स्थिति की समीक्षा करता है, तो उसे मार्ग दिखलाने का कार्य पुरातन समाज को स्पष्ट रूप से उजागर करती निष्पक्ष लेखनी ही करती है जो उस समय इतिहास का आकार ले चुकी होती है। मनुष्य जन्म लेता है और जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों से गुजरता हुआ इस नश्वर संसार से चला जाता है, इसी प्रकार पीढ़ियों का क्रम चलता रहता है, किन्तु हर व्यक्ति के जीवन की घटनाएं उसकी भावी पीढ़ी को न सिर्फ प्रभावित करती हैं, बल्कि अपना मार्ग निर्धारित करने हेतु आवश्यक दिशा-निर्देश भी प्रदान करती हैं। यदि एक व्यक्ति के मन में कोई प्रश्न, दुविधा या उलझन है, तथा वह विभिन्न व्यक्तियों के समक्ष अपना प्रश्न रखता है, तो स्वाभाविक है कि हर व्यक्ति उसे अपनी-अपनी दृष्टि से हल बताएगा, किन्तु दुविधाग्रस्त व्यक्ति उचित निर्णय अपनी परिस्थिति के अनुसार ही ले सकता है क्योंकि प्रश्नों के हल भी कालखण्ड एवं परिस्थितियों पर निर्भर होते हैं। इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण गोस्वामी तुलसीकृत श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में मिलता है, जब गरुड़ जी के चित्त में मोह उत्पन्न होता है और वे काकभुशुण्डि जी के पास जाते हैं। यदि काकभुशुण्डि जी उन्हें सीधे-सीधे हल बता देते तो यह उनकी व्यक्तिगत परिस्थितियों के अनुसार होता, जो गरुड़ जी के लिए अनुपयुक्त भी हो सकता था। अतः काकभुशुण्डि जी ने उन्हें केवल अपने जीवन का अनुभव सुनाया जिसके पश्चात गरुड़ जी अपना उपयुक्त हल प्राप्त करने में सफलता प्राप्त हुई।

श्री अंकित चहल की कृति "इंसान बिकता है"वर्तमान समाज की स्पष्ट छवि प्रस्तुत करती है जिसका प्रारम्भ ही वर्तमान राजनैतिक, कारपोरेट, एवं गलाकाट प्रतिस्पर्धा के बीच मनुष्य के मन में चल रही विवशता को भी उजागर करती है जिसके फलस्वरूप व्यक्ति सही-गलत में अन्तर नहीं कर पाता, यथा -
"जरा सी ख्वाहिशों में डूबकर इंसान बिकता है। 
"तरक्की खून रोती है, यहाँ ईमान बिकता है। "

रचनाकार ने अवसरवादी राजनेताओं के चुनावों के पहले और बाद के चरित्र का अत्यन्त प्रभावी एवं स्पष्ट चित्र खींचा है तथा इसके भी आगे जाकर उनके प्रतिद्वन्दियों के भी स्वाभाविक चरित्र को प्रस्तुत किया है - 
"सबूतों की करेंगे मांग चिल्लाकर वही सारे, अदालत से रिहा हैं जो सबूतों के अभावों में” 
तथा 
"असल में खेलने वाले सभी संसद में बैठे हैं।"  

समाज को प्रगतिगामी होने के लिए अपनी संस्कृति के मूल से जुड़ा होना आवश्यक है, रचनाकार के अंतर में इस पीड़ा के स्पष्ट दर्शन होते हैं तथा समाज को प्रगतिगामी मार्ग पर ले जाने हेतु वह हर छोटी-बड़ी बात को लिखना नहीं भूलता, यथा - "सुबह जल्दी उठो ये रतजगे अच्छे नहीं होते" ।
सैनिक संघर्षों से जूझकर निरन्तर सीमाओं पर डटे हुए रहते हैं। राष्ट्र सर्वोपरि है अतः उसकी सुरक्षा के आगे वे अपने जीवन की आहुति देने से भी नहीं हिचकते, इसीलिए राष्ट्र एवं राष्ट्रवासी सुरक्षित रहते हैं। यह एक साहित्यकार का सबसे बड़ा उत्तरदायित्व है कि ऐसे निश्छल शूरवीरों के संघर्षों से समाज को भलीभांति अवगत कराये जिससे समाज प्रेरणा लेकर चल सके एवं राष्ट्र निर्माण एवं प्रगति में निष्काम भाव से अपना योगदान दे सके। अंकित की कृति इस भाव को अत्यन्त प्रभावी एवं पूरे साहित्यिक सामर्थ्य के साथ पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करती है। 

यह सत्य है कि वर्तमान समय में प्रेम का अर्थ सामाजिक जीवन में केवल शारीरिक सुख तक ही सिमटता जा रहा है, सच्चे प्रेम के अनुभव से विगत कुछ दशकों में समाज में दूरी बढ़ी है। जहाँ प्रेम है वहां समाज जुड़ता है एवं विश्व हेतु अनुकरणीय उदाहरण रखता है किन्तु यह बात पीढ़ियों को याद रखनी चाहिए कि जब प्रेम निष्काम न रहकर केवल वासना तक सीमित रह जाता है तो समाज रोगी हो जाता है जिसका उपचार अत्यंत कठिन है तथा उत्पन्न समस्या अनेक युगों तक बनी रहती है और भयानक विष की भांति भावी पीढ़ियों को ग्रसती है जिसका स्पष्ट दृश्य रचनाकार ने अपने मुक्तक में रखा है - 
"बदन की प्यास बुझते ही ये रिश्ते तोड़ देते हैं। 
भयानक खौफ़ के फिर इसमें किस्से जोड़ देते हैं।"
इतना ही नहीं रचनाकार उक्त पाप से ग्रसित जीवन का बोझ ढोने वालों की पीड़ा का अनुभव भी अपने हृदय में करता है, अतः समाज से वह निवेदन करता है - "उजाले ढूंढती आँखों के गर तुम नूर हो जाते। किसी बेवा की सूनी मांग का सिन्दूर हो जाते।"

वर्तमान समाज में अनेक ऐसी प्रतिभाएं है जो उपयुक्त अवसर न मिलने के कारण या पारिवारिक एवं सामाजिक जिम्मेदारियों के बोझ में उलझकर रह जाती हैं तथा समाज उनसे लाभान्वित नहीं हो पाता। श्री अंकित ने इस ओर अत्यन्त मार्मिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है - 
"मेरी उम्मीद को हर बार ठोकर मार देता है। 
जो तूफ़ां है मेरे अंदर, मेरा घर मार देता है।"

"इंसान बिकता है" प्रेम की अभिव्यक्ति से भरपूर है। इसमें सूर, कबीर, तुलसी, मीरा के निच्छल प्रेम की अभिव्यक्ति भी है, तो बच्चों के बड़े होने एवं अपने पैरों पर खड़े होने के बाद अपने ही माता-पिता से बदलते प्रेम से स्वरुप का चित्र भी है। भौतिकता के भ्रम में संवेगों का उफ़ान भी है तो निश्छल प्रेम की परिणीति का पूर्ण विराम भी है -
"जब भी तेरा नाम लिखा है। 
मैंने पूर्ण विराम लिखा है। "

समाज के विविध रूप रंग हैं। कहीं उमंगे हैं कहीं अल्हड़ता है तो कहीं गंभीरता एवं जिम्मेदारियों का बोध भी है। कहीं बाल-मन है तो मां की ममता भी है। कहीं सामाजिक कुरीतियां हैं तो समाज निर्माण के प्रयास भी हैं। कहीं मन पर बुद्धि हावी है तो अंतश्चेतना का एहसास भी है। इतने विविध रंगों को एक पुस्तक में संजोकर, समेट कर लाने का जो महान कार्य अंकित चहल ने किया है वह अद्भुत है। पुस्तक की लेखन शैली अत्यंत सरल एवं सहज है जो साधारण जनमानस के हृदय में सीधे उतरने वाली है। मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि "इंसान बिकता है" के माध्यम से अंकित का यह प्रयास जन-जन के हृदय में सदा के लिए अपना स्थान बनाएगा तथा एक सुंदर समाज की परिकल्पना को साकार करने में यह एक महत्वपूर्ण योगदान साबित होगा।

- दीपक श्रीवास्तव

Wednesday, October 9, 2019

--- ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी ---

श्रीरामचरितमानस की उक्त पंक्ति को आधार बनाकर विधर्मियों ने भारतीय समाज के विरुद्ध जो षङयन्त्र रचा है,दुर्भाग्य से आज भी यह समाज को बांटने में सफल हो रहा है। बिना मूल भाव को समझे जब दुर्भावना से किसी पंक्ति की आधी-अधूरी व्याख्या की जाती है तो भोली-भाली जनता षड्यंत्रकारियों के जाल में फंस ही जाती है तथा समाज टूटने लगता है। मातृ शक्ति स्वरूपा नारी एवं ईश्वरीय तत्व के सबसे निकट रहने वाला सेवक समाज इसी का शिकार होकर समाज में उपेक्षित होकर रह गया। मेरा व्यक्तिगत मानना है कि जब लेखन किसी विशेष वर्ग की ओर अधिक झुकता है तो यह उस वर्ग को समाज से और अलग कर देता है। उदाहरण के लिए शम्बूक वध से सेवक वर्ग को जितनी उपेक्षा नहीं मिली उससे अधिक उनको विशेष सिद्ध करते हुए लेखों से मिल गई क्योंकि सेवक वर्ग के बारे में उक्त पंक्तियों की आवश्यकता से अधिक व्याख्याएं उपलब्ध हैं फिर भी यह वर्ग उपेक्षित है। ऐसा ही मुस्लिम वर्ग के बारे में भी है, स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात जितना राजनैतिक खेल उनके पक्ष में खेला गया उससे कहीं अधिक वे अशिक्षा, गरीबी और भूख से आज भी संघर्ष कर रहे हैं। यही उदाहरण मातृस्वरूपा नारी शक्ति पर भी सटीक है क्योंकि नारियों से सम्बंधित चाहे जितने नियम बन रहे हों किन्तु दिनों-दिन उनके प्रति अपराध की संख्या में भी वैसी ही वृद्धि हो रही है। वहीं इस देश का सबसे उपेक्षित सामान्य वर्ग, जिसके अधिकारों पर भी कोई विशेष चर्चा नहीं होती, जिसकी योग्यता ही उसकी एकमात्र आजीविका है, जिसके सामान्य अधिकारों एवं पर विभिन्न राजनैतिक कारणों से दबाव रहा, वही वर्ग आज आज भी समाज को जोड़े रखने हेतु निरन्तर प्रयासरत है तथा प्रत्येक क्षेत्र में राष्ट्र निर्माण में सबसे अधिक भागीदारी देता रहा है।

श्रीरामचरितमानस ग्रन्थावतार के सुन्दरकाण्ड में वर्णित अवधी भाषा में रचित उक्त पंक्ति को समाज को तोड़ने के लिए एक शस्त्र की तरह उपयोग किया जाता रहा है। गोस्वामी तुलसीदास जी की जैसी तपस्या एवं साधना थी, उसके अनुसार व्यक्ति उनके द्वारा रचित पंक्ति का अर्थ भर भी समझकर अपने जीवन में उतार ले तो उसका जीवन धन्य हो जाएगा इसके बावजूद धर्मविरोधी तत्वों द्वारा इसकी गलत व्याख्या होती रही जिसका प्रारम्भ ताड़ना शब्द के अर्थ से हुआ। पाठक वर्ग जब कोई साहित्य पढ़ता है तो संवादों को चरित्र के सन्दर्भ में देखता है। यदि संवाद नायक का है तो वह नायक का चरित्र प्रस्तुत करता है तथा यदि खलनायक का है तो वह खलनायक का चरित्र प्रस्तुत करता है। दोनों ही परिस्थितियों में लेखक की मूल भावना पृथक एवं तटस्थ रहती है। अतः उसे लेखक के व्यक्तिगत दृष्टिकोण से जोड़कर देखना कहीं से भी न्यायसंगत नहीं है। किन्तु "ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी" को मूल अर्थ लेखक में लेने पर भी वह अर्थ नहीं निकलता जो दुर्भावना से प्रचारित है। "ताड़ना" अवधी भाषा का शब्द है जिसे हिन्दी के "प्रताड़ना" शब्द के अर्थ से जोड़ते हुए चौपाई के मूल भाव को बदलने का षड़यत्र किया गया। ताड़ना एक अवधी शब्द है, जिसका अर्थ - पहचानना, परखना या देखरेख करना। सामान्य बोलचाल की भाषा में यदि यह कहा जाय कि "अमुक व्यक्ति किसी स्त्री को ताड़ रहा है" तो आप स्वयं ही समझें कि इसका अर्थ क्या निकालेंगे- प्रताड़ित करना या घूर के (बहुत ध्यान से) देखना।

उक्त चौपाई का सन्दर्भ भी देखें - जब श्रीराम वानर सेना सहित तीन दिनों तक समुद्र से मार्ग देने की याचना लिए प्रतीक्षा करते हैं तथा कोई उत्तर नहीं मिलता, तब वर्णन आता है कि -

"विनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।।"

तब समुद्र देव प्रकट होकर अपनी बात रखते हैं -
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।।
तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।।
ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी।।

"ढोल, गंवार ..." पंक्तियों पर विचार करने से पहले समुद्र द्वारा कथित "गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी" पर विचार करना आवश्यक हो जाता है क्योंकि यहाँ सृष्टि में उपस्थित तत्वों को जड़ कहा गया है जिसे समुद्र ने स्वीकार किया है। यहाँ जड़ शब्द अत्यन्त व्यापक अर्थ में प्रयोग किया गया है तथा केवल यहीं नहीं प्राणियों के सृजन में प्रयुक्त पंचतत्व भी जड़ तत्व को ही प्रदर्शित करते है। जीवित एवं मृत व्यक्ति में भी जड़ तत्वों के आधार पर कोई अन्तर नहीं किया जा सकता किन्तु जड़ शरीर में उपस्थित चेतना ही दोनों के अन्तर को स्पष्ट करती है। सृष्टि एवं ब्रह्म क्रमशः जड़ एवं चेतन तत्व हैं। विडम्बना यह है कि सृष्टि रुपी जड़ को जड़रूपी नेत्रों से स्पष्ट देखा जा सकता है किन्तु चेतन रुपी ब्रह्म को जड़ रुपी नेत्रों से देखना संभव नहीं है। इस प्रकार का वर्णन श्रीरामचरितमानस में अनेक बार प्रयुक्त हुआ है। अहिल्या भी पत्थर के रूप में जड़ स्वरुप का प्रतिनिधित्व करती है जो ईश्वरीय चेतना (श्रीराम) के स्पर्श मात्र से धन्य हो जाती है। केवट की भी व्यथा ऐसी ही है जो उसे जड़ रुपी नाव में चेतना के संचार का भय प्रदान करती है। वस्तुतः केवट के मन की व्यथा समाज के अधिकांश व्यक्तियों की भौतिकवादी व्यथा का ही सजीव निरूपण है। आर्थिक एवं भोगवादी समाज में सामान्य व्यक्ति अपनी भौतिक संपत्ति को सहेजकर रखने का प्रयास करता है तथा भौतिक सुखों को ही जीवन के रसों का पर्याय मानने लगता है। अध्यात्म रुपी जीवन को वह नीरस मानते हुए, बिना उसके मर्म को जाने उसकी कल्पना में शंका एवं संसय का भाव रखता है। इसी कारण केवट संशयग्रस्त होकर कहता है -

"छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई॥
तरनिउ मुनि घरिनी होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई।।"

अर्थात जड़ नेत्र केवल जड़ में ही अपना हित देख पाते हैं। किन्तु जैसे ही जड़रूपी मन में चेतना के संचार की अनुभूति होती है वैसे ही जीव आनंदमय हो जाता है। यही बात शबरी प्रसंग में भी द्रष्टव्य है जब वह स्वयं को जड़ के रूप में व्यक्त करते हुए करती है - "अधम जाति मैं जड़मति भारी।"

 जिस प्रकार सृष्टि में दो ही प्रकार के तत्व हैं - जड़ एवं चेतन, उसी प्रकार प्रकृति और पुरुष मिलकर ही समष्टि का निर्माण करते हैं। शिव का अर्धनारीश्वर रूप इन दोनों तत्वों में संतुलन को दर्शाता है। प्रकृति जड़ तत्व है तथा पुरुष चेतन तत्व है। चेतन तत्व हमें बहुधा स्पष्ट दिखाई नहीं देता किन्तु जड़ तत्व से ऊपर उठने पर हमें चेतन स्वरूप से साक्षात्कार हो जाता है। यदि नारी के सन्दर्भ में सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो महसूस होगा कि नारी जड़ तत्व को पूर्ण रूप से परिभाषित करती है। नारी प्रकृति तत्व है। प्रकृति तत्व अन्य जड़ तत्वों को उत्पन्न कर सकता है अतः सृजन की प्रक्रिया को धारण करने की क्षमता केवल नारी में ही सम्भव है। चेतना का जड़ के बिना कोई ठोस अनुभव नहीं कर सकता क्योंकि अनुभव इन्द्रियजन्य हो या इन्द्रियातीत, दोनों के अनुभव हेतु शरीर अर्थात जड़ तत्व को धारण करना अनिवार्य है। सूरदास के पद में निर्गुण ब्रह्म का अनुभव कुछ इस प्रकार है - "अबिगत गति कुछ कहत न आवै, ज्यों गूंगा मीठे फल को रस अंतरगत ही पावै।" परन्तु यहाँ भी गूंगा जड़ तत्व का प्रतीक है।
 
मेरे विचार में गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा अवतरित उक्त पंक्तियाँ व्यक्ति को सामाजिक जीवन हेतु एक मजबूत आधार प्रदान करती हैं। "ढोल,गंवार, शूद्र, पशु, नारी" पर विशेष दृष्टि रखने की आवश्यकता क्यों है,इसे समझने के लिए इसके भाव तथा इसके कहने वाले का आशय समझना आवश्यक है। उक्त पंक्ति समुद्र द्वारा कथित है जो संसार में पदार्थ प्रवृत्ति अर्थात जड़ का प्रतिनिधित्व करती है। समुद्र ने अपनी जड़ता को स्वीकार किया है,जो समाज के लिए एक बड़ा सन्देश है। वर्तमान में लोग अपने मूल व्यक्तित्व पर इतने छद्म चेहरे लगाकर रहते हैं कि उन्हें अपने वास्तविक स्वरुप की भी विस्मृति हो जाती है। लंका में कुछ ऐसा ही दृश्य उस समय आता है जब हनुमान जी सीता माँ का पता लगाने पहुँचते हैं तथा दिन में पहुँचने पर लंका का दृश्य कुछ ऐसा है -

"तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा।।
नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए।।"

इतना सुन्दर दृश्य देखकर भला किसे वास्तविक (पाप) रुप के दर्शन होते? किन्तु रात्रिकाल में लंका की यात्रा सत्य के दर्शन करा देती है। किन्तु यहाँ समुद्र द्वारा स्वयं के वास्तविक स्वरुप की स्वीकारोक्ति यही सन्देश देती है कि अपने स्वयं के रूप एवं गुण को यथा रूप में स्वीकारकर प्रभु के चरणों में भक्ति रखना ही जीवन के प्रति पूर्ण निष्ठा एवं गति है। ऐसा करके ही व्यक्ति प्रभु चरणों के प्रेम का अधिकारी हो सकता है। एक सन्देश यह भी मिलता है कि लक्ष्य प्राप्त करने हेतु जड़ प्रवृत्ति से याचना करने से बेहतर है कर्म करते हुए निरन्तर बढ़ते रहें अन्यथा समय अपनी गति में रहता है यथा "गए तीन दिन बीति" के अनुसार समय निकल जाता है और जीवन में पश्चाताप के अतिरिक्त कुछ नहीं मिलता। सेतु बनाकर लंका पहुँचने का यही भाव है। ढोल,गंवार, शूद्र, पशु, नारी पर विशेष दृष्टि क्यों रखनी चाहिए इसे समझने हेतु प्रत्येक तत्व पर एक-एक करके दृष्टि डालना आवश्यक है।

ढोल: जो लोग संगीत से सम्बद्ध है वे जानते हैं कि ढोल बजाने से पहले उसके स्वरों को अन्य वाद्ययन्त्र जैसे हारमोनियम, तानपूरे इत्यादि से मिलाना पड़ता है। अन्य वाद्ययंत्रों में स्वर नियत रहते है जैसे C# स्केल के "सा" स्वर हेतु यदि हारमोनियम के मध्य सप्तक का प्रथम काला बटन प्रयुक्त हो रहा है तो यह बटन सदा C# स्केल के "सा" हेतु ही प्रयुक्त होगा। किन्तु ढोल परिवार के वाद्ययंत्रों (ढोलक, तबला इत्यादि) को हारमोनियम के साथ संगत करने हेतु पहले तैयार करने की आवश्यकता पड़ती है अन्यथा स्वर एवं ताल में मेल होना संभव नहीं है। इतना ही नहीं, ढोल मौसम से भी प्रभावित हो जाता है। मुझे याद है एक बार कानपुर के गंगा महोत्सव में मेरे भजनों की प्रस्तुति हुई थी जहाँ तापमान 43 डिग्री सेल्सियस से अधिक था तथा वातावरण में आद्रता भी बहुत थी। अतः बार-बार तबले का स्वर उतर जाता था तथा संगीत बेसुरा हो जाता था। चूंकि कार्यक्रम लम्बा था अतः हमारे तबलावादक को लगभग प्रत्येक प्रस्तुति के पश्चात तबले के स्वर को मिलाने हेतु कसना पड़ता था। यदि ढोल का भलीभांति ताड़न (ध्यान रखना) न किया जाय तो उसके स्वर सदैव ही भटके हुए रहेंगे। समाज में अनेक ऐसे लोग होते हैं लक्ष्य की और उन्मुख होते हैं तथापि थोड़ा सा भटकाव ही उनके जीवन को अंधकारमय कर देता है, ऐसे लोग ढोल के समान होते हैं जिन्हे सही दिशा देने हेतु निरन्तर उन पर दृष्टि रखनी आवश्यक है अन्यथा वे समाज की दिशा नकारात्मक कर सकते हैं। एक अन्य उदाहरण के रूप में किशोर बच्चे भी ढोल के समान होते हैं जिनमे अनेक कारणों से भटकाव हो जाता है अतः किशोरों पर माता-पिता एवं गुरुजनों को अधिक ध्यान देने की आवश्यकता पड़ती है।

गंवार:
गंवार शब्द का सीधा अर्थ मूढ़, जड़, मूर्ख या अज्ञानी है। पराधीनता कालखण्ड में इसे गांव शब्द से जोड़कर ग्रामवासियों को बदनाम करने का कुत्सित कार्य किया गया इस कारण कुछ लोग गाँव में रहने वालों को स्वयं की अज्ञानता के कारण मूर्ख अर्थात गंवार कहने लगे। वर्तमान में अंग्रेजी के विलेजर्स शब्द को भी इसी अर्थ में देखने का षड्यंत्र किया जा रहा है। मानसिक विकार से ग्रसित कुछ लोग क्षेत्र विशेष में रहने वालों को भी मूर्ख का पर्यायवाची मानते हुए देखे जा सकते हैं जो  मानसिक अहंकार का परिचायक है। दिल्ली एवं पश्चिमी भारत के राज्यों में रहने वाले कुछ लोग इसी मानसिक बीमारी से ग्रसित हैं तथा बिहारी जैसे शब्दों का यही अर्थ  लगाते हैं। इसका एक कारण और भी है कि ऐसे व्यक्ति संस्कृति एवं सभ्यता में अन्तर कर पाने में समर्थ नहीं होते तथा अपनी भ्रान्त धारणाओं के आधार पर गलत परिभाषा का कुचक्र  रचते हैं। वास्तव में कोई भी राष्ट्र संस्कृति एवं सभ्यता के सन्तुलन से ही वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ सकता है। एक ओर जहाँ सभ्यता राष्ट्र का शरीर है वहीं संस्कृति उसकी आत्मा है। जब हम हड़प्पा जैसी सभ्यताओं का अध्ययन करते हैं तो वहां के घरों की बनावट, नालियां, सीवर, औजारों इत्यादि के बारे में जानने का प्रयास  करते हैं किन्तु जब संस्कृति की बात होती है तो वहां के लोक-व्यवहार, लोक-परम्पराओं, लोक नृत्य-संगीत इत्यादि का अध्ययन होता है।

सभ्यताएं समय के साथ परिवर्तनशील होती हैं किन्तु संस्कृति स्थायी बनी रहती है। सभ्यताओं को आगे बढ़ने एवं अपना अस्तित्व बनाये रखने हेतु निरन्तर संस्कृति के सहारे की आवश्यकता होती है किन्तु संस्कृति सदैव ही अल्हड़ और स्वतन्त्र होती है। सभ्यताएं संस्कृति को जन्म नहीं दे सकती, किन्तु संस्कृतियों ने अनेक सभ्यताओं को जन्म दिया है तथा सींचा है। एक उदाहरण द्वारा यह और भी स्पष्ट हो जाएगा कि फ़िल्मी गीतों को यदि सभ्यता का पर्याय मानें तो लोकगीत संस्कृति के रूप में खड़े दिखाई देंगे। एक फ़िल्मी गीत को बनाने हेतु कठिन अभ्यास के साथ ही वाद्ययन्त्रों का तारतम्य, सुरों के विभिन्न प्रयोग एवं तकनीकी प्रयोगों की भी एक लम्बी श्रृंखला होती है। अनेक बार उन्हें विकसित करने हेतु लोकधुनों के साथ-साथ लोकगीतों के शब्दों का भी आधार लेना पड़ता है। "पिंजरे वाली मुनिया", "कांची रे कांची", "ससुराल गेंदाफूल" जैसे अनेक गीत इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। वहीं संस्कृति के पर्याय लोकगीतों को किसी फ़िल्मी सहारे की आवश्यकता नहीं पड़ती। उनकी मिठास नैसर्गिक होती है जिसमे बनावट का लेशमात्र भी नहीं होता। वे केवल हारमोनियम, ढोलक इत्यादि के साथ ही गाये जा सकते हैं, यदि वाद्ययन्त्र उपलब्ध नहीं हैं तो भी केवल तालियों या घुंघुरुओं के साथ ही वे अपनी नैसर्गिक सुन्दरता से सबको आनंदित कर देते हैं। जन्म-संस्कार, मुण्डन-संस्कार, विवाह के समय गाये जाने वाले लोकगीत इसी विरासत एवं संस्कृति के अभिन्न अंश हैं।

शेष अगले अंक में ...


- दीपक श्रीवास्तव

Thursday, October 3, 2019

मन में तुम्ही हो माता

मन में तुम्ही हो माता,
जीवन शक्ति प्रदाता।।

सब देवों की शक्ति तुममें,
मिलकर संग निवास करे। 
सारे जग में व्याप्त तुम्ही हो,
सृष्टि तुम्हीं में वास करे। 
तेरे अनुपम बल-प्रभाव की,
कोई थाह न पाता। 
जीवन शक्ति प्रदाता।।1।।

शेषनाग भी सहस्र मुखों से,
तेरे वर्णन में सकुचायें। 
बह्मा औ शिव महा-तपस्वी,
श्रद्धापूर्वक तुमको गायें। 
हे अम्बे, हे महा-चण्डिके,
तुम्ही दिवस तुम राता। 
जीवन शक्ति प्रदाता।।2।।

तुम घर-घर में लक्ष्मीरूपा,
तुम ही माँ दारिद्रस्वरूपा। 
तुम्ही प्राणियों की बुद्धि हो,
तुम्ही जगत में लज्जा-रूपा। 
हाथ जोड़कर नमन करूँ मैं,
पालक तुम्ही विधाता। 
जीवन शक्ति प्रदाता।।3।।

हे देवी, हे अचिन्त्यरूपा,
हे शक्ति, हे प्राण-स्वरूपा।
तुममें सत-रज-तम गुण बसते,
गुण विमुक्त तुम ज्योति-स्वरूपा। 
तेरे गुण गाने को माता,
जीवन कम पड़ जाता। 
जीवन शक्ति प्रदाता।।4।।

तुम्ही भक्ति हो, तुम्ही आसरा,
तुम अपरा माँ तुम्ही हो परा।
जगत तुम्हारा अंशभूत है,
माँ तुमसे ही गगन औ धरा। 
तुम स्वाहा जिससे हर प्राणी,
पल में तृप्ति पाता। 
जीवन शक्ति प्रदाता।।5।।

माता तुम ही महाव्रता हो,
तुम्ही जितेन्द्रिय महातपा हो।
पितरों की तृप्ति हो जाती,
इसीलिए तुम स्वधा कहाती।
मुनिजन-साधक तुमको ध्यावें,
मोक्ष-मुक्ति की दाता ।
जीवन शक्ति प्रदाता।।6।।

शब्दों का आधार तुम्हीं हो,
यजुर्-साम-ऋग्वेद तुम्ही हो।
तुम्हीं त्रयी हो तुम्ही भगवती,
तुम्ही वार्ता, तुम्ही सती हो।
तुम्ही ज्ञान माँ तुम ही विद्या,
कर्म तुम्ही फलदाता।
जीवन शक्ति प्रदाता।।7।।

समझ सके तत्वों का सार,
तुम वह मेधाशक्ति अपार।
भवसागर से पार उतारे,
उस नौका का तुम्ही अधार।
मोहमुक्त आसक्तिमुक्त हो,
तुम ही गौरी माता।
जीवन शक्ति प्रदाता।।8।।

मैं मूरख तुमसे अनजान,
घेरे हैं दुःख-दर्द तमाम।
तेरी महिमा कैसे गाउँ,
भरा हुआ मन में अज्ञान।
मुझको अपनी शरण लगा लो,
आदि-शक्ति हे माता।
जीवन शक्ति प्रदाता।।9।।

- दीपक श्रीवास्तव