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Monday, November 7, 2016

साँसों पर भारी राजनीति

दिल्ली एवं आसपास के क्षेत्र जहरीली धुन्ध से परेशान हैं, इसके दोषी भी हम ही हैं, परन्तु ऐसा लगता है कि राजनीति देश के नागरिकों की साँसों से भी अधिक महत्वपूर्ण होती जा रही है| वर्तमान स्थिति के लिए चाहे जो भी दोषी हो - पराली, निर्माण कार्य, पटाखे, डीजल गाड़ियाँ - अब इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि स्थिति अपनी चरम अवस्था पर है| बड़ा प्रश्न यह है कि ऐसी स्थिति इस वर्ष से कम ही सही, लेकिन प्रतिवर्ष आती है, इसे प्रशासन से लेकर नेता तक सभी जानते हैं, परन्तु सभी शायद इसलिए सोये रहते हैं कि यदि स्थिति भयंकर होगी तो राजनीति हेतु एक नया मुद्दा मिलेगा और समाचार चैनलों को टी. आर. पी. के लिए नयी सामग्री| इनके बीच में घुटता है आम नागरिक | अभी देश में जो कुछ भी चल रहा है उसे देखकर तो ऐसा ही लगता है|
-- दीपक श्रीवास्तव

Thursday, October 20, 2016

संस्मरण:शीला झुनझुनवाला - एक सच्ची मुलाक़ात जो आधे झूठ से शुरू हुई-भाग-१

 यूं तो जैसे-जैसे जीवन का सफ़र चलता रहता है, वैसे-वैसे विभिन्न व्यक्तियों से मिलने का क्रम बनता है जिनमे से कईयों की बड़ी गहरी छाप स्मृति पटल पर अंकित हो जाती है, परन्तु उन्ही में कुछ ऐसे व्यक्ति भी मिलते हैं जो जीवन को ऐसी दिशा की ओर मोड़ने की क्षमता रखते हैं कि वहां से हमें न केवल अपना लक्ष्य दिखाई देता है, बल्कि लक्ष्य तक पहुंचाने वाले मार्ग में से बाधाओं का धुंधलका भी छंटता हुआ सा महसूस होने लगता है| मुझे भी अपने जीवन में भी ऐसी ही एक महान विभूति “शीला झुनझुनवाला” से मिलने का अनमोल अवसर मिला था जिसने मेरे जीवन मार्ग को बहुत ही सहज भाव से उन्नति की ओर प्रेरित किया और उनके मार्गदर्शन एवं दिशा-निर्देशों का क्रम आज भी निर्बाध गति से अनवरत चल रहा है|
बात जनवरी २०१३ की है, मेरी नन्ही बेटी डेढ़ महीने की हो रही थी और अपने ननिहाल में अपनी शिशुलीला द्वारा लोगों को आनन्द का रसपान करा रही थी| मैं उस आनन्द से वंचित नोएडा में परिवार के भरण-पोषण के एकमात्र स्रोत एच० सी० एल० कम्पनी में अपनी सेवायें देने में व्यस्त था| यह बात और थी कि मेरा शरीर भले ही नोएडा में था, किन्तु मन तो प्रत्येक क्षण पत्नी और बेटी के साथ बलिया में था| एक आइ० टी० में कम्पनी में सेवारत होने के कारण समाज से जुड़ने का अवसर बहुत कम है, लेकिन ऑफिस में शनिवार और रविवार का अवकाश होता है, अतः सप्ताह में दो दिन समाज को देखने-समझने तथा साहित्य-सेवा का समय भी मिल जाता है|
ऐसे ही एक अवकाश के दिन मै नोएडा के सुप्रसिद्ध समाजसेवी “श्री अशोक श्रीवास्तव” के आवास पर गया हुआ था जहाँ महान गायक “स्व० हेमन्त कुमार” के भांजे “प्रसून मुखर्जी” आये हुए थे| अशोक जी ने उनसे मेरा परिचय कराया और बताया कि मै लिखने में भी थोड़ी-बहुत रूचि लेता हूँ| प्रसून दा को एक कार्यक्रम के संचालन की स्क्रिप्ट लिखने में सक्षम किसी व्यक्ति की तलाश थी| अशोक जी ने प्रसून दा से कहा कि यह बच्चा आजकल अच्छा लिख रहा है, हो सकता है कि आपकी तलाश यहाँ पूरी हो जाय| उनके पूछने पर मैंने कहा कि मुझे स्क्रिप्ट लिखने का कोई अनुभव तो नहीं है लेकिन कवितायें लिख लेता हूँ और अपनी कुछ कवितायें भी सुनाईं| उन्हें कवितायेँ अच्छी लगीं और उन्होंने मुझसे कहा कि श्रीमती शीला झुनझुनवाला द्वारा आयोजित कार्यक्रम “मेलोडी ऑफ़ लाइफ” में स्व० यश चोपड़ा और स्व० साहिर लुधियानवी की स्मृति से जुड़े गीत गाये जायेंगे जिनके लिए मुझे भूमिका स्वरूपी कुछ पंक्तियाँ साहित्यिक शैली में लिखनी है और जिन्हें सञ्चालन के दौरान पढ़ा जाएगा| लेकिन लिखने से पहले शीला जी से मिलने का अवसर आने वाला था|
हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में ५० वर्षों से भी अधिक समय तक सक्रिय योगदान देने वाली श्रीमती शीला झुनझुनवाला का योगदान हिंदी के प्रचार एवं प्रसार के लिए अदभुत है| सन १९६० में टाइम्स समूह की प्रसिद्ध पत्रिका “धर्मयुग” के महिला पृष्ठों से उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा था तथा अपने अदम्य उत्साह, कर्मनिष्ठा और लगन के दम पर आगे बढ़ते हुए शिखर तक पहुँचीं थीं| पत्रकारिता के माध्यम से नारी जगत को आधुनिक काल की समन्वित चेतना प्रदान करने के लिए उन्होंने हर संभव प्रयास किया| इतना ही नहीं, उन्होंने हिंदी में सर्वप्रथम निकलने वाली आधुनिक महिला पत्रिका अंगजा का सम्पादन भी किया| परन्तु शीला जी की प्रतिभा के विस्तार के लिए अंगजा का क्षितिज अत्यंत सीमित था| अतः उन्होंने हिन्दुस्तान टाइम्स समूह की पत्रिका “कादम्बिनी” में सह-सम्पादक के पद को स्वीकार करते हुए अनेक योजनाबद्ध स्तम्भों का प्रारम्भ किया और उन्हें सुचारू रूप से आगे बढ़ाया| इसके अतिरिक्त उन्होंने अनेक नए लेखक-लेखिकाओं को हिंदी लेखन में प्रवृत्त किया जिनमे कई दक्षिण भारतीय भी शामिल थे| शीला जी अत्यन्त जागरूक पत्रकार रही हैं| सामाजिक और राजनैतिक घटना पटल को आंकने की पैनी दृष्टि, नए विषयों के चयन और कार्य करने की क्षमता और सूझबूझ के कारण शीघ्र ही उनको राष्ट्रीय महत्व के दैनिक पत्र “दैनिक हिन्दुस्तान” का संयुक्त सम्पादक के रूप में अपनी सेवायें देने का अवसर प्राप्त हुआ| उनहोने अपने कार्यकाल में “दैनिक हिन्दुस्तान” के रविवासरीय परिशिष्ट और अन्य साप्ताहिक परिशिष्टों ने हिंदी में दैनिक पत्रकारिता को कई नये आयाम दिए|
शीला जी पत्रकारिता के क्षेत्र में गंभीर एवं निरन्तर चेतनाशील रही हैं| इसी कारण उनको बहुप्रसारित प्रतिष्ठित साप्ताहिक “हिन्दुस्तान” पत्रिका का सम्पादक बनने का गौरव प्राप्त हुआ| डॉ. धर्मवीर भारती के अनुसार यह प्रथम अवसर था जब हिंदी पत्रकारिता के १५० वर्षों के इतिहास में कोई महिला इतनी बहुप्रसारित पत्रिका की सम्पादक बनी थी| शीला जी के कार्यकाल के समय में हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में केवल गिनी-चुनी महिलायें ही थीं और जो थीं वे भी इतने उच्च पदों पर नहीं थीं साहित्य के क्षेत्र में थीं|
श्रीमती शीला झुनझुनवाला ने अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपने परिश्रम, योग्यता एवं प्रयोगधर्मिता के माध्यम से उस शिखर को भी बौना साबित किया है, जहाँ तक पहुंचना अन्य लोगों के लिए स्वप्न जैसा है| अपने क्षेत्र में शीर्ष पर होने के बाद उन्होंने अपना बाकी जीवन समाज के उस तबके को समर्पित कर दिया जिन्हें अपना वजूद बनाये रखने के लिए सहारे की आवश्यकता है| उन्होंने सामाजिक क्षेत्र में भी अत्यन्त उल्लेखनीय तथा अनुकरणीय योगदान दिया है जिनमे महिलाओं, बच्चों, विकलांगों तथा शिक्षा-स्तर की उन्नति प्रमुख है|
शीला जी को उनके सामाजिक योगदान और साहित्यिक पत्रकारिता की उपलब्द्धियों के लिए सन १९९१ में भारत सरकार ने पद्मश्री सम्मान से अलंकृत किया था|

क्रमशः .....

Monday, October 10, 2016

दीपक श्रीवास्तव: जग में तुझ सी माँ ना होगी

दीपक श्रीवास्तव: जग में तुझ सी माँ ना होगी

जग में तुझ सी माँ ना होगी

मैं चंचल मैं पापी भोगी
जग में  तुझ सी माँ ना होगी ।
दर्शन बिन रोती हैं अंखिया
पूरी कब अभिलाषा होगी ॥

मन्त्र न  जानूं , यन्त्र न जानूं,
ध्यान न जानूं, तन्त्र न जानूं ।
तेरी मुद्रायें न जानूं,
व्याकुल हो विलाप ना जानूं।
तेरे पीछे चाहूं चलना
पर अनुचर के गुण न जानूं।
कलेश हरो माँ , अवगुण हर लो
जग में तुझ सी माँ न होगी ॥

मैं पूजन अर्चन न जानूं
प्रायश्चित क्रंदन न जानूं।
त्रुटियों की मैं खान हूँ माता ,
ध्यान तुम्हारा ना कर पाता ।
तेरे द्वार नहीं आ पाया ,
लग चरणों से रो न पाया ।
फ़िर भी मुझको तूने सम्भाला
जग में तुझ सी माँ न होगी ॥

मंत्र तेरा जो श्रवण करे तो
मूर्ख मधुर वक्ता हो जायें ।
दीन स्वर्ण वैभव पा जायें
भीरू पुरुष निर्भय हो जायें ।
एक मन्त्र का असर है ऐसा
जप तप का फल होगा कैसा ?
मुझको भी स्वीकार करो माँ
जग में तुझ सी माँ न होगी ॥

मोक्ष न  माँगू , धन न माँगू
इस जग का वैभव न माँगू ।
तेरा नाम बसे  जीवन में
केवल इतना सा वर माँगू ।
तड़प रहा हूँ बिलख रहा हूँ
भव सागर में भटक रहा हूँ ।
मैं चंचल मैं पापी भोगी
जग में तुझ सी माँ न होगी ॥

- दीपक श्रीवास्तव 

Saturday, October 1, 2016

भाषा गीत

####भाषा गीत####

भाषाओं का पर्व मनायें ,
सब भाषाएँ मिलकर गायें
पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण
सभी गुँथे माला बन जायें ॥

सिन्धी उर्दू दोनों बहनें ,
पंजाबी संग मिलकर गायें ।
तमिल मराठी साथ साथ हो
भारत माँ के पर्व मनायें ।
सँथाली कन्नड़ उड़िया को
हिन्दी बहना गले लगाये ।
पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण
सभी गुँथे माला बन जायें ॥

बांग्ला के संग झूमे तेलुगू ,
भारत की गायें गाथाएँ ।
गुजराती भी सदा एक है
नहीं डिगा सकती बाधायें ।
सब भाषायें वन्दन करतीं
माता संस्कृत खुशी मनाये
पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण
सभी गुँथे माला बन जायें ॥

-दीपक श्रीवास्तव
9871005927

Tuesday, April 5, 2016

प्रेम नही मै दर्द लिखूंगा

प्रेम नही मै दर्द लिखूंगा।
क्षण भर के इस जीवन को मै
प्राप्य नही संघर्ष लिखूंगा ,
प्रेम नही मै दर्द लिखूंगा ॥

बहुत सह चुके इस जीवन को
पर सहने की क्षमता कितनी ?
रोम रोम बंधन में जकड़े
अपनों का मै कर्ज लिखूंगा
प्रेम नही मै दर्द लिखूंगा ॥

रहे ढूँढते प्रेम जहाँ भी
वहाँ प्रेम कण भर ना पाया ।
जिसे प्रेम से गले लगाया
उसी व्यक्ति ने गला दबाया ।
इस जीवन के सम्बन्धों को
मै बस केवल फर्ज लिखूंगा
प्रेम नही मै दर्द लिखूंगा ॥

- दीपक श्रीवास्तव

Tuesday, February 10, 2015

दीपक श्रीवास्तव: जय-जय-जय बजरंग बली

दीपक श्रीवास्तव: जय-जय-जय बजरंग बली



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जय-जय-जय बजरंग बली

हे माँ जग के स्वामी का संदेशा लेकर आया हूँ,
अपने संग उनके प्राणों की प्रिय अंगूठी लाया हूँ।।

माता लगते हैं अनाथ से जिन्हें त्रिलोकीनाथ कहें,
हे सीते कहकर विलापते, जो जग के सब पीर हरें।
मै तेरी सेवा में उनकी व्यथा बताने आया हूँ।।
अपने संग उनके प्राणों की प्रिय अंगूठी लाया हूँ।।

रहो सदा तुम अजर अमर ये माता का वरदान है,
पुत्र तुम्हारे हाथों में ही सृष्टि का कल्याण है,
धन्य हुआ मै माता जो सेवा का अवसर पाया हूँ।।
अपने संग उनके प्राणों की प्रिय अंगूठी लाया हूँ।।

माता का आशीष प्राप्त कर बागों के फल फूल दले,
लंका जार असुर संहारे, हनुमत प्रभु की ओर चले,
नाथ आपकी सेवा में माँ की चूड़ामणि लाया हूँ,
में सेवक माँ के चरणों का अमृत पीकर आया हूँ।।

हनुमत तेरे जैसा जग में कोई कभी नहीं होगा,
तेरे जैसा प्यारा मुझको कोई और नहीं होगा,
नाथ तुम्हारी भक्ति का गुणगान सदा ही गाया हूँ,
में सेवक माँ के चरणों का अमृत पीकर आया हूँ।।

--दीपक श्रीवास्तव

Tuesday, October 8, 2013

आने को है सपना कोई

चल रहे जाने कहाँ कब से कभी समझा कोई?
फिर नया आकाश दो, आने को है सपना कोई||

फडफडाते चेतना के पर, इन्हें आकार दो|
काल भी यही रोकना चाहे, उसे दुतकार दो|
आग जो मन में बसी, उसको कलम की धार दो,
स्वप्न जो है बंद आँखों में उसे साकार दो|
जो अचेतन हैं, उन्हें कब तक कहे अपना कोई?
फिर नया आकाश दो, आने को है सपना कोई||१||

कल कभी आये नहीं, चाहे स्वयं को हार दो|
क्षण अभी है आज है, जीवन इसी पर वार दो|
आज अनगढ़ पत्थरों को मूर्ति का उपहार दो|
जो तुम्हारे हैं, उन्हें अब स्वप्न का संसार दो|
लक्ष्य तो संघर्ष से ही जूझकर मिलना कोई|
फिर नया आकाश दो, आने को है सपना कोई||२||

-- दीपक श्रीवास्तव

नयन में धार कैसी

इस नयन में धार कैसी?
कर्म पथ में हार कैसी?
कंटकों को भी बहा दे,
अश्रु की हो धार ऐसी||

क्या सवेरा, रात क्या है?
नियति का आघात क्या है?
थक गए जो, रुक गए जो,
लक्ष्य की फिर बात क्या है?

अश्रु या मोती नयन के,
क्यों नियति पर है बहाना?
कल हमीं थे, आज हम है,
जूझना, है आजमाना|

राह को ही वर लिया तो
फिर नियति की मार कैसी?
कंटकों को भी बहा दे,
अश्रु की हो धार ऐसी||

--दीपक श्रीवास्तव

Monday, October 7, 2013

सर्वप्रथम माँ तेरी पूजा

हे जननी, हे जन्मभूमि, शत-बार तुम्हारा वंदन है|
सर्वप्रथम माँ तेरी पूजा, तेरा ही अभिनन्दन है||

तेरी नदियों की कल-कल में सामवेद का मृदु स्वर है|
जहाँ ज्ञान की अविरल गंगा, वहीँ मातु तेरा वर है|
दे वरदान यही माँ, तुझ पर इस जीवन का पुष्प चढ़े|
तभी सफल हो मेरा जीवन, यह शरीर तो क्षण-भर है|
मस्तक पर शत बार धरुं मै, यह माटी तो चन्दन है|
सर्वप्रथम माँ तेरी पूजा, तेरा ही अभिनन्दन है||१||

क्षण-भंगुर यह देह मृत्तिका, क्या इसका अभिमान रहे|
रहे जगत में सदा अमर वे, जो तुझ पर बलिदान रहे|
सिंह-सपूतों की तू जननी, बहे रक्त में क्रांति जहाँ,
प्रेम, अहिंसा, त्याग-तपस्या से शोभित इन्सान रहे|
सदा विचारों की स्वतन्त्रता, जहाँ न कोई बंधन है|
सर्वप्रथम माँ तेरी पूजा, तेरा ही अभिनन्दन है||

–दीपक श्रीवास्तव

Friday, September 6, 2013

कैसे सत्य सुनायें

कैसे सत्य सुनायें साथी, चारों ओर दिखावा है|
सौ सौ झूठी बातों पर भी सच्चाई का दावा है||

दुनिया का विस्तार हुआ है,
धन का तो अम्बार हुआ है|
छोटी छोटी बातों में भी,
अपना ही व्यापार हुआ है|
शिक्षा की तो बात न पूछो,
उसमे बहुत छलावा है||
सौ सौ झूठी बातों पर भी सच्चाई का दावा है||१||

चल रहे हैं, जल रहे है,
किस भंवर में पल रहे है|
लक्ष्य क्या है? भ्रांतियां हैं,
भ्रांतियों में गल रहे है|
अन्तर में पशुता ही देखी,
जीवन एक दिखावा है||
सौ सौ झूठी बातों पर भी सच्चाई का दावा है||२||

बहुत चले हैं अब तक जग में,
मगर नहीं कुछ आस दिखी|
अब तक तो सबकी आँखों में,
भूख दिखी है, प्यास दिखी|
जहाँ प्यार की उम्मीदें थीं,
वहां द्वेष का लावा है||
सौ सौ झूठी बातों पर भी सच्चाई का दावा है||३||

–दीपक श्रीवास्तव

Wednesday, September 4, 2013

अपने को पहचानो तो

मन की अपने मानो तो|
अपने को पहचानो तो||

जो दुनिया में आये हो,
विघ्नों से लड़ना होगा|
अगर शिखर को पाना है,
तूफां में अड़ना होगा|
जग से लड़कर क्या होगा,
खुद से ही लड़ना होगा|
मन में अपने ठानो तो|
अपने को पहचानो तो||१||

चाहे हों संघर्ष बड़े,
मन को बांधे खड़े रहो|
राह नहीं तो राह गढ़ो,
लेकिन हरदम लड़े रहो|
जीत अभी मिल जायेगी,
इसी भरोसे अड़े रहो|
मन में अपने ठानो तो|
अपने को पहचानो तो||२||

--दीपक श्रीवास्तव

Tuesday, July 30, 2013

अभी तो रात बाकी है


जरा सा और सोने दो|
अभी तो रात बाकी है||

हो रही आँखें उनींदी,
स्वप्न में अब डूब जाऊं|
कुछ घडी भूलूं जगत को,
जब दिवा से उब जाऊं|

जरा स्वप्नों में खोने दो,
अभी तक आस बाकी है|
जरा सा और सोने दो|
अभी तो रात बाकी है||१||

चल दिए अब तुम कहाँ ?
कुछ प्रहर का संग तो हो|
दो घड़ी को और ठहरो,
शून्यता यह भंग तो हो|

जरा सा और जीने दो,
अभी तक साँस बाकी है|
जरा सा और सोने दो|
अभी तो रात बाकी है||२||

--दीपक श्रीवास्तव

Saturday, July 27, 2013

मूरख इन्सां समझ न पाया

माँ कहती है तुम हो एक,
फिर क्यों तेरे रूप अनेक?
हम तुमको क्या कहें बताओ |
राम, कृष्ण या अल्ला नेक ||१||

कोई पूरब को मुंह करता,
कोई पश्चिम को ही धरता |
चाहे पूजा या नमाज हो,
ध्यान तुम्हारा ही तो करता ||२||

क्यों हैं तेरे इतने रूप?
दुनिया तो है अँधा कूप |
जात-धर्म की पग-पग हिंसा,
यही जगत का हुआ स्वरुप ||३||

माँ कहती सब तेरी माया,
अलग-अलग रखकर के काया |
जीवन का आदर्श बताया,
मूरख इन्सां समझ न पाया ||४||

--दीपक श्रीवास्तव

Sunday, August 21, 2011

ख़त्म मगर संग्राम न समझो

चले गए अंग्रेज़ यहाँ से, ख़त्म मगर संग्राम न समझो |
मिले नहीं जब तक आज़ादी, तब तक पूरा काम न समझो ||

कहने को आजाद हुए हैं, पर आज़ादी कितनी पाई?
अपनी भाषा, अपनी संस्कृति, हम सब में कितनी घुल पाई??
मातृभूमि का कण-कण बोले, चलो पथिक विश्राम न समझो |
मिले नहीं जब तक आज़ादी, तब तक पूरा काम न समझो ||


-- दीपक श्रीवास्तव

Friday, April 9, 2010

प्रीत की मनुहार

आज मेरे इन दृगों को,
      एक बार निहार साथी |
अश्रुओं में है झलकती,
      प्रीत की मनुहार साथी ||

जो नहीं तुम निकट मेरे,
      वेदना से तप्त जीवन |
प्रीत-अमृत से संवारो,
      आज यह अभिशप्त जीवन ||

हैं ह्रदय के तार कम्पित,
      प्रीत के मृदु राग छेड़ो |
तन भिगोयें, मन भिगोयें,
      राग वो मल्हार छेड़ो ||

प्रीत की भाषा मनोहर,
      तुम नए कुछ छंद दे दो |
सिमट जाऊं मै तुम्ही में,
      आज ऐसे बंध दे दो ||


-- दीपक श्रीवास्तव

Thursday, February 11, 2010

लाल चुनर पहनाना

जाग उठी तरुणाई फिर से नव इतिहास बनाना,
प्यासी भारत माँ को है फिर लाल चुनर पहनाना।

वन-वन भटके राणा लेकर मातृभूमि का बाना,
मस्तक नहीं झुकाया चाहे पड़ा घास ही खाना।
आज समय की मांग यही है,
प्यास धरा की जाग रही है,
है स्वर्णिम इतिहास वही हमको फिर से दोहराना।
लाल चुनर पहनाना।।

इसी भूमि के लिए शिवाजी ने तलवार उठाया,
"हर-हर महादेव" का नारा फिर जग ने दोहराया,
बैरी की सीमा में जाकर,
अमर तिरंगा फिर लहराकर,
अपनी गौरव-गाथा का फिर से परचम फहराना।
लाल चुनर पहनाना।।

चूड़ी की झंकार, पिया की मेहंदी रास न आई,
हाथों में तलवारें लेकर लड़ी छबीली बाई,
केवल इतना ही है कहना,
इससे बड़ा न कोई गहना,
माँ लिए ही जीना माँ के लिए हमें मर जाना।
लाल चुनर पहनाना।।

--दीपक श्रीवास्तव

Tuesday, February 2, 2010

कर लो ध्येय मार्ग का वंदन

कर लो ध्येय मार्ग का वंदन,
मूक बधिर हो जाए क्रंदन।
नए जगत का हो अभिनन्दन,
नव जीवन भर-भर स्पंदन॥

जीवन में है बड़ी उदासी,
अश्रु दृगों में, खुशियाँ आसी।
अपना दुःख, अपनों की हांसी,
जगत अग्नि में प्राण चिता सी॥

हुआ जगत खुशियों का मेला,
अपनों के ही छल का ढेला।
देखो जीवन हुआ अकेला,
जगत खेल जब आई बेला।

भले आज हारे जीवन में
लेकिन कभी न हारे मन में।
बसे आज भी हैं हर मन में,
कभी सफल होंगे जीवन में॥

--दीपक श्रीवास्तव

Monday, February 1, 2010

तुम ही हो!!!

जिस पल में हो एहसास तेरा,

उस पल की आभा क्या कहना।

जिन गीतों में हो नाम तेरा,

उन गीतों का फिर क्या कहना॥



अंतर्मन में हो बसे हुए,

ये भाव नहीं ये तुम ही हो।

ये भाव न मुझसे शब्द हुए,

इन शब्दों में भी तुम ही हो।

जिनका उच्चारण नाम तेरा,

उन शब्दों का फिर क्या कहना।

जिन गीतों में हो नाम तेरा,

उन गीतों का फिर क्या कहना॥



भेष बदल छुप के आये,

आहट बोली ये तुम ही हो,

खुशियों के मेघ तभी छाये,

आँखें बोलीं ये तुम ही हो।

जिस जीवन में हो प्यार तेरा,

उस जीवन का फिर क्या कहना।

जिन गीतों में हो नाम तेरा,

उन गीतों का फिर क्या कहना॥


--दीपक श्रीवास्तव