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Tuesday, October 8, 2013

नयन में धार कैसी

इस नयन में धार कैसी?
कर्म पथ में हार कैसी?
कंटकों को भी बहा दे,
अश्रु की हो धार ऐसी||

क्या सवेरा, रात क्या है?
नियति का आघात क्या है?
थक गए जो, रुक गए जो,
लक्ष्य की फिर बात क्या है?

अश्रु या मोती नयन के,
क्यों नियति पर है बहाना?
कल हमीं थे, आज हम है,
जूझना, है आजमाना|

राह को ही वर लिया तो
फिर नियति की मार कैसी?
कंटकों को भी बहा दे,
अश्रु की हो धार ऐसी||

--दीपक श्रीवास्तव

Monday, October 7, 2013

सर्वप्रथम माँ तेरी पूजा

हे जननी, हे जन्मभूमि, शत-बार तुम्हारा वंदन है|
सर्वप्रथम माँ तेरी पूजा, तेरा ही अभिनन्दन है||

तेरी नदियों की कल-कल में सामवेद का मृदु स्वर है|
जहाँ ज्ञान की अविरल गंगा, वहीँ मातु तेरा वर है|
दे वरदान यही माँ, तुझ पर इस जीवन का पुष्प चढ़े|
तभी सफल हो मेरा जीवन, यह शरीर तो क्षण-भर है|
मस्तक पर शत बार धरुं मै, यह माटी तो चन्दन है|
सर्वप्रथम माँ तेरी पूजा, तेरा ही अभिनन्दन है||१||

क्षण-भंगुर यह देह मृत्तिका, क्या इसका अभिमान रहे|
रहे जगत में सदा अमर वे, जो तुझ पर बलिदान रहे|
सिंह-सपूतों की तू जननी, बहे रक्त में क्रांति जहाँ,
प्रेम, अहिंसा, त्याग-तपस्या से शोभित इन्सान रहे|
सदा विचारों की स्वतन्त्रता, जहाँ न कोई बंधन है|
सर्वप्रथम माँ तेरी पूजा, तेरा ही अभिनन्दन है||

–दीपक श्रीवास्तव

Friday, September 6, 2013

कैसे सत्य सुनायें

कैसे सत्य सुनायें साथी, चारों ओर दिखावा है|
सौ सौ झूठी बातों पर भी सच्चाई का दावा है||

दुनिया का विस्तार हुआ है,
धन का तो अम्बार हुआ है|
छोटी छोटी बातों में भी,
अपना ही व्यापार हुआ है|
शिक्षा की तो बात न पूछो,
उसमे बहुत छलावा है||
सौ सौ झूठी बातों पर भी सच्चाई का दावा है||१||

चल रहे हैं, जल रहे है,
किस भंवर में पल रहे है|
लक्ष्य क्या है? भ्रांतियां हैं,
भ्रांतियों में गल रहे है|
अन्तर में पशुता ही देखी,
जीवन एक दिखावा है||
सौ सौ झूठी बातों पर भी सच्चाई का दावा है||२||

बहुत चले हैं अब तक जग में,
मगर नहीं कुछ आस दिखी|
अब तक तो सबकी आँखों में,
भूख दिखी है, प्यास दिखी|
जहाँ प्यार की उम्मीदें थीं,
वहां द्वेष का लावा है||
सौ सौ झूठी बातों पर भी सच्चाई का दावा है||३||

–दीपक श्रीवास्तव

Wednesday, September 4, 2013

अपने को पहचानो तो

मन की अपने मानो तो|
अपने को पहचानो तो||

जो दुनिया में आये हो,
विघ्नों से लड़ना होगा|
अगर शिखर को पाना है,
तूफां में अड़ना होगा|
जग से लड़कर क्या होगा,
खुद से ही लड़ना होगा|
मन में अपने ठानो तो|
अपने को पहचानो तो||१||

चाहे हों संघर्ष बड़े,
मन को बांधे खड़े रहो|
राह नहीं तो राह गढ़ो,
लेकिन हरदम लड़े रहो|
जीत अभी मिल जायेगी,
इसी भरोसे अड़े रहो|
मन में अपने ठानो तो|
अपने को पहचानो तो||२||

--दीपक श्रीवास्तव

Tuesday, July 30, 2013

अभी तो रात बाकी है


जरा सा और सोने दो|
अभी तो रात बाकी है||

हो रही आँखें उनींदी,
स्वप्न में अब डूब जाऊं|
कुछ घडी भूलूं जगत को,
जब दिवा से उब जाऊं|

जरा स्वप्नों में खोने दो,
अभी तक आस बाकी है|
जरा सा और सोने दो|
अभी तो रात बाकी है||१||

चल दिए अब तुम कहाँ ?
कुछ प्रहर का संग तो हो|
दो घड़ी को और ठहरो,
शून्यता यह भंग तो हो|

जरा सा और जीने दो,
अभी तक साँस बाकी है|
जरा सा और सोने दो|
अभी तो रात बाकी है||२||

--दीपक श्रीवास्तव

Saturday, July 27, 2013

मूरख इन्सां समझ न पाया

माँ कहती है तुम हो एक,
फिर क्यों तेरे रूप अनेक?
हम तुमको क्या कहें बताओ |
राम, कृष्ण या अल्ला नेक ||१||

कोई पूरब को मुंह करता,
कोई पश्चिम को ही धरता |
चाहे पूजा या नमाज हो,
ध्यान तुम्हारा ही तो करता ||२||

क्यों हैं तेरे इतने रूप?
दुनिया तो है अँधा कूप |
जात-धर्म की पग-पग हिंसा,
यही जगत का हुआ स्वरुप ||३||

माँ कहती सब तेरी माया,
अलग-अलग रखकर के काया |
जीवन का आदर्श बताया,
मूरख इन्सां समझ न पाया ||४||

--दीपक श्रीवास्तव

Sunday, August 21, 2011

ख़त्म मगर संग्राम न समझो

चले गए अंग्रेज़ यहाँ से, ख़त्म मगर संग्राम न समझो |
मिले नहीं जब तक आज़ादी, तब तक पूरा काम न समझो ||

कहने को आजाद हुए हैं, पर आज़ादी कितनी पाई?
अपनी भाषा, अपनी संस्कृति, हम सब में कितनी घुल पाई??
मातृभूमि का कण-कण बोले, चलो पथिक विश्राम न समझो |
मिले नहीं जब तक आज़ादी, तब तक पूरा काम न समझो ||


-- दीपक श्रीवास्तव

Friday, April 9, 2010

प्रीत की मनुहार

आज मेरे इन दृगों को,
      एक बार निहार साथी |
अश्रुओं में है झलकती,
      प्रीत की मनुहार साथी ||

जो नहीं तुम निकट मेरे,
      वेदना से तप्त जीवन |
प्रीत-अमृत से संवारो,
      आज यह अभिशप्त जीवन ||

हैं ह्रदय के तार कम्पित,
      प्रीत के मृदु राग छेड़ो |
तन भिगोयें, मन भिगोयें,
      राग वो मल्हार छेड़ो ||

प्रीत की भाषा मनोहर,
      तुम नए कुछ छंद दे दो |
सिमट जाऊं मै तुम्ही में,
      आज ऐसे बंध दे दो ||


-- दीपक श्रीवास्तव

Thursday, February 11, 2010

लाल चुनर पहनाना

जाग उठी तरुणाई फिर से नव इतिहास बनाना,
प्यासी भारत माँ को है फिर लाल चुनर पहनाना।

वन-वन भटके राणा लेकर मातृभूमि का बाना,
मस्तक नहीं झुकाया चाहे पड़ा घास ही खाना।
आज समय की मांग यही है,
प्यास धरा की जाग रही है,
है स्वर्णिम इतिहास वही हमको फिर से दोहराना।
लाल चुनर पहनाना।।

इसी भूमि के लिए शिवाजी ने तलवार उठाया,
"हर-हर महादेव" का नारा फिर जग ने दोहराया,
बैरी की सीमा में जाकर,
अमर तिरंगा फिर लहराकर,
अपनी गौरव-गाथा का फिर से परचम फहराना।
लाल चुनर पहनाना।।

चूड़ी की झंकार, पिया की मेहंदी रास न आई,
हाथों में तलवारें लेकर लड़ी छबीली बाई,
केवल इतना ही है कहना,
इससे बड़ा न कोई गहना,
माँ लिए ही जीना माँ के लिए हमें मर जाना।
लाल चुनर पहनाना।।

--दीपक श्रीवास्तव

Tuesday, February 2, 2010

कर लो ध्येय मार्ग का वंदन

कर लो ध्येय मार्ग का वंदन,
मूक बधिर हो जाए क्रंदन।
नए जगत का हो अभिनन्दन,
नव जीवन भर-भर स्पंदन॥

जीवन में है बड़ी उदासी,
अश्रु दृगों में, खुशियाँ आसी।
अपना दुःख, अपनों की हांसी,
जगत अग्नि में प्राण चिता सी॥

हुआ जगत खुशियों का मेला,
अपनों के ही छल का ढेला।
देखो जीवन हुआ अकेला,
जगत खेल जब आई बेला।

भले आज हारे जीवन में
लेकिन कभी न हारे मन में।
बसे आज भी हैं हर मन में,
कभी सफल होंगे जीवन में॥

--दीपक श्रीवास्तव

Monday, February 1, 2010

तुम ही हो!!!

जिस पल में हो एहसास तेरा,

उस पल की आभा क्या कहना।

जिन गीतों में हो नाम तेरा,

उन गीतों का फिर क्या कहना॥



अंतर्मन में हो बसे हुए,

ये भाव नहीं ये तुम ही हो।

ये भाव न मुझसे शब्द हुए,

इन शब्दों में भी तुम ही हो।

जिनका उच्चारण नाम तेरा,

उन शब्दों का फिर क्या कहना।

जिन गीतों में हो नाम तेरा,

उन गीतों का फिर क्या कहना॥



भेष बदल छुप के आये,

आहट बोली ये तुम ही हो,

खुशियों के मेघ तभी छाये,

आँखें बोलीं ये तुम ही हो।

जिस जीवन में हो प्यार तेरा,

उस जीवन का फिर क्या कहना।

जिन गीतों में हो नाम तेरा,

उन गीतों का फिर क्या कहना॥


--दीपक श्रीवास्तव

Wednesday, January 27, 2010

फिर यह धरती बुला रही है

राणा की संतानों जागो, जागो वीर शिवा के लालों।

फिर यह धरती बुला रही है, जागो महाकाल के कालों॥

शत-शत आघातों को सहकर माता घायल आज पड़ी है,

विश्व गुरु, सोने की चिड़िया शत्रु सैन्य से आज घिरी है।

घिरी हुई है जौहर ज्वाला, घिरी हुई है गंगा धारा,

घिरा हुआ है आज हिमालय, और घिरा है मधुबन प्यारा,

देखो ना अंधियारा छाए, जागो ओ सूरज के लालों।

फिर यह धरती बुला रही है, जागो महाकाल के कालों॥

स्वप्न हमारे बंट सकते हैं, पर ममता कैसे बंट जाए?

दीपक एक तो बुझ सकता है, राष्ट्रज्वाल कैसे बुझ पाए??

भ्रमित हमें सब कर सकते हैं, मगर सत्य को कौन मिटाए?

छाती चीरी जा सकती है, प्यार मचलता कौन मिटाए??

माँ का प्यार न कभी भुलाना, जागो ओ भारत के बालों।

फिर यह धरती बुला रही है, जागो महाकाल के कालों॥

पाश्चात्य की चकाचौंध में चुंधिया गयी तुम्हारी आँखें,

अब तो अपनी आँखे खोलो, बुला रही है माँ की आहें।

बुला रहा है नाद त्राहि का, बुला रही है आहत वसुधा,

बुला रही है भगवत-गीता, और बुलाती प्यासी गंगा।

भारत माँ की प्यास बुझाने, आ जाओ अमृत के प्यालों।

फिर यह धरती बुला रही है, जागो महाकाल के कालों॥

--दीपक श्रीवास्तव

Thursday, December 31, 2009

दो हज़ार नौ हुआ पुरातन,
दस की होगी आभा अनुपम।
नया सवेरा नयी उमंगें,
लेकर आये नूतन वर्ष।
दुःख छूटें खुशियाँ ही आये,
पल पल मिले आपको हर्ष।
नया वर्ष करता अभिनन्दन,
आओ सब मिल पा लें लक्ष्य ।


--दीपक श्रीवास्तव

Saturday, November 28, 2009

लक्ष्य दुर्गम, घन निशा में मार्ग हमको है बनाना!!

अनगिनत जीवन अचेतन भोग लिप्सा में समाये,
सत्य से अनभिज्ञ रह निज संस्कृति न जान पाये।
भोग संस्कृति त्याग हमको स्वत्व पीड़ा है मिटाना;
लक्ष्य दुर्गम, घन निशा में मार्ग हमको है बनाना!!

द्वेषमय अविरल पवन में मार्ग से जो भटक आए,
पथ प्रकाश कुसुम सुधा हरि अंश को न देख पाये।
मेट मृगतृष्णा हमें मनुजत्व उनकों है बताना;
लक्ष्य दुर्गम, घन निशा में मार्ग हमको है बनाना!!

कंटकों की मार में भी जो विजय के गीत गाये,

मद, गरल, दनुजत्व कंचन लोभ जिस पर चढ़ न पाये।

राष्ट्र दीपक बन उसे ही घोर तम में पथ दिखाना;

लक्ष्य दुर्गम, घन निशा में मार्ग हमको है बनाना!!

--दीपक श्रीवास्तव

Friday, November 27, 2009

दर्शन को हैं नैन पियासे!

कंठ तुम्हारे ही गुन गाते!!

जीवन धन्य बना दो माते!!!

माता हम नादान बड़े थे,

पाप की गठरी लिए खड़े थे.

शरण तिहारे आए अब तो,

नैनो से आंसू छलकाते.

जीवन धन्य बना दो माते!!!

शायद सुख में भूल गए थे,

आपनो से भी रूठ गए थे.

भूल हुई, पर बालक तुमसे

करुना और दया ही पाते.

जीवन धन्य बना दो माते!!!

--दीपक श्रीवास्तव

सांच तिहारो नाम ओ दाता,

जग झूठा ये झूठा नाता!!


सुंदर तन पर रीझ न प्राणी,

धन वैभव मिथ्या अभिमानी.

भज ले प्रभु का नाम ही सांचा,

जग झूठा ये झूठा नाता!!


पल में आशा बने निराशा,

निकट सरोवर फ़िर भी प्यासा.

मिटे कभी न लोभ पिपासा,

जग झूठा ये झूठा नाता!!


कंचन काया साथ न जाए,

क्यों बंधन में फंसता जाए.

नाम प्रभु का ही संग जाता,

जग झूठा ये झूठा नाता!!

--दीपक श्रीवास्तव

Muralia Baaje Jamuna teer

मुरलिया बाजे जमुना तीर!
दरस दो श्याम, भयो मन अधीर!!
मुरलिया बाजे जमुना तीर!!!

रोम रोम ये श्याम पुकारे,
तुम बिन जीवन कौन उबारे.
स्वीकारो जसुमति के प्यारे
सही न जाए पीर!!
मुरलिया बाजे जमुना तीर!!!

भक्तों के वत्सल गोपाला,
गिरधर नागर, मुरली वाला.
जीवन तुम्हरे बिन नंदलाला,
ज्यूँ नदिया बिन नीर!!
मुरलिया बाजे जमुना तीर!!!


--दीपक श्रीवास्तव

Thursday, November 26, 2009

सरस्वती माँ स्तुति

ज्ञान दो – हे माँ सरस्वती
बुद्धि-दायिनी माँ ज्ञान दो!!!!!

शारदा तेरी शरण में,
आए हैं बालक तुम्हारे.
ब्रम्ह-वादिनी माँ ज्ञान दो!!!!!


विद्या-दायिनी माँ तुम्ही हो,
धरा में अज्ञान- क्यों माँ??
हंस-वाहिनी माँ ज्ञान दो!!!!!

शील-साहस दो हृदय में,
हम बनें मानव धरा में.
वीणा-वादिनी माँ ज्ञान दो!!!!!

--दीपक श्रीवास्तव

Monday, November 2, 2009

Kya Rukna Baadhaaon Me

जीवन के बे-रोक सफर में,

कुछ कांटे कुछ फूल सही;

अगर मिले न गाड़ी घोड़े,

तो रस्ते की धूल सही;

चलना तेरा काम है राही,

चलता चल इन राहों में;

जीवन पथ का सार यही है,

क्या रुकना बाधाओं में।

--दीपक श्रीवास्तव

Niz-ko-Jaan

हे-नर-शाशवत-अमर-चिरंतन;

निज-को-जान-भगवती-नंदन;

द्वार-खोल-अंतस-के-प्यारे;

विजय-राह-करता-अभिनन्दन;

--दीपक श्रीवास्तव